हिमाचल प्रदेश कांग्रेस ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित 'वोट बचाओ, देश बचाओ' महारैली में अपनी सांगठनिक ताकत का प्रदर्शन किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अगुवाई में रविवार को हुई इस महारैली में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू, प्रदेश मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्री, कांग्रेस विधायक और संगठन के पदाधिकारी शामिल हुए। पार्टी का दावा है कि हिमाचल से करीब 15 हजार कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे।

 

इस महारैली को केवल एक राजनीतिक जुटान के तौर पर नहीं, बल्कि मतदाता सूची, चुनाव प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर कांग्रेस के राष्ट्रव्यापी अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है। हिमाचल कांग्रेस ने इसमें बड़ी भागीदारी सुनिश्चित कर यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी का प्रदेश संगठन केंद्रीय नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़ा है। हालांकि, इस राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वोट चोरी के आरोपों को लेकर उठाई गई आवाज चुनाव सुधारों की दिशा में कोई ठोस नतीजा भी दे पाएगी?

201 बसें और 500 अन्य वाहन, पहाड़ से मैदान तक लामबंदी

दिल्ली महारैली के लिए हिमाचल कांग्रेस ने व्यापक परिवहन व्यवस्था की। पार्टी की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, प्रदेश से कुल 201 बसें दिल्ली के लिए रवाना हुईं। इनमें करीब 30 बसें हिमाचल पथ परिवहन निगम (एचआरटीसी) की बताई गई हैं। इसके अतिरिक्त प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से करीब 500 अन्य वाहनों की व्यवस्था की गई थी। रैली से पहले प्रदेश कांग्रेस ने 10 से 15 हजार कार्यकर्ताओं को दिल्ली ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। संगठन महासचिव विनोद जिंटा के अनुसार, करीब 15 हजार लोग महारैली में शामिल होने पहुंचे। इस जुटान में केवल बड़े नेताओं की भागीदारी ही नहीं, बल्कि जिला और ब्लॉक स्तर के संगठन, महिला कार्यकर्ताओं, युवा संगठनों और पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को भी शामिल करने पर जोर दिया गया।

 

रैली के लिए प्रदेश के अलग-अलग जिलों से कार्यकर्ताओं को जुटाने की जिम्मेदारी संगठनात्मक पदाधिकारियों को सौंपी गई थी।

सुक्खू का संदेश: लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा का संकल्प

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने महारैली में भागीदारी करते हुए कहा कि वोट चोरी के खिलाफ पूरा देश एकजुट है और लोकतंत्र पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र, संविधान और जनता के मताधिकार की रक्षा के संकल्प के साथ देशभर से इंडिया गठबंधन के नेता और कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे हैं। हिमाचल के हजारों कार्यकर्ताओं की भागीदारी भी इसी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। मुख्यमंत्री कांग्रेस मुख्यालय से रामलीला मैदान जाते समय तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी और केरलम के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन के साथ भी नजर आए। कांग्रेस इस मंच के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की चिंताओं को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है।

 

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एसआईआर पर कांग्रेस के गंभीर सवाल

महारैली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर बड़ी संख्या में नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित किया गया है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को जवाबदेह ठहराने की मांग उठाई। कांग्रेस नेताओं ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने तथा चुनाव सुधारों की जरूरत पर जोर दिया। हालांकि, मतदाता सूची से नाम हटने के कांग्रेस के आरोपों और उनके कारणों का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण अपने आप में एक वैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है या नहीं, इसका आकलन संबंधित रिकॉर्ड और निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।

 

भाजपा के खिलाफ जन आंदोलन बनाने की कोशिश

 

प्रदेश कांग्रेस संगठन महासचिव विनोद जिंटा ने महारैली को भाजपा के खिलाफ जन आंदोलन की शुरुआत बताया। कांग्रेस का आरोप है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है। पार्टी इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल ने भी हिमाचल से बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के दिल्ली पहुंचने पर प्रसन्नता जताई। उन्होंने विशेष रूप से महिला कार्यकर्ताओं की भागीदारी का उल्लेख किया। महारैली में कांग्रेस के साथ विपक्षी गठबंधन के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने इसे व्यापक राजनीतिक मंच का रूप दिया।

 

महारैली के दौरान भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने भी चुनाव प्रक्रिया और एसआईआर को लेकर अपनी मांगें रखीं। सीपीएम नेता संजय चौहान ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने, एसआईआर प्रक्रिया रद्द करने और कथित तौर पर काटे गए वोट बहाल करने की मांग की। उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित कानून में संशोधन और चुनाव सुधारों की भी वकालत की। इससे स्पष्ट है कि मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया का मुद्दा विपक्षी दलों के बीच साझा राजनीतिक एजेंडे के रूप में उभर रहा है।

 

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हिमाचल कांग्रेस के लिए भी परीक्षा

 

दिल्ली की महारैली में बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को पहुंचाना कांग्रेस के लिए संगठनात्मक उपलब्धि के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन प्रदेश की राजनीति के लिहाज से इसका एक दूसरा पहलू भी है। मुख्यमंत्री सुक्खू और प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व के सामने चुनौती यह है कि दिल्ली में दिखाई गई एकजुटता को हिमाचल में संगठन की सक्रियता और जमीनी राजनीतिक संवाद में कैसे बदला जाए। क्या यह अभियान प्रदेश के गांवों और कस्बों तक पहुंचेगा? क्या मतदाता सूची से संबंधित शिकायतों के समाधान के लिए कांग्रेस कोई व्यवस्थित अभियान चलाएगी? और क्या इस राजनीतिक लामबंदी का असर आने वाले चुनावों की रणनीति पर भी पड़ेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में सामने आएंगे। फिलहाल दिल्ली की महारैली के जरिए हिमाचल कांग्रेस ने केंद्रीय नेतृत्व के प्रति अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन किया है। अब देखना होगा कि यह जुटान केवल एक दिन के शक्ति प्रदर्शन तक सीमित रहती है या प्रदेश में एक व्यापक राजनीतिक अभियान की नींव बनती है।