कर्नाटक की राजनीति में आज एक बड़ा मोड़ आने की चर्चा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने घर पर नाश्ते पर एक मीटिंग बुलाई है और राज्यपाल से मिलने का समय मांगा है। चर्चा है कि वह आखिरी कैबिनेट मीटिंग करके इस्तीफा दे सकते हैं और कर्नाटक का मुख्यमंत्री बदला जा सकता है। यह सब होने से ठीक एक दिन पहले सिद्धारमैया ने कर्नाटक की जातिगत सर्वे रिपोर्ट को स्वीकार किया है। माना जा रहा है कि यह संयोग मात्र नहीं है और इसके जरिए भी सिद्धारमैया कुछ संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही, वह अपनी कुर्सी बचाने के लिए कुछ आखिरी दांव भी चल रहे हैं। रोचक बात है कि सिद्धारमैया खुद पिछड़े वर्ग से आते हैं और उन्होंने पिछड़ा वर्ग आयोग की सर्वे रिपोर्ट बेहद अहम मोड़ पर स्वीकार की है।
पिछड़ा वर्ग आयोग के चेयरमैन मधुसूदन नायक ने बुधवार को यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री के सामने रखी और सिद्धारमैया ने बिना देरी किए इसे स्वीकार भी कर लिया। सिद्धारमैया के लिए कर्नाटक का जातिगत सर्वे बेहद अहम रहा है। उन्होंने कर्नाटक की जनता से यह वादा किया था कि वह इसे करवाकर ही रहेंगे। माना जा रहा है कि ऐसा करके वह आगे आने वाली सरकारों की चुनौती बढ़ा रहे हैं। अगर उनकी ही पार्टी किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाती है तो सर्वे की रिपोर्ट के हिसाब से नीति बनाना काफी टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
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नई सरकार की चिंता बढ़ाएंगे सिद्धारमैया?
खुद पिछड़े वर्ग की अहिंदा जाति से आने वाले सिद्धारमैया की पहचान सामाजिक न्याय के समर्थक और पिछड़ी जातियों के नेता की रही है। यही वजह है कि कांग्रेस बार-बार उन पर भरोसा करती आई है। अब जब इस बात की पूरी चर्चा है कि गुरुवार को वह मुख्यमंत्री पद से हट सकते हैं तो उन्होंने संभवत: अपने जाने से पहले एक ऐसा काम कर दिया है जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जा सकता है। हालांकि, कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन की खबरों को लेकर कांग्रेस की ओर से कुछ भी स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है। खुद सिद्धारमैया ने कहा था कि वह इसके बारे में गुरुवार को बात करेंगे।
माना जा रहा है कि अब सिद्धारमैया खुद को एक ऐसा नेता दिखाकर जाना चाहते हैं जो पिछड़ों का बहुत हिमायती है और उसने जाते-जाते भी उनके हित में काम किया। साथ ही, यह फैसला उनके उत्तराधिकारी के लिए चुनौती होगा क्योंकि वादे के अनुसार कांग्रेस सरकार को अब इस सर्वे के हिसाब से फैसले लेने होंगे। बता दें कि इससे पहले जय प्रकाश हेगड़े की ओर से बनाई गई एक और रिपोर्ट खूब विवादों में रही थी। वोक्कालिगा और लिंगायत दोनों ही समुदायों की ओर से इसका विरोध किया गया था और सर्वे के नतीजों पर सवाल खड़े किए गए थे।
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तब नेता विपक्ष आर अशोक ने आरोप लगाए थे कि सिद्धारमैया अपनी कमियों को छिपाने के लिए वह जातिगत सर्वे का इस्तेमाल कर रहे हैं। जब इसकी खूब आलोचना हुई तो सिद्धारमैया सरकार ने मधुसूदन नायक आयोग बनाकर नए सिरे से सर्वे करने के आदेश दिए थे। अब इस सर्वे को कैबिनेट के सामने पेश करके पास कराना भी जरूरी है। माना जा रहा है कि सिद्धारमैया अपनी संभावित आखिरी कैबिनेट मीटिंग में यह रिपोर्ट रखकर डीके शिवकुमार जैसे अपने विरोधियों को चित करने की कोशिश कर सकते हैं।
कहां होगी मुश्किल?
पहले ही लिंगायत और वोक्कालिगा इसका विरोध कर चुके हैं तो इस बार भी वैसा ही होने की उम्मीद है। ऐसे में अगर डी के शिवकुमार मुख्यमंत्री बनते हैं और वह इस रिपोर्ट को मंजूर करवाते हैं तो वह सब के निशाने पर आ सकते हैं। इतना ही नहीं, अगर रिपोर्ट नहीं मंजूर होती है और इसे लागू नहीं किया जाता है तो भविष्य के मुख्यमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी को भी मुश्किल होगी।
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कर्नाटक में क्या होने वाला है?
चर्चा है कि अब सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजा जा सकता है और उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। मुख्यमंत्री पद की रेस में डीके शिवकुमार के अलावा मल्लिकार्जुन खड़गे का भी नाम शामिल है। माना जा रहा है कि अगर डीके शिवकुमार के नाम पर सहमति नहीं बनती है तो खड़गे को मुख्यमंत्री, सिद्धारमैया को राज्यसभा सांसद और केसी वेणुगोपाल को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है। अगर डीके शिवकुमार इस बार चूके तो उनका इंतजार और लंबा हो सकता है।
