केरल हाई कोर्ट में एक अनोखा मामले पहुंचा। दरअसल, केरल हाई कोर्ट में एक साधारण नारियल का पेड़ एक अनोखी कानूनी लड़ाई का केंद्र बन गया। सुनवाई करते हुए एक कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'अगर पेड़ में हंसने की क्षमता होती, तो वह उसको लेकर झगड़ रहे पड़ोसियों पर हंसता।'
दरअसल, केरल में एक पड़ोसी के घर के सामने दुसरे पड़ोसी का नारियल का पेड़ था। इसको लेकर एक पड़ोसी ने हाई कोर्ट से कहा कि इस पेड़ से उसके परिवार की जान को खतरा है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीवी कुन्हीकृष्णन ने पेड़ से खतरा होने की आशंका को लेकर दायर एक रिट याचिका खारिज करते हुए दोनों पड़ोसियों से अपने मतभेद भुलाकर 'एक कप चाय या कॉफी' पर साथ बैठक कर विवाद सुलझाने का आग्रह किया।
'केस अनावश्यक मुकदमेबाजी का एक उदाहरण'
जज ने कहा, 'याचिकाकर्ता और नौवें प्रतिवादी के बीच इस नारियल के पेड़ को लेकर लड़ाई जारी है। अगर नारियल के पेड़ में हंसने की क्षमता होती, तो वह झगड़ रहे इन पड़ोसियों पर जरूर हंसता।' यह मामला तिरुवनंतपुरम जिले के कराकुलम गांव स्थित दो पड़ोसी संपत्ति मालिकों से जुड़ा है। जस्टिस कुन्हीकृष्णन ने 18 जून के अपने आदेश में इस मुकदमेबाजी को पड़ोस के एक मामूली विवाद से उत्पन्न अनावश्यक मुकदमेबाजी का एक उदाहरण बताया।
यह भी पढ़ें: गुजरात में केजरीवाल को झटका, AAP विधायक चैतर वसावा को 7 साल की जेल
'एक कप चाय के साथ बैठकर हो जाना चाहिए समाधान'
उन्होंने कहा कि जिस मामले का समाधान 'एक कप चाय या कॉफी के साथ बैठकर' हो जाना चाहिए था, वह अब 'पूर्ण विकसित कानूनी लड़ाई' में बदल गया है। फैसले में कहा गया कि कानून बुनियादी पड़ोसी सद्भावना का विकल्प नहीं बन सकता। कोर्ट ने पक्षकारों को यह भी याद दिलाया कि पड़ोसियों को आपसी विश्वास और सहयोग के साथ रहना चाहिए।
नारियल पेड़ से बिल्कुल भी खतरा नहीं
एक असामान्य पहल करते हुए जज ने बाइबिल का उद्धरण दिया, जिसमें कहा गया है, 'अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे स्वयं से करते हो।' उन्होंने दोनों पक्षों से इस पर अमल करने और चाय या कॉफी पर बैठकर विवाद सुलझाने का आग्रह किया। कोर्ट ने पाया कि पंचायत की रिपोर्ट, लोकायुक्त के निर्देशों और एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट के आलोक में इस नारियल के पेड़ से बिल्कुल भी कोई खतरा नहीं है।
यह भी पढ़ें: हल्दिया पोर्ट को ही क्यों बनाया गया देश का 41वां सीपोर्ट इमिग्रेशन चेकपॉइंट?
कोर्ट में जुर्माना क्यों नहीं लगाया?
कोर्ट ने यह भी कहा कि केरल पंचायत राज अधिनियम की धारा 238 के तहत कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह प्रावधान तभी लागू होता है जब किसी पेड़ के गिरने से लोगों या संपत्ति को खतरा होने की आशंका हो। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक समय बर्बाद करने के लिए दोनों पक्षों पर जुर्माना लगाना उचित होता, लेकिन उसने ऐसा नहीं करने का निर्णय लिया।
याचिकाकर्ता ने किया एक लाख रुपये का भुगतान
यह विवाद पहले ही स्थानीय पंचायत, राजस्व अधिकारियों और स्थानीय स्वशासन संस्थानों के लोकायुक्तों तक पहुंच चुका था। हाई कोर्ट ने स्थल निरीक्षण के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर भी नियुक्त किया था, जिसके पारिश्रमिक के रूप में याचिकाकर्ता ने एक लाख रुपये का भुगतान किया। एडवोकेट कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नारियल का पेड़ मजबूत जड़ों वाला है और उसके गिरने का कोई तात्कालिक खतरा नहीं है। इसके बावजूद याचिकाकर्ता संतुष्ट नहीं हुआ और उसने अपने दावे के समर्थन में कोर्ट के सामने वीडियो भी दिखाए थे।


