संजय सिंह ,पटना। बिहार में पुलिस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से पांच करोड़ रुपये के मानहानि नोटिस भेजे जाने का मामला अब राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद का रूप लेता दिख रहा है। बक्सर से सांसद सुधाकर सिंह ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर इस मामले में सरकार की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या सरकारी कामकाज से जुड़े मामले में मानहानि का नोटिस भेजने के लिए राज्य सरकार से पूर्व अनुमति ली गई थी।

 

सांसद ने अपने पत्र में 5 करोड़ रुपये की मानहानि राशि को हास्यास्पद बताते हुए इसका आधार पूछा है। उन्होंने सीएम से यह भी स्पष्ट करने का आग्रह किया है कि क्या गृह मंत्री के तौर पर उन्होंने या राज्य सरकार ने इस कार्रवाई की अनुमति दी है? हालांकि, पत्र में अनुमति और नियमों को लेकर जो सवाल उठाए गए हैं उन पर संबंधित पक्षों का आधिकारिक जवाब अभी तक नहीं आया है।

 

यह भी पढ़ें: कोलकाता भगदड़: बारिश, गलत अनाउंसमेंट या आयोजकों की लापरवाही, हादसा क्यों हुआ?

सरकारी नियमों का हवाला देकर मांगा जवाब

सुधाकर ने अपने पत्र में ऑल इंडिया सर्विस (कंडक्ट ) रूल्स , 1968 और बिहार गवर्नमेंट Servant's कंडक्ट रूल्स , 1976 का हवाला दिया है। उनका तर्क है कि सरकारी पद पर रहते हुए आधिकारिक कार्यों से संबंधित विवाद में मानहानि की कार्रवाई करने से पहले निर्धारित नियमों और अनुमति संबंधी प्रावधानों की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

 

उन्होंने सीएम से पूछा है कि इस मामले में सरकार की क्या भूमिका है। यदि आवश्यक अनुमति नहीं ली गई है तो संबंधित अधिकारी को सरकारी नियमों की जानकारी देने की व्यवस्था की जानी चाहिए। इन नियमों के लागू होने और इस विशेष मामले में पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता को लेकर आधिकारिक स्थिति स्पष्ट होना अभी बाकी है।

कार्यशैली पर उठाए सवाल

सांसद ने अपने पत्र में बिहार के प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले दो दशकों में कई अधिकारियों के व्यवहार में जनप्रतिनिधियों के प्रति उपेक्षा और अहंकार बढ़ा है। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारी जनता के सेवक हैं जबकि सांसद और विधायक जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। सुधाकर ने सीएम को उनके नगर विकास मंत्री रहने के समय का एक पुराना किस्सा भी याद दिलाया। उन्होंने तत्कालीन पटना नगर आयुक्त कुलदीप नारायण के साथ हुए विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि जनप्रतिनिधियों के सम्मान और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न पहले भी उठता रहा है। 

 

अपने पत्र में सांसद ने दावा किया कि करीब डेढ़ साल पहले दीपक कुमार से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कुंदन कृष्णन ने अपने मातहत DSP के माध्यम से उन्हें और उनके भाई को परिणाम भुगतने की धमकी दिलवाई थी। सुधाकर के अनुसार, उन्होंने इस संबंध में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लिखित शिकायत भी दी थी। उन्होंने बिहार में अपराध को लेकर किसानों के संबंध में कुंदन कृष्णन के कथित पुराने बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि आलोचना के बाद अधिकारी को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी।

भरत भूषण तिवारी हत्याकांड का भी किया जिक्र

सांसद सुधाकर ने अपने पत्र में भरत भूषण तिवारी हत्याकांड का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय कुंदन कृष्णन बिहार STF के DG के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने हत्या के दिन की कार्रवाई, निर्णय प्रक्रिया, अधिकारियों के बीच संवाद और पुलिस मुख्यालय की भूमिका की जांच किए जाने की आवश्यकता बताई। सुधाकर का कहना है कि किसी घटना के बाद अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाना एक सांसद के रूप में उनकी जवाबदेही का हिस्सा है। 

 

यह भी पढ़ें: नोएडा: किराए के मकान में चल रही थी ड्रग्स की फैक्ट्री, 45 करोड़ का सामान बरामद 

 

उनके अनुसार, मानहानि का नोटिस भेजकर संबंधित अधिकारी खुद को सवालों से बाहर नहीं रख सकते। हालांकि, किसी अधिकारी की जिम्मेदारी या संभावित दोष का निर्धारण जांच के निष्कर्षों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर ही किया जा सकता है। पत्र के अंत में सुधाकर  ने मुख्यमंत्री से इस मामले में स्पष्ट रुख अपनाने की अपेक्षा जताई है।

 

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है। निर्वाचित प्रतिनिधियों को सरकारी कामकाज की समीक्षा करने का अधिकार होना चाहिए। अब इस मामले में बिहार सरकार की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी। साथ ही, मानहानि नोटिस के आधार, सरकारी अनुमति से जुड़े सवाल और सांसद के लगाए गए आरोपों पर संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आने के बाद ही विवाद की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।