ओडिशा में एक शख्स को फर्जी वारंट के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसे जेल भी भेज दिया गया था। अब ओडिशा हाई कोर्ट ने कहा है कि इस शख्स को 30 हजार का जुर्माना दिया जाए। हाई कोर्ट ने भुवनेश्वर के सब-डिविजनल जुडिशल मजिस्ट्रेट को यह पता लगाने के लिए भी कहा है कि यह नकली वारंट आखिर कैसे तैयार हुआ। उन्होंने इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।

 

इस पूरे मामले पर सुनवाई करते हुए ओडिशा हाई कोर्ट के जस्टिस आर.के. पटनायक ने 23 जुलाई को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने यह साफ किया कि जितने भी दस्तावेज और सबूत सामने आए हैं उन्हें देखकर साफ पता चलता है कि उस व्यक्ति की गिरफ्तारी और हिरासत पूरी तरह से अवैध थी,  उसे 30 हजार रुपये का मुआवजा मिलना ही चाहिए।  

 

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मारपीट के आरोप

पीड़ित ने अदालत को अपनी बात बताते हुए कहा था कि जब उसे इस फर्जी वारंट के आधार पर पकड़ा गया। उसने अपनी गिरफ्तारी के तुरंत बाद ही पुलिस थानें में इसकी शिकायत दर्ज कराई थी और बड़े पुलिस अधिकारियों से मिलकर अपनी बात रखी थी। इसके अलावा, उसका यह भी गंभीर आरोप था कि जब पुलिस उसे भुवनेश्वर की एसडीजेएम कोर्ट के परिसर में लेकर गई थी तो वहां भी उसके साथ मारपीट की गई थी।  

 

ओडिशा हाई कोर्ट के पिछले आदेशों के बाद भुवनेश्वर के एसडीजेएम ने अपनी एक रिपोर्ट कोर्ट में जमा कराई थी। इस रिपोर्ट में एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ कि निचली अदालत द्वारा 20 नवंबर, 2024 को ऐसा कोई भी गैर-जमानती वारंट जारी ही नहीं किया गया था। यानी कागजों पर जो वारंट घूम रहा था उसका असल अदालत से कोई लेना-देना नहीं था।  

पुलिस का पक्ष

इस मामले में पुलिस ने अदालत के आदेश के पालन में अपना लिखित जवाब और शपथ पत्र दाखिल किया और बताया कि उन्होंने अपनी तरफ से कोई गड़बड़ी नहीं की है। पुलिस का कहना था कि उनके थाने में स्पीड पोस्ट के जरिए एक गैर-जमानती वारंट की फोटोकॉपी आई थी, जिस पर अदालत की नकली मुहर लगी हुई थी। पुलिस ने उसी कागज को सच मानकर आगे की कार्रवाई पूरी कर दी थी जिससे थाने के स्तर पर किसी भी तरह की गड़बड़ी या गलती से साफ इनकार किया गया।  

 

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हाई कोर्ट के निर्देश

पुलिस के लिखित जवाब और केस की डायरी को बहुत ध्यान से देखने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि इस नकली वारंट को बनवाने या भेजने में किसी की बड़ी गड़बड़ी रही है। अदालत ने कटक के डीसीपी को सख्त आदेश दिया है कि वह इस अवैध गिरफ्तारी और फर्जी वारंट की बहुत अच्छे से जांच करें। इसके साथ ही अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि जब जांच पूरी हो जाएगी और जो भी पुलिसवाला, कोर्ट का कर्मचारी या दूसरा इंसान इस गलती के लिए दोषी मिलेगा, मुआवजे के वे तीस हजार रुपये उसी की जेब से वसूले जाएंगे।