पश्चिम बंगाल एक बार फिर से अपना ही इतिहास दोहराता दिख रहा है। ठीक वैसा ही कुछ अब ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ घट रहा है जैसा कि साल 2011 में लेफ्ट के साथ हुआ था। तीन दशक से ज्यादा समय तक सत्ता में रहे लेफ्ट को जैसे ही ममता बनर्जी ने हराया था, तुरंत लेफ्ट के तमाम नेता उनके साथ खड़े होने लगे थे। अब एक बार फिर से वही बंगाल में हो रहा है। ममता बनर्जी की हार के साथ ही TMC टूटने लगी है। उसके संगठन में फूट पड़ गई है और पार्षद से लेकर विधायक और सांसद तक बेचैन दिखने लगे हैं। हाल ही में एक सरकारी मीटिंग में टीएमसी के कई विधायकों के पहुंचने और सांसद काकोली घोष के रुख ने TMC की नींद उड़ा दी है।

 

15 साल के बाद पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर हुईं ममता बनर्जी के लिए असली संकट की घड़ी अब शुरू हुई है। राज्य में हार का असर अब TMC के संसदीय दल में भी दिख रहा है। काकोली घोष ने पार्टी के पदों से इस्तीफा देते हुए I-PAC को लेकर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे ही सवाल कई अन्य नेता भी खड़े कर चुके हैं। दूसरी तरफ पार्टी टीएमसी ने काकोली घोष को लोकसभा में चीफ व्हिप के पद से हटाकर कल्याण बनर्जी को यह पद दे दिया है। कल्याण बनर्जी को लेकर कई महिला सांसद सहज नहीं हैं और कहा जा रहा है कि आगामी संसदीय सत्र में इसको लेकर भी उठा-पटक दिख सकती है। 

इस्तीफा और खलबली

बंगाल के चुनाव में टीएमसी की हार के बाद स्थानीय स्तर पर खलबली मच गई है। अब तक सत्ता के संरक्षण में काम करने वाले तमाम पार्षद फिर से ऐसे ही संरक्षण की तलाश में हैं। यही वजह है कि राज्य के कई नगर निगमों में दलबदल देखने को मिल रही है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, निगमों और नगर पालिकाओं में टीएमसी के कई पार्षदों ने या तो ऑफिस जाना बंद कर दिया है या इस्तीफा दे दिया है। इनकी संख्या 127 तक बताई जा रही है। ममता बनर्जी ने लोगों से एकजुट रहने की अपील की है। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा है, 'जो लोग संगठन में रहने के इच्छुक नहीं थे, वे अपना फैसला लेने के लिए आजाद थे।'

 

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यह भी कहा जा रहा है कि कई नेताओं को अपने खिलाफ कार्रवाई का डर है इसलिए वे पहले ही सत्ताधारी बीजेपी के नजदीक होना चाहते हैं। नतीजा यह हुआ कि अब तक 6 नगर पालिकाएं भंग कर दी गई हैं। इसके अलावा, कई नेता सीधे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से संपर्क करके अपने पुराने संबंधों की याद दिला रहे हैं। पार्षदों के इस्तीफे पर बंगाल सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल का कहना है कि इससे दैनिक कामकाज प्रभावित हो रहा है और नागरिक सेवाएं बाधित हो रही हैं।

विधायक, सांसद भी बेचैन

चुनाव नतीजों के बाद से ही टीएमसी में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कितने विधायक उसके साथ अभी भी हैं। कहा गया था कि जब टीएमसी विधायकों की मीटिंग बुलाई गई थी, उस वक्त कम से कम 10 विधायक मीटिंग में नहीं पहुंचे थे। अब टीएमसी के 6 विधायकों और सांसद काकोली घोष दास्तीदार के सीएम शुभेंदु अधिकारी की एक मीटिंग में शामिल होने से खलबली मच गई है। 

 

इतना ही नहीं, विधानसभा स्पीकर रतींद्र नाथ बोस के चेंबर में टीएमसी के दो विधायकों रिताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात भी की। वहीं, मुख्यमंत्री शुभेंद की मीटिंग में शामिल होने के बारे में काकोली घोष ने कहा है कि प्रशासन सबका है और यह किसी पार्टी का कार्यक्रम नहीं है।

 

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इस बारे में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है, 'जब हम विपक्ष में थे तब हमें प्रशासनिक बैठकों में कभी नहीं बुलाया जाता था। हमने तय किया है कि इसमें विधायकों और सांसदों को बुलाया जाए और बरासात की सांसद ने इसका सकारात्मक जवाब भी दिया।' बताया गया है कि काकोली घोष के अलावा टीएमसी के विधायक अनीसुर रहमान, बुरहान-उल-मुकद्दीन, बीना मंडल, सुरजीत मित्रा, उषारानी मंडल और अब्दुल मतीन भी इस मीटिंग में शामिल थे। यह मीटिंग जिस क्षेत्र के लिए हुई उसमें कुल 57 विधानसभी सीटें आती हैं और इसमें से 50 पर बीजेपी की जीत हुई है।

संभाल नहीं पा रहीं ममता बनर्जी?

उधर पार्टी में हो रहे बिखराव को संभालने के लिए ममता बनर्जी की कोशिशें जारी हैं। वह एकजुटता की अपील कर रही हैं। इसी क्रम में वह पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कई बार मुलाकात और चर्चा भी कर चुकी हैं। हाल ही में कोलकाता नगर निगम के टीएमसी पार्षद ताड़क सिंह ने इस्तीफा दे दिया। ममता बनर्जी ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया लेकिन वह नहीं गए।

 

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ये घटनाएं 2011 की याद दिला रही हैं। उससे पहले भी बंगाल में ऐसा ही होता आया है। कांग्रेस के बाद जब लेफ्ट के हाथ में सत्ता गई तो वही नेता कांग्रेस से लेफ्ट में आ गए और सत्ता के साथ रहे। इसी तरह लेफ्ट के तमाम नेता ममता बनर्जी के साथ गए और अब ऐसे ही दर्जनों नेता नई सत्ताधारी पार्टी बीजेपी से करीबी बढ़ा रहे हैं। खुद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी पर आरोप लगे थे कि उनके ताल्लुक नक्सलियों से भी रहे हैं। बाद में वह ममता बनर्जी के बेहद खास लोगों में शुमार हुए और अब वह बीजेपी में आकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बन गए हैं।