उत्तर प्रदेश में सड़क हादसों पर लगाम लगाने और लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करने के लिए एक नवंबर से 30 नवंबर तक यातायात माह चलाया जाएगा। इस दौरान जागरूकता अभियान, चेकिंग और नियमों का पालन कराने के लिए विशेष कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब परिवहन विभाग के प्रवर्तन दस्ते में पर्याप्त कर्मचारी ही नहीं हैं, तो पूरे महीने सड़क सुरक्षा अभियान जमीन पर कैसे उतरेगा?

विभाग में नए स्टाफ की कमी और बड़ी संख्या में खाली पद इस अभियान की तैयारियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। सड़क हादसों के आंकड़े हालात की गंभीरता बता रहे हैं। वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश में 50,769 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इन हादसों में 27,205 लोगों की मौत हुई, जबकि 38,869 लोग घायल हुए। ऐसे में यातायात माह केवल जागरूकता के कार्यक्रमों तक सीमित रखने के बजाय सड़कों पर प्रभावी निगरानी, नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई और दुर्घटना संभावित स्थानों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसके लिए प्रशिक्षित और पर्याप्त प्रवर्तन स्टाफ जरूरी है, लेकिन विभाग में बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं।

प्रवर्तन दस्ते में कर्मचारियों की भारी कमी

परिवहन विभाग के प्रवर्तन अमले में स्वीकृत पदों के मुकाबले तैनात कर्मचारियों की संख्या काफी कम है। सबसे ज्यादा कमी प्रवर्तन सिपाहियों के पदों पर है। विभाग में प्रवर्तन सिपाहियों के 737 पद स्वीकृत हैं, लेकिन केवल 164 कर्मचारी ही तैनात हैं। इस तरह 573 पद खाली हैं। यानी सड़क पर वाहनों की जांच, यातायात नियमों का पालन कराने और कार्रवाई करने वाले दस्ते का बड़ा हिस्सा कर्मचारियों के अभाव से जूझ रहा है।प्रवर्तन अधिकारियों के स्तर पर भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है।

सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी (प्रवर्तन) के 116 स्वीकृत पदों में से 65 पर ही तैनाती है, जबकि 51 पद खाली हैं। यात्री-मालकर अधिकारियों के 120 पदों में से 83 पर कर्मचारी कार्यरत हैं और 37 पद रिक्त हैं। प्रवर्तन पर्यवेक्षकों के 128 पदों में से 117 भरे हैं, जबकि 11 खाली हैं। वहीं, प्रवर्तन चालकों के 165 पदों में से केवल 44 पर तैनाती है और 121 पद रिक्त पड़े हैं।

 

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नए स्टाफ की कमी से अभियान पर सवाल

यातायात माह के दौरान स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम, वाहन चालकों को नियमों की जानकारी, हेलमेट और सीट बेल्ट के इस्तेमाल पर जोर, ओवरलोडिंग और अन्य उल्लंघनों के खिलाफ कार्रवाई जैसे काम किए जाने हैं। इसके लिए विभाग को लगातार सड़क पर मौजूद रहना पड़ता है। लेकिन जब प्रवर्तन सिपाहियों से लेकर अधिकारियों और चालकों तक के पद खाली हों, तो सीमित कर्मचारियों पर ही अभियान की जिम्मेदारी आ जाती है।

कर्मचारियों की कमी का असर केवल चेकिंग तक सीमित नहीं रहता। अलग-अलग मार्गों पर निगरानी, नियम तोड़ने वाले वाहनों के खिलाफ कार्रवाई, व्यावसायिक वाहनों की जांच और दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में प्रवर्तन जैसे काम भी प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक महीने तक चलने वाले अभियान में विभाग पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध करा पाएगा या जागरूकता कार्यक्रमों का दबाव भी पहले से तैनात कर्मचारियों पर ही रहेगा?

लाखों खर्च कर जागरूकता, लेकिन सड़क पर कार्रवाई कौन करेगा?

यातायात जागरूकता अभियान पर हर साल सरकारी संसाधन खर्च किए जाते हैं। इसका उद्देश्य लोगों को सड़क सुरक्षा के प्रति संवेदनशील बनाना और हादसों में कमी लाना है। लेकिन जागरूकता के साथ नियमों का उल्लंघन करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है। केवल कार्यक्रम आयोजित करने, संदेश प्रसारित करने और लोगों को नियम समझाने से लक्ष्य पूरा नहीं होगा, जब तक सड़कों पर पर्याप्त प्रवर्तन अमला मौजूद न हो।

 

सड़क हादसों में हजारों लोगों की जान जाने के बीच परिवहन विभाग के सामने दोहरी चुनौती है, एक ओर लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करना और दूसरी ओर नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई सुनिश्चित करना। इसके लिए खाली पद भरना, नए कर्मचारियों की तैनाती और मौजूदा स्टाफ का प्रभावी इस्तेमाल अहम है।

438 प्रवर्तन सिपाहियों की भर्ती से उम्मीद

परिवहन विभाग के प्रवर्तन अमले में कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए भर्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ी है। विभाग के अपर परिवहन आयुक्त (प्रवर्तन) केडी सिंह के मुताबिक, उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की ओर से 438 प्रवर्तन सिपाहियों की अंतिम सूची जारी की जा चुकी है। चयनित अभ्यर्थियों के पुलिस सत्यापन के लिए पत्र भेजे गए हैं। प्रक्रिया पूरी होने के बाद इनके अगले महीने तक विभाग में कार्यभार संभालने की उम्मीद है।हालांकि, 438 नए सिपाहियों की तैनाती से भी स्वीकृत पदों के मुकाबले मौजूद पूरी कमी दूर नहीं होगी। फिलहाल 573 प्रवर्तन सिपाहियों के पद खाली हैं। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया जल्द पूरी कर नए कर्मचारियों को तैनात करना और अन्य रिक्त पदों को भरना विभाग के लिए बड़ी चुनौती है।

 

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हादसों पर अंकुश के लिए जरूरी है मजबूत अमला

उत्तर प्रदेश में हर साल बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं और मौतें यह बताती हैं कि सड़क सुरक्षा को केवल एक महीने का अभियान बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। यातायात माह के दौरान चलने वाली गतिविधियों के साथ पूरे साल नियमित चेकिंग, प्रभावी प्रवर्तन और कर्मचारियों की पर्याप्त उपलब्धता जरूरी है।एक तरफ नवंबर में यातायात माह चलाने की तैयारी है, दूसरी तरफ परिवहन विभाग का प्रवर्तन अमला कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में असली चुनौती अभियान की शुरुआत करना नहीं, बल्कि उसे पर्याप्त स्टाफ के साथ जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करना है। अब निगाह इस पर रहेगी कि विभाग खाली पद भरने और नए कर्मचारियों को तैनात करने की दिशा में कितनी तेजी दिखाता है।