अगर आप पिछले कुछ सालों में पीतल के बर्तन या कच्चा माल खरीदने बाजार गए हैं तो आपने कीमतों में आई भारी उछाल को जरूर महसूस किया होगा। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 5 सालों (2021 से 2026) में भारत में पीतल के दामों में करीब 98.8% यानी लगभग दोगुनी बढ़त दर्ज की गई है। इस जबरदस्त तेजी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय और भारतीय बाजारों में तांबे और जस्ते (जिंक) की कीमतों में आई भारी उछाल है। चूंकि पीतल तांबे और जस्ते को मिलाकर ही तैयार किया जाता है इसलिए इन कच्चे धातुओं के महंगे होते ही पीतल के बर्तनों के दाम भी आसमान छूने लगे हैं।

 

गुजरात का जामनगर भारत का सबसे बड़ा पीतल निर्माण केंद्र है। वहां देश की लगभग 90% पीतल की जरूरतें पूरी की जाती हैं। ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रिकल फिटिंग, वाल्व और हार्डवेयर बनाने वाली यहां की करीब 6,000 से 7,000 छोटी और सूक्ष्म औद्योगिक इकाइयों में रोजाना 600 से 700 टन मेटल स्क्रैप की खपत होती है। हालांकि, इस उद्योग की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि इसे चलाने के लिए लगभग 70% कच्चा माल विदेशों से आयात होने वाले स्क्रैप से पूरा करना पड़ता है।

 

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5 सालों में कैसे बढ़े दाम?

नया तांबा और जस्ता मिलाकर पीतल बनाना बेहद महंगा पड़ता है, इसलिए भारतीय निर्माता पुराने पीतल, बर्तन, जहाज तोड़ने के उद्योग से निकले कबाड़ और विदेशी 'हनी स्क्रैप' को पिघलाकर काम चलाते हैं। लेकिन अब विदेशों में स्क्रैप की बढ़ती कीमतें, अशुद्धियों के कारण होने वाला नुकसान और अंतरराष्ट्रीय नियमों में बदलाव इस पूरे सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती बन रहे हैं। अगर हम 2021 से लेकर 2026 तक हर साल के आखिर में पीतल के औसत बेस रेट (स्क्रैप/कच्चा माल) पर नजर डालें तो तेजी की तस्वीर साफ दिखाई देती है।

 

2021 के शुरुआत में दाम 420 रुपये प्रति किलो थी जबकि 2026 में मौजूदा दाम 835 रुपये प्रति किलो तक हो गई है। पिछले 5 सालों में प्रति किलो 415 रुपये का सीधा इजाफा हुआ है। इस बढ़ोतरी के हिसाब से 2021 के मुकाबले 2026 तक पीतल के दाम में कुल 98.81% का बड़ा अंतर आ चुका है।

कितना स्क्रैप इस्तेमाल करता है भारत?

खान मंत्रालय के कॉपर विजन डॉक्यूमेंट और 'इंटरनेशनल कॉपर एसोसिएशन इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने लगभग 3.10 लाख टन कॉपर स्क्रैप का आयात किया। इसमें हर साल 10% की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वहीं वित्त वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 5.34 लाख टन कॉपर स्क्रैप और 2.52 लाख टन पीतल स्क्रैप की सप्लाई रही।

 

इसमें से 3.69 लाख टन पीतल स्क्रैप को सीधे स्थानीय भट्टियों में पिघलाकर नए उत्पाद तैयार किए गए। इन आंकड़ों से साफ है कि भारत में रीसाइक्लिंग का बहुत बड़ा बाजार है लेकिन देश में खराब क्वालिटी के स्क्रैप को रीफाइन करने की आधुनिक क्षमताएं अभी भी सीमित हैं।

 

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संयुक्त राष्ट्र के व्यापार आंकड़ों के मुताबिक, भारत कॉपर और कॉपर-अलॉय स्क्रैप के आयात के लिए प्रमुख रूप से सऊदी अरब, अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, कोलंबिया और यूएई जैसे देशों पर निर्भर है। जामनगर फैक्ट्री ओनर्स एसोसिएशन के मुताबिक, अकेले जामनगर में ही हर महीने करीब 500 कंटेनर पीतल स्क्रैप विदेशों (अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों) से पहुंचता है।

क्यों महंगे हो रहे हैं पीतल के बर्तन?

पीतल कोई अकेली धातु नहीं है, बल्कि यह लगभग 60 से 70 प्रतिशत तांबे और 30 से 40 प्रतिशत जस्ते के मिश्रण से बनती है। इस समय वैश्विक कमोडिटी बाजारों में तांबे का भाव अपने उच्चतम स्तर के आसपास बना हुआ है। कच्चे माल की लागत बढ़ने से पीतल की ढलाई और बर्तनों का निर्माण काफी महंगा हो गया है, जिसका सीधा असर आम खरीदारों के बजट पर पड़ रहा है।

 

विदेशों से आने वाले 'हनी स्क्रैप' और पुराने कबाड़ पर ज्यादा निर्भर रहने से छोटे निर्माताओं के सामने दो बड़ी समस्याएं आती हैं। पहला, आयातित स्क्रैप में अक्सर एल्युमिनियम, लोहे और अन्य धातुओं की मिलावट होती है। इसे छांटने और साफ करने में ज्यादा खर्च आता है। दूसरा, स्क्रैप में अशुद्धियां होने के कारण सही ग्रेड का पीतल बनाने के लिए अलग से नया मेटल मिलाना पड़ता है। इससे मेटल का नुकसान बढ़ता है और तैयार सामान की क्वालिटी खराब होने से रिजेक्शन रेट बढ़ जाता है।

 

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यूरोपीय संघ मई 2027 से गैर-OECD देशों को कबाड़ के निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लागू करने जा रहा है। यूरोप से आने वाली स्क्रैप सप्लाई रुकने या महंगी होने की स्थिति में जामनगर के पीतल उद्योग के सामने कच्चे माल का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। सामान्य स्थिति में स्क्रैप से बना पीतल सस्ता पड़ता है, लेकिन अगर स्क्रैप में मिलावट ज्यादा हो तो उसकी छंटाई और रिजेक्शन की वजह से यह नए पीतल जितना ही महंगा साबित होने लगता है।

 

अगर भारत को विदेशी स्क्रैप पर अपनी निर्भरता कम करनी है तो केवल कबाड़ इकट्ठा करना काफी नहीं होगा। इसके लिए चार कदम उठाने जरूरी हैं। पहला, घरेलू स्तर पर पुराने बर्तनों, नल, ऑटो पार्ट्स और इलेक्ट्रिकल सामान के स्क्रैप को सही तरीके से इकट्ठा करना। दूसरा, पीतल, तांबे और कांसे को अलग-अलग श्रेणी में बांटने के आधुनिक सेंटर बनाना (जैसे जामनगर में बना METALAB टेस्टिंग सेंटर)। तीसरा, खान मंत्रालय के अनुसार, कबाड़ को सीधे पिघलाने के बजाय उसे रीफाइन करने की क्षमता बढ़ाना और चौथा, विदेशी सप्लाई रुकने पर बैकअप के रूप में घरेलू रीसाइक्लिंग चेन को तैयार रखना।