योग गुरु बाबा रामदेव ने 11 सितंबर को एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। इस वीडियो में वह एक ऐसे हुक्के का जिक्र कर रहे हैं, जिससे वात-पित्त-कफ त्रिदोष और सभी जेनेटिक डिजीज को जड़ से खत्म हो जाने का दावा किया जा रहा है। वीडियो में एक महिला हुक्के से धुआं खींचती नजर आ रही है, जबकि बाबा रामदेव उसमें मुलेठी, हल्दी, गाय का घी और कपूर जैसी चीजें डालते दिख रहे हैं। 

 

इसमें कुटी हुई मुलेठी, गाय का शुद्ध घी, चुटकीभर हल्दी, राई, देसी कपूर और काकड़ा सिंगी जैसी आयुर्वेदिक चीजें मिलाने का दावा किया गया है। बाबा रामदेव का कहना है कि इस मिश्रण से निकलने वाला धुआं सांस के जरिए अंदर लेने पर बंद नाक, खांसी और कफ जैसी दिक्कतों में राहत देता है। वीडियो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा गया है 'वात-पित्त-कफ त्रिदोष व सभी जेनेटिक डिजीज को जड़ से कैसे मिटाएं?' 

 

ऐसे में सवाल उठता है कि अगर हुक्का सेहत के लिए नुकसानदेह है तो क्या उसे आयुर्वेदक कह देने से नुकसानदेह चीज फायदेमंद बन जाएगी? विज्ञान की भाषा में देखें तो धुआं आखिर धुआं ही होता है, चाहे वह तंबाकू जलाकर बने या जड़ी-बूटियां जलाकर। धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड और विषैले तत्व पाए गए हैं, जो गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं।   

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आयुर्वेदक चीजें हैं तो क्या नुकसान नहीं करेगा हुक्का? 

अमेरिका की सरकारी स्वास्थ्य संस्था CDC की रिपोर्ट के मुताबिक, धुएं में कार्बन मोनोऑक्साइड और विषैले तत्व पाए गए हैं, जो फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसमें हर्बल या आयुर्वेदिक लेबल लगाने से खतरा खत्म नहीं हो जाता है। वील कॉर्नेल मेडिसिन की स्टडी में हल्का हुक्का इस्तेमाल भी फेफड़ों में असामान्यता, DNA डैमेज और फेफड़ों की क्षमता कम कर सकता है।

हुक्के के आगे 'आयुर्वेदिक' शब्द जोड़ने से इसकी हकीकत नहीं बदलती। फेफड़ों तक धुआं और बहुत बारीक कण पहुंचते हैं। इसमें कई तरह की गैसें भी हो सकती हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हुक्के में तंबाकू, जड़ी-बूटियां या किसी और तरह का पौधा जलाया जा रहा है। इसलिए हर्बल या बिना तंबाकू वाला हुक्का भी सुरक्षित नहीं माना जा सकता। डॉ. समीर गार्डे, कंसल्टेंट-इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट, फोर्टिस एस.एल. रहेजा अस्पताल, माहिम-मुंबई  

डॉक्टर समीर ने बताया कि किसी भी तरह के पौधे को जलाने से निकलने वाला धुआं सांस की नली में जलन पैदा कर सकता है और खांसी, सीने में घरघराहट और सांस की नलियों में सूजन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खासतौर से अस्थमा या COPD यानी क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज से पीड़ित लोगों के लिए यह ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है।

 

उन्होंने बताया कि हुक्के में इस्तेमाल होने वाले पानी को भी सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता। पानी धुएं का तापमान कुछ कम कर सकता है और कुछ पदार्थों को रोक सकता है, लेकिन सभी हानिकारक पदार्थों को खत्म नहीं करता।

 

यह समझना भी जरूरी है कि आयुर्वेदिक दवा और किसी आयुर्वेदिक उत्पाद का धुआं लेना, दोनों ही अलग-अलग चीजें हैं। किसी जड़ी-बूटी या आयुर्वेदिक सामग्री का औषधीय महत्व होना या उसका पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किया जाना, यह साबित नहीं करता कि उसे जलाने से निकलने वाला धुआं भी फेफड़ों के लिए सुरक्षित है।

हुक्के को लेकर नियम क्या है? 

भारत में तंबाकू सेवन को कंट्रोल में करने के लिए COTPA (सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम), 2003 लागू है। इसकी धारा 4 के तहत सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करना बैन है। बात करें तंबाकू वाले हुक्के की तो कई राज्यों में तंबाकू और फ्लेवर वाले हुक्का बार पूरी तरह बैन हैं। राज्यों ने  COTPA में संशोधन करके यह प्रतिबंधित लगाया है। 

 

कर्नाटक ने साल 2024 में COTPA में संशोधन करके राज्य में हुक्का बार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया, साथ ही तंबाकू खरीदने की कानूनी उम्र भी बढ़ाई। इसके अलावा, नियम तोड़ने पर 3 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान रखा गया। बता दें कि महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और केरल जैसे कई राज्यों में हुक्का बार और सार्वजनिक

रूप से हुक्का पीने पर सख्त पाबंदी है। 

 

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हर्बल या तंबाकू-मुक्त हुक्के की बात

यहां एक कानूनी पेंच फंसा हुआ है, साल 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया था कि अगर हुक्का बार में परोसा जा रहा हुक्का पूरी तरह तंबाकू या निकोटीन मुक्त है और COTPA का उल्लंघन नहीं हो रहा, तो पुलिस की कार्रवाई उचित नहीं है। ऐसे में कानूनी तौर पर तंबाकू मुक्त या हर्बल हुक्के को कुछ राज्यों में अभी भी अनुमति मिली हुई है, भले ही स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे भी नुकसानदेह मानते हों।