फ्लाईदुबई की फ्लाइट को बुधवार को हाईजैक होने से बचा लिया गया। भारतीय पायलट स्मित माछर की सूझबूझ से 9/11 जैसा हादसा टल गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी , डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने स्मित की बहादुरी की तारीफ की। हालांकि यह कोई पहली बार नहीं जब इजरायल को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा हो।
इजरायल अपने अस्तित्व से ही हाईजैकिंग का इलाज तलाश रहा है। 1960-70 के दशक में हाईजैकिंग की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई थी। फ्लाईदुबई फ्लाइट की असफल हाईजैकिंग के बीच आज बात करेंगे सबेना फ्लाइट 571 की... जिसे दो महिलाओं समेत चार लोगों ने अगवा किया, 16 कमांडो ने बचाव अभियान चलाया। दो मंत्री ने अपहरणकर्ताओं से बातचीत की और बाद में अभियान में शामिल तीन चेहरे इजरायल के प्रधानमंत्री बने।
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ब्लैक सितंबर का हाईजैकिंग कनेक्शन
1970 के दशक में जॉर्डन में फिलिस्तीन मुक्ति संगठन और जॉर्डन की सेना के बीच खूनी संघर्ष छिड़ा। फिलिस्तीन संगठन तत्कालीन जॉर्डन के राजा शाह हुसैन के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे। उनकी सत्ता को खुली चुनौती देने लगे। नतीजा यह हुआ कि जॉर्डन गृहयुद्ध में हजारों फिलिस्तीनियों की जान गई। बड़ी संख्या में निष्कासन झेलना पड़ा। यह सबकुछ 1970 के सितंबर महीने में हुआ। इसी की याद में 'ब्लैक सितंबर' नाम से एक संगठन बना। दशकों तक इस संगठन ने इजरायल से खुली अदावत मोल ली। ब्लैक सितंबर संगठन ने विमान हाईजैकिंग को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
सबेना की फ्लाइट 571 जब हुई अगवा
8 मई 1972 को ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना से सबेना एयरलाइंस की फ्लाइट 571 ने उड़ान भरी। 20 मिनट बाद ही चार लोगों ने विमान को अगवा कर लिया। अपहरणकर्ताओं ने पायलट पर दबाव डाला और जबरन तेल अवीव के बेन गुरियन एयरपोर्ट पर लैंडिंग करवाई। उस वक्त इस एयरपोर्ट को लोद एयरपोर्ट के नाम से जाना जाता था।
यात्रियों के बदले कैदियों की रिहाई की मांग
विमान के सुरक्षित उतरते ही अपहरणकर्ताओं ने एयरपोर्ट के ग्राउंड स्टाफ से संपर्क किया। यात्रियों के बदले 315 फिलिस्तीनी लोगों की रिहाई की मांग की। ना-नुकुर करने पर यात्रियों समेत विमान को उड़ा देने की धमकी दी। विमान में चालक दल के 10 सदस्य समेत 90 लोग सवार थे। सरकार और मीडिया तक जब बात पहुंची तो पूरे इजरायल में हड़कंप मच गया।
चार अपहरणकर्ताओं में दो महिला
विमान को ब्लैक सितंबर संगठन से जुड़े चार लोगों ने अगवा किया था। इसमें दो पुरुष अली ताहा अबू स्नीना और अबेद अल-अजीज अत्राश थे। दो महिलाएं रीमा तनौस और थेरेसा हाल्सा भी साजिश का हिस्सा थी। सभी चारों अपहरणकर्ताओं की मुलाकात घटना के एक दिन पहले 7 मई 1972 को लेबनान में हुई थी।
फर्जी पासपोर्ट से इजरायल तक पहुंचे
चारों लोगों ने लेबनान के बेरूत एयरपोर्ट से इटली जाने वाली फ्लाइट पकड़ी। अपना परिचय कपल के तौर पर दिया। फर्जी पासपोर्ट से रोम तक की यात्रा की। रोम एयरपोर्ट पर सभी चारों लोगों को जाली इजरायली पासपोर्ट मिले। इन्हीं फर्जी पासपोर्ट के सहारे सभी पहले फ्रैंकफर्ट और बाद में ब्रुसेल्स पहुंचे। आगे यही विमान ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में रुका। यहां से उड़ान भरने के 20 मिनट बाद चारों लोगों ने विमान पर अपना नियंत्रण कर लिया। उनके पास दो हैंड ग्रेनेड, दो हैंडगन और दो विस्फोटक बेल्ट थे।
जब इजरायल ने बातचीत में उलझाया
एयरपोर्ट के ग्राउंड स्टाफ ने विमान हाईजैकिंग की जानकारी इजरायली सरकार तक पहुंचाई। सरकार तुरंत हरकत में आई। रक्षा मंत्री मोशे डायन और परिवहन मंत्री शिमोन पेरेस को एयरपोर्ट भेजा। दोनों मंत्रियों की निगरानी में अपहरणकर्ताओं से बातचीत शुरू की गई। सरकार ने अधिकांश मांगों को मान लिया और जानबूझकर बातचीत में देरी की, ताकि सैन्य कार्रवाई की तैयारी जा सके।
कैसे विमान तक पहुंचे कमांडो?
दूसरी तरफ आईडीएफ की स्पेशल यूनिट 'सायेरेट मटकल' ऑपरेशन की प्लानिंग में जुट गई। 16 कमांडो का एक दस्ता तैयार किया गया। विमान लैंडिंग के 24 घंटे बाद इजरायल ने 'ऑपरेशन आइसोटोप' का आगाज किया। व्हाइट ओवरऑल पहने सभी कमांडो विमान की तरफ बढ़े। व्हाइट ओवरऑल पहनने से अपहरणकर्ताओं को लगा कि यह टेक्नीशियन टीम है और विमान के हाइड्रोलिक सिस्टम को ठीक करने आई है।
एक गोली से जब दो लोग घायल हुए
विमान के आपातकालीन द्वार से कमांडो अंदर घुसे। एक कमांडो बेंजामिन नेतन्याहू ने गेट के पास ही हाल्सा को काबू कर लिया। दूसरे कमांडो मार्को अश्केनाजी ने हाल्सा पर बंदूक की बट से हमला किया, लेकिन ट्रिगर दबने से गोली चल गई। यह गोली हाल्सा के आर-पार निकली और सीधे नेतन्याहू के कंधे पर जा लगी। दूसरी तरफ इजरायली कमांडो ने दो पुरुष अपहरणकर्ताओं को मौके पर ही मार गिराया। इजरायली कमांडो ने थेरेसा हाल्सा और 22 वर्षीय रीमा तनौस को पकड़ लिया। पूरे ऑपरेशन में तीन यात्री घायल हुए और 22 वर्षीय मिरियम एंडरसन नाम की महिला की जान गई।
इजरायली प्रधानमंत्री बनने वाले दो कमांडो
इजरायल के ऑपरेशन आइसोटोप की सबसे खास बात यह रही है कि 16 सदस्यीय कमांडो टीम में बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा एहूद बराक भी शामिल थे। बाद में यह दोनों नेता इजरायल के प्रधानमंत्री बने। इस घटना के बाद बातचीत की अगुवाई करने वाले परिवहन मंत्री शिमोन पेरेस इजरायल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों बने।
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खून से लथपथ बेंजामिन नेतन्याहू रनवे पर पड़े थे। तभी उनके भाई योनातन नेतन्याहू वहां पहुंचे और बेंजामिन को संभाला। चार साल बाद योनातन नेतन्याहू ऑपरेशन एंटेबे का हिस्सा बने और युगांडा में इजरायली बंधकों को छुड़वाने में अहम भूमिका निभाई। ऑपरेशन एंटेबे में एक कमांडो की जान गई। बाद में उसकी पहचान बेंजामिन नेतन्याहू के भाई योनातन नेतन्याहू के रूप में हुई। हाल ही में युगांडा की सरकार ने एंटेबे एयरपोर्ट के बाहर योनातन की एक प्रतिमा लगाई।
थेरेसा हाल्सा का क्या हुआ?
अरब ईसाई परिवार में जन्मी हाल्सा ने इजरायल में ही स्नातक तक पढ़ी। फिलिस्तीन मुक्ति संगठन ज्वाइन किया, क्योंकि वह फिलिस्तीनी नागरिकों और अरबों पर इजरायल के अत्याचार से परेशान थी। इजरायल की अदालत ने हाल्सा को 220 वर्ष की सजा सुनाई। हालांकि बाद में कैदियों की अदला-बदली में हाल्सा को रिहा कर दिया। उन्होंने अपनी बाकी जिंदगी जॉर्डन में बिताई। हाल्सा के दो बेटे और एक बेटी है। लेबनान की राजधानी बेरूत के पास एक कैंप में हाल्सा को विमान हाईजैक करने की ट्रेनिंग मिली थी।
