अमेरिका और सऊदी अरब के बीच ऐतिहासिक परमाणु समझौते ने जहां इजरायल की टेंशन बढ़ा दी तो वहीं रियाद के सामने असमंजस की स्थिति खड़ी कर दी है। 2009 में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बाद मध्य पूर्व में यह अमेरिका का किसी इस्लामिक देश के साथ किया गया दूसरा परमाणु समझौता है। हालांकि सऊदी अरब के साथ की गई डील यूएई की डील से बेहद अलग है। ताजा डील के तहत सऊदी अरब अपने यहां यूरेनियम का संवर्धन कर सकेगा। 

 

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को निगरानी भी नहीं करनी होगी, जबकि यह छूट यूएई को हासिल नहीं है। मगर पूरी डील में एक पेच है। सऊदी अरब को डील के तहत इजरायल को मान्यता देनी होगी। इसका ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद कर चुके हैं। लेकिन सऊदी अरब प्रशासन ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इजरायल को मान्यता देने के मामले में बेहद सतर्क है। 

 

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  • सऊदी अरब में फिलिस्तीन के प्रति गहरी सहानुभूति है। अगर फिलिस्तीन राज्य के बिना सऊदी सरकार इजरायल को मान्यता देती है तो न केवल उसकी जनता, बल्कि मुस्लिम जगत में गलत संदेश जाएगा। इस्लामिक देशों में उसकी पकड़ कमजोर होगी। दुनियाभर के सुन्नी मुस्लिमों में सऊदी अरब का खास प्रभाव है। मान्यता देने से उसका यह प्रभाव भी घट सकता है।

 

  • हाल के दिनों में सऊदी अरब ने तुर्की के साथ अपने रिश्तों को बेहतर किया है। मौजूदा समय में तुर्की और इजरायल के बीच तनाव है। अगर इजरायल को रियाद मान्यता देता है तो तुर्की के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी कमजोर पड़ सकती है। हालांकि यह दूसरी बात है कि तुर्की ने पहले ही इजरायल को मान्यता दे रखी है।

 

  • लाल सागर में अपनी रणनीतिक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से सऊदी अरब ने सोमालिया का खुलकर समर्थन किया। दूसरी तरफ इजरायल ने सोमालिया से अलग हुए सोमालीलैंड को मान्यता देने वाला दुनिया का पहला देश बना। इजरायल को मान्यता देने का मतलब सोमालिया में उसके हितों का टकराव बढ़ेगा। यहां अपनी मूल रणनीति भी बदलने पड़ेगी।

 

  • अमेरिका और इजरायल के साथ जंग के बीच ईरान ने उन देशों को धमकी दी थी, जो इजरायल के सहयोगी हैं। अभी खाड़ी में सिर्फ बहरीन और यूएई ही इजरायल को मान्यता देने वाले इस्लामिक देश है। इन देशों को जंग में इसका खामियाजा भी उठाना पड़ा। पहले चरण में यूएई और दूसरे में बहरीन को ईरान ने खूब निशाना बनाया। सउदी अरब को यह भी खतरा है कि इजरायल के साथ उसके संबंध सीधे ईरान के खिलाफ खड़े कर देंगे, जबकि मौजूदा संघर्ष में सऊदी अरब उलझने से बचता रहा है।

 

  • पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच घनिष्ठ आर्थिक और रक्षा संबंध है। यदि इजरायल के साथ रिश्ते बेहतर होते हैं तो पाकिस्तान के साथ संबंध बिगड़ सकते है। पाकिस्तान के धार्मिक गलियारों में इजरायल के खिलाफ भावना सबसे आक्रामक है। सऊदी अरब और इजरायल के बीच सीधे राजनयिक संबंध स्थापित होने के बाद पाकिस्तान सरकार को खुलकर समर्थन करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि सरकार को घरेलू स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ सकता है।

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हूती और ईरान का एंगल समझिए

यमन की सीमा भी सऊदी अरब से लगती है। यहां के हथियारबंद हूती विद्रोहियों की न सऊदी अरब से बनती है और न ही इजरायल से। अगर दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य हुए तो हूती विद्रोही सऊदी अरब के खिलाफ मोर्चा खोल सकते हैं। वहीं मान्यता देने का मतलब यह होगा कि सऊदी अरब अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू कर सकता है, लेकिन यह शुरू करना आसान नहीं है। ईरान और हूती विद्रोही कभी नहीं चाहेंगे कि रियाद के पास परमाणु बम आए। वो भी तब जब ईरान का परमाणु बम बनाने का सपना लगभग टूटने के कगार पर है।