हूती विद्रोहियों के मामले में पाकिस्तान बेहद संयम और सावधानी का परिचय देता है। सऊदी अरब भीषण हमलों की चपेट में है। अभी तक इस्लामाबाद ने मक्का रक्षा समझौता सक्रिय नहीं किया है। जबकि बात-बात पर उसके नेता सऊदी अरब की रक्षा में जान देने और भाईचारा निभाने की दुहाई देते हैं। रियाद ने 2015 में पहली बार पाकिस्तान से हूती विद्रोहियों के खिलाफ मदद मांगी थी। उस वक्त पाकिस्तान ने अपनी संसद में प्रस्ताव पारित करके सऊदी अरब को सीधे न कह दिया था।

 

अब 10 साल बाद दोनों देश दोबारा उसी मोड़ पर आ खड़े हुए हैं। हूती विद्रोहियों के खिलाफ पाकिस्तान धमकी और चेतावनी का खेल तो खेल रहा है, लेकिन पर्दे के पीछे ईरान के साथ राजनयिक पहल और वार्ताओं का दौर चल रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंध होने के बावजूद पाकिस्तान हूती विद्रोहियों के खिलाफ कदम उठाने से क्यों डरता है? आइये इसी को समझने की कोशिश करते हैं।

 

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होर्मुज में बिगड़ सकता खेल

पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरत का लगभग 81.6% हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते खरीदता है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग ने होर्मुज को बाधित किया। नतीजा- पाकिस्तान में ऊर्जा संकट खड़ा गया। मार्च महीने में पाकिस्तान ने सऊदी अरब से अपने यानबू पोर्ट के माध्यम से लाल सागर के रास्ते तेल भेजने का अनुरोध किया। वर्तमान में पाकिस्तान अधिकांश तेल इसी रास्ते से आता है।  

लाल सागर में चुनौती

लाल सागर के प्रवेश द्वार पर ही बाब अल-मंडेब है। यहां पर हूती विद्रोहियों का कब्जा हो चुका है। अगर पाकिस्तान ने हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधी जंग में हिस्सा लिया तो सऊदी अरब से आने वाले तेल को विद्रोही बाधित कर सकते हैं। दूसरी तरफ ईरान भी उसके खिलाफ होर्मुज में मोर्चा खोल सकता है। पाकिस्तान अपनी 90 फीसद से अधिक एलएनजी कतर और अन्य खाड़ी देशों से होर्मुज के माध्यम से खरीदता है।

बिगड़ सकता है अर्थशास्त्र

पाकिस्तान के सामने एक बड़ी रणनीतिक उलझन यह है कि उसका लगभग 90 फीसद व्यापार समुद्री रास्तों से होता है। इसमें लाल सागर का सबसे अहम किरदार है। यूरोप और अमेरिका को जाने वाला पाकिस्तानी निर्यात यही से गुजरता है। जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, स्पेन और इटली उसके बड़े निर्यात केंद्र है। हूती विद्रोहियों से पंगा इस्लामाबाद का पूरा अर्थशास्त्र बिगाड़ सकता है।

 

पाकिस्तानी नागरिक बड़ी संख्या में व्यापारिक जहाजों में बतौर चालक दल काम करते हैं। यह पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा आय का अहम जरिया है। सीधी दुश्मनी लेने पर हूती विद्रोही  अदन की खाड़ी और बाब अल-मंडेब से पाकिस्तान का संपर्क काट सकते हैं। उसके जहाजों को निशाना बना सकते हैं। इसका असर उसके सबसे महत्वाकांक्षी ग्वादर पोर्ट और सबसे पुराने कराची पोर्ट पर भी पड़ेगा। 11 अगस्त को हूती विद्रोही ऐसा कर भी चुके हैं। विद्रोहियों ने एक जहाज पर हमला किया, जिनमें सवार तीन पाकिस्तानी नागरिकों की जान गई और छह घायल हुए।

 

पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई के बदले हूती और ईरान मिलकर जीसीसी समेत अन्य देशों के साथ होने वाले इस्लामाबाद के पूरे व्यापार को बाधित कर सकते हैं। भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अभी इसे झेलने की स्थिति में नहीं है। पाकिस्तान की सरकार को आने वाला संकट दिख रहा है। तभी तो उसने पहले से ही देशभर में स्मार्ट लॉकडाउन लगा दिया है, ताकि आने वाले ऊर्जा संकट को कम किया जा सके।

 

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सांप्रदायिक हिंसा का डर

हूती विद्रोहियों और ईरान के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा अपने भीतर से ही नजर आता है। अनुमान के मुताबिक देशभर में 10 से 25% के आसपास शिया मुस्लिमों की आबादी है। इनकी संख्या गिलगिट-बाल्टिस्तान, कराची, लाहौर और क्वेटा में अधिक है। संघर्ष की स्थिति में देशभर में सांप्रदायिक हिंसा फैलने का खतरा है।

जमीनी हमले का खौफ

ईरान और पाकिस्तान लगभग 900 किमी लंबी सीमा साझा करते हैं। हूती विद्रोहियों के साथ तनाव बढ़ने पर ईरान सीमा पर मोर्चा खोल सकता है। अगर ऐसा हुआ तो पाकिस्तान के सामने एक और बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। पूर्वी सीमा पर भारत के साथ रिश्ते नहीं हैं। उत्तर-पश्चिम सीमा पर अफगानिस्तान से तनातनी है। तेहरान का एक अलग मोर्चा उसकी नींद उड़ा देगा। हाल ही में ईरान ने पाकिस्तान से सटी सीमा पर सैनिकों की तैनाती भी बढ़ाई है।