मानसून सीजन में डेंगू की बीमारी सबसे ज्यादा आम होती है क्योंकि इसी मौसम में डेंगू के मच्छर पनपते हैं। यह मच्छर लोगों को काटते हैं तो उन्हें डेंगू की बीमारी होती है। ऐसे में डेंगू होने पर सबसे गंभीर होता है किसी मरीज के प्लेटलेट काउंट का गिरना। हालांकि प्लेटलेट काउंट का गिरना डेंगू में आम बात है, मगर सिर्फ प्लेटलेट के गिरने से ही बीमारी कितनी गंभीर है, यह तय नहीं होती। इलाज के दौरान मरीज के शरीर में पानी की कमी और ब्लीडिंग जैसे लक्षणों पर भी नजर रखना जरूरी होता है।

 

डेंगू का नाम आते ही सबसे पहले लोगों को तेज बुखार और प्लेटलेट काउंट गिरने की चिंता सताने लगती है। रिपोर्ट में प्लेटलेट्स 1.5 लाख से नीचे आते ही कई लोग घबरा भी जाते हैं लेकिन 1.5 लाख और इससे अधिक प्लेटलेट अच्छी मानी जाती है। मगर डॉक्टरों के मुताबिक डेंगू में प्लेटलेट्स का कम होना आम बात है और सिर्फ प्लेटलेट काउंट देखकर यह तय नहीं किया जा सकता कि मरीज की हालत गंभीर है। इलाज के दौरान मरीज की हालत, ब्लीडिंग, ब्लड प्रेशर, पानी की कमी और दूसरे लक्षणों को भी देखना जरूरी हो जाता है।

 

यह भी पढ़ें: क्या होता है Heart Plaque जिससे बढ़ता है हार्ट अटैक का खतरा?

डेंगू में क्यों गिरती है प्लेटलेट्स?

आकाश हेल्थकेयर द्वारका में यूनिट 1 सीनियर डायरेक्टर डॉक्टर विक्रमजीत सिंह के अनुसार, 'डेंगू का वायरस शरीर में पहुंचने के बाद बोन मैरो यानी हड्डियों के अंदर मौजूद उस हिस्से को प्रभावित कर सकता है जहां शरीर में प्लेटलेट्स बनते हैं। इससे कुछ समय के लिए प्लेटलेट्स बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। डेंगू इसी को सबसे अधिक प्रभावित करता है।' इसके अलावा डेंगू के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम भी सक्रिय हो जाता है। इससे प्लेटलेट्स जल्दी नष्ट होने लगते हैं। संक्रमण की वजह से शरीर की छोटी रक्त नलिकाओं में सूजन और बदलाव आते हैं, जिससे प्लेटलेट्स ज्यादा इस्तेमाल होने लगते हैं। यानी कि डेंगू में प्लेटलेट कम होने के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण हो सकते हैं। आमतौर पर बीमारी के तीसरे से आठवें दिन के बीच प्लेटलेट्स गिर सकते हैं। पहले ही दिन प्लेटलेट कम होना जरूरी नहीं है।

40 हजार प्लेटलेट होने पर क्या खतरा है?

डेंगू में प्लेटलेट्स 1.5 लाख से नीचे आने पर इसे थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कहा जाता है। काउंट 1 लाख, 50 हजार या 40 हजार तक भी पहुंच सकता है या इससे भी नीचे। मगर सिर्फ यह आंकड़ा देखकर लोगों को डरने की जरूरत नहीं है। अगर मरीज को ब्लीडिंग नहीं हो रही, ब्लड प्रेशर ठीक है, वह पानी ठीक से पी रहा है और डॉक्टर की निगरानी में है, तो केवल प्लेटलेट कम होने का मतलब यह नहीं कि बीमारी गंभीर हो गई है।

 

मरीज में मसूड़ों या नाक से खून आना, उल्टी या मल में खून, नाखूनों से खून आना, तेज पेट दर्द, लगातार उल्टी, बहुत ज्यादा कमजोरी, बेचैनी, सांस लेने में परेशानी या पेशाब कम होना जैसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

प्लेटलेट बढ़ाने के लिए क्या करें?

डेंगू में सबसे जरूरी है शरीर में पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए। डॉक्टर इसी बात पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं और मरीज को खूब पानी पीने की सलाह देते हैं। मरीज अगर पानी और दूसरे तरल पदार्थ आसानी से पी रहा है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार पर्याप्त मात्रा में तरल ले सकता है। अगर लगातार उल्टी हो रही है और पानी नहीं रुक रहा, तो अस्पताल में भर्ती करके नस के जरिए IV fluids दिए जा सकते हैं।

 

बुखार के लिए आमतौर पर पैरासिटामोल का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन बिना डॉक्टर की सलाह के एस्पिरिन, आइबुप्रोफेन जैसी दर्द की दवाएं नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इनसे ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है।

 

यह भी पढ़ें: रूस में न्यूमोनिक प्लेग बढ़ने की आशंका, जानिए लक्षण और बचाव के तरीके

पपीते के पत्ते का जूस कितना असरदार?

डेंगू में पपीते के पत्ते या उसका जूस प्लेटलेट बढ़ाने के लिए खूब इस्तेमाल किया जाता है। कुछ छोटी स्टडी में इसके संभावित फायदे बताए गए हैं, लेकिन अभी इसे डेंगू का साबित और मानक इलाज नहीं माना जाता। इसलिए इसे डॉक्टर की निगरानी और जरूरी इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए। पपीते के पत्ते का जूस कुछ लोगों में उल्टी भी कर सकता है, जिससे शरीर में पानी की कमी बढ़ सकती है।

 

डेंगू में प्लेटलेट की रिपोर्ट देखकर मरीजों को घबराने के बजाय डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित जांच और निगरानी जरूर करवानी चाहिए। प्लेटलेट का आंकड़ा जरूरी है  लेकिन मरीज की पूरा स्वास्थ्य उससे भी अधिक जरूरी है।