रेक्टल कैंसर, कोलोरेक्टल कैंसर का एक प्रकार है, जो बड़ी आंत के अंतिम हिस्से यानी रेक्टम (मलाशय) में होता है। यह आमतौर पर पॉलीप्स से शुरू हो सकता है जो धीरे-धीरे कैंसर में बदल सकता है। इम बीमारी के बढ़ने का मुख्य कारण उम्र, परिवार में कोलोरेक्टल कैंसर का इतिहास, कुछ आनुवंशिक बीमारियों, इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD) और पहले पॉलीप्स होने से बढ़ सकता है। इसके अलावा खराब लाइफस्टाइल भी कैंसर के खतरे को बढ़ा सकता है। हालांकि कई मामलों में बीमारी का कोई एक स्पष्ट कारण पता नहीं चल पाता।

 

भारत में कोलोरेक्टल कैंसर (कोलोन+रेक्टल कैंसर) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में साल 2022 में कोलोरेक्टल कैंसर के 64000 से ज्यादा नए मामले सामने आए थे जिसमें से रेक्टल कैंसर के करीब 38, 752 मामले दर्ज हुए थे। सबसे चिंता की बात यह है कि रेक्टल कैंसर से होने वाली मौतों की संख्या के मामलों में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इस जानलेवा बीमारी के बारे में हमने मुंबई के एस.एल रहेजा अस्पताल की मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट एंड हेमेटो ऑन्कोलॉजिस्ट विशेषज्ञ डॉक्टर अद्वैत गोरे

से बात की।

 

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40 से 50 साल की उम्र के लोगों में रेक्टल कैंसर के मामले तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं?

पिछले कुछ सालों में कम उम्र के लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता सामने आई है। 40 साल और उससे अधिक उम्र के लोगों में भी इसके मामले देखे जा रहे हैं। हालांकि उम्र अभी भी एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है, लेकिन कम उम्र में होने वाले कोलोरेक्टल कैंसर के पीछे कई कारण हो सकते हैं।

 

 

इनमें खान-पान, मोटापा, शारीरिक गतिविधि की कमी, मेटाबॉलिज्म से जुड़ी समस्याएं, आंतों में मौजूद गट माइक्रोबायोम में बदलाव जैसे कारक शामिल हो सकते हैं। यह भी जरूरी है कि कम उम्र के लोगों में मल में खून आना या मल त्याग की आदतों में बदलाव को हमेशा सिर्फ बवासीर जैसी सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज न किया जाए।

खराब लाइफस्टाइल इस बीमारी को कैसे बढ़ा सकती है?

खराब लाइफस्टाइल से जुड़े कई ऐसे कारक हैं जो कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ज्यादा फैट और प्रोसेस्ड फूड वाली चीजों का सेवन, अधिक रेड मीट और डाइट में फाइबर की कमी शरीर के मेटाबॉलिज्म और पाचन तंत्र पर नकारात्मक असर डाल सकती है। धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन भी कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है। इसलिए केवल कैंसर से बचाव पर ध्यान देना ही जरूरी नहीं है, बल्कि इसके लक्षणों को समय पर पहचानना और सही जांच करवाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित व्यायाम करना, फाइबर से भरपूर आहार लेना और धूम्रपान व अधिक शराब से बचना जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।

रेक्टल कैंसर के लक्षण क्या हैं?

इसके लक्षण ट्यूमर के प्रकार और बीमारी की स्टेज के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। आम लक्षणों में मल में खून आना, रेक्टल ब्लीडिंग, कई हफ्तों तक मल त्याग की आदतों में बदलाव, कब्ज या दस्त, मल का पतला होना और मल त्याग के बाद भी पेट पूरी तरह साफ न होने का एहसास शामिल हो सकते हैं।

 

पेट या रेक्टम में दर्द भी हो सकता है। बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना और कमजोरी भी दिखाई दे सकती है, खासकर अगर लंबे समय से ब्लीडिंग हो रही हो या बीमारी बढ़ चुकी हो। यह ध्यान रखना जरूरी है कि रेक्टल ब्लीडिंग हमेशा बवासीर के कारण नहीं होती।

महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को यह बीमारी ज्यादा क्यों होती है?

आमतौर पर पुरुषों में महिलाओं की तुलना में कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम थोड़ा अधिक पाया गया है। इसके पीछे शरीर की संरचना, हार्मोनल अंतर, मेटाबॉलिक स्थिति, धूम्रपान, शराब का सेवन और खान-पान जैसी कई वजहें हो सकती हैं।

 

हालांकि, महिला होना रेक्टल कैंसर से सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। महिलाओं में भी यह बीमारी हो सकती है और इसके लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। परिवार में कैंसर का इतिहास, आनुवंशिक कारण, पाचन तंत्र में सूजन जैसी स्थितियां पुरुषों और महिलाओं दोनों में जोखिम बढ़ा सकती हैं।

बीमारी का पता लगाने के लिए कौन से टेस्ट करवाने चाहिए?

जांच की शुरुआत मरीज की मेडिकल हिस्ट्री, लक्षणों और शारीरिक जांच से होती है। कुछ मामलों में डॉक्टर डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन (DRE) भी कर सकते हैं। कोलोनोस्कोपी जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके जरिए डॉक्टर पूरी बड़ी आंत और रेक्टम को देख सकते हैं और अगर कोई संदिग्ध हिस्सा दिखाई देता है, तो उसका सैंपल यानी बायोप्सी लिया जा सकता है।

 

अगर कैंसर की पुष्टि हो जाती है, तो बीमारी की स्टेज पता करने और इलाज की योजना बनाने के लिए CT स्कैन, पेल्विस का MRI और कुछ मामलों में PET-CT की सलाह दी जा सकती है। कुछ ब्लड टेस्ट भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार किए जा सकते हैं।

क्या बेहतर खान-पान से रेक्टल कैंसर का जोखिम कम किया जा सकता है?

हां, स्वस्थ खान-पान कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है, हालांकि इससे कैंसर होने की संभावना पूरी तरह खत्म नहीं होती। आहार में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। प्रोसेस्ड मीट और अधिक मात्रा में रेड मीट का सेवन सीमित करना चाहिए। अधिक शराब से भी बचना चाहिए।

 

स्वस्थ वजन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ नियमित व्यायाम, तंबाकू से दूरी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार समय पर स्क्रीनिंग भी जरूरी है।

क्या रेक्टल कैंसर को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है?

हां, कई मामलों में रेक्टल कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है, खासकर जब इसका पता शुरुआती स्टेज में चल जाए और कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में न फैला हो। इलाज का परिणाम कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे कैंसर की स्टेज, ट्यूमर की विशेषताएं और जगह, मरीज की सामान्य स्वास्थ्य स्थिति और इलाज के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया।

 

आज इलाज के कई विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी शामिल हैं। बीमारी एडवांस स्टेज पर होने के बावजूद कुछ मामलों में इसे लंबे समय तक नियंत्रित किया जा सकता है।

रेक्टल कैंसर का इलाज क्या है?

इलाज मुख्य रूप से कैंसर की स्टेज और उसके जैविक गुणों पर निर्भर करता है। शुरुआती स्टेज के कुछ मामलों में केवल सर्जरी से इलाज किया जा सकता है।

अगर कैंसर स्थानीय रूप से आगे बढ़ चुका है, तो सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी और रेडिएशन थेरेपी दी जा सकती है। कुछ मरीजों में टोटल नियोएडजुवेंट थेरेपी (TNT) का इस्तेमाल भी किया जाता है।

 

सर्जरी अभी भी इलाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्यूमर की विशेषताओं के आधार पर कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी या इम्यूनोथेरेपी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इम्यूनोथेरेपी कुछ खास मॉलिक्यूलर विशेषताओं वाले मरीजों में अधिक प्रभावी हो सकती है।

रेक्टल कैंसर से बचने के लिए क्या करें?

बचाव के लिए उन जोखिम कारकों को कम करना जरूरी है जिन्हें बदला जा सकता है और प्री-कैंसरस पॉलीप्स का समय पर पता लगाना महत्वपूर्ण है।

स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित व्यायाम करना, फाइबर से भरपूर आहार लेना, प्रोसेस्ड मीट और रेड मीट का सेवन सीमित करना, धूम्रपान से बचना और शराब का सेवन कम करना मददगार हो सकता है।

 

स्क्रीनिंग भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके जरिए पॉलीप्स का पता लगाया जा सकता है और उन्हें कैंसर में बदलने से पहले हटाया जा सकता है। जिन लोगों के परिवार में कोलोरेक्टल कैंसर या आनुवंशिक कैंसर का इतिहास है, या जिन्हें इन्फ्लेमेटरी बाउल डिजीज है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार कम उम्र में और अधिक नियमित स्क्रीनिंग की जरूरत हो सकती है।

 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मल में खून आना, मल त्याग की आदतों में बदलाव या ऐसे अन्य लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय पर डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।