भारत में बुनियादी ढांचे, खनन और औद्योगिक विस्तार जैसी विकास परियोजनाओं की कीमत जंगलों को चुकानी पड़ रही है। पिछले 3 साल और मौजूदा वित्तीय वर्ष में अब तक कुल 828.18 वर्ग किलोमीटर यानी 82,817.92 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन प्रयोजनों के लिए मंजूरी दी जा चुकी है। बता दें कि यह क्षेत्रफल मुंबई शहर (करीब 603 वर्ग किमी) से भी बड़ा है। सीधे तौर पर कहें तो बीते 3 से 4 साल में मुंबई जितना बड़ा जंगल खनन, सड़क, उद्योग और शहरीकरण की भेंट चढ़ गया।

 

राज्यसभा में सांसद आई.एस. इनबादुरई ने इसको लेकर कुछ सवाल किए, जिसपर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने 13 अगस्त 2026 को लिखित जवाब दिया। सरकार की तरफ से कुछ आंकड़े भी पेश किए गए हैं। 

 

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संसद में सरकार ने क्या आंकड़े पेश किए हैं?

इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2023 के अनुसार देश का कुल वन क्षेत्र 7,15,342.61 वर्ग किलोमीटर है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 21.76 फीसदी है। सरकार ने सभी राज्यों को मिलाकर 3 साल और मौजूदा वित्तीय वर्ष में अब तक कुल  82,817.92 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन प्रयोजनों के लिए मंजूरी दी है। सरकार का कहना है कि पहले जंगल की जमीन को दूसरे काम में इस्तेमाल करने के हर आवेदन को अलग-अलग जांच होती है।

 

इसमें यह देखा जाता है कि इससे पर्यावरण और जंगली जानवरों पर क्या असर पड़ेगा। जंगल की जमीन तभी दी जाती है जब कोई और रास्ता न बचे, वह जमीन उसी प्रोजेक्ट के लिए सही जगह पर हो, और जितनी जरूरत हो सिर्फ उतनी ही जमीन दी जाती है। इसके साथ ही मंजूरी देने से पहले कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं। जो इस प्रकार हैं- 

 

पहला नियम है क्षतिपूर्ति वनरोपण (Compensatory Afforestation - CA) यानी जितना जंगल काटा गया, उतना नया जंगल कहीं और लगाना। दूसरा जंगल की कीमत के बराबर पैसा सरकार को देना (NPV भुगतान), मिट्टी और नमी बचाने के उपाय करना, जंगली जानवरों की सुरक्षा की योजना बनाना, और पानी के स्रोत वाले इलाके को बचाने का इंतजाम करना (CAT योजनाएं)।

 

156.41 वर्ग किलोमीटर वृद्धि, पर्यावरणविद् मानते हैं धोखा

सरकार ने यह भी बताया है ISFR 2021 की पिछली रिपोर्ट के मुकाबले देश के वन क्षेत्र में 156.41 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है। लेकिन पर्यावरणविद् इसे धोखा मानते हैं। भारत के एक प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और समाज सुधारक आजाद जैन, जिन्हें पीपल बाबा के नाम से जाना जाता है, वह क्षतिपूर्ति वनरोपण (कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन-CA को ढकोसला कहते हैं। 

कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन कुछ नहीं होता, ये सब ढकोसला है। यह पूरी तरह ग्रीनवॉशिंग है। कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन संभव ही नहीं है। आप एक जंगल को काटते हैं, एक पेड़ को भी अगर काटते हैं तो उसकी वहां 50-100 साल की हिस्ट्री रही होती है। अब आप कहेंगे कि हिमाचल में पेड़ काटा तो मध्य प्रदेश में लगा दिया, मध्य प्रदेश का जंगल काटा तो बिहार में लगा देंगे, बिहार का काटा तो हरियाणा में लगा देंगे। अभी सुनने में आ रहा है कि इंडियन ओशन के आइलैंड्स में करीब 10 लाख पेड़ कटने वाले हैं, तो कह रहे हैं वो हरियाणा-पंजाब में लगा देंगे। यह कोई इंश्योरेंस स्कीम तो नहीं है कि पेड़ मर जाए तो उसे कहीं और जिंदा कर दोगे। जो चीज़ जहां की है, वहीं लगनी चाहिए। आजाद जैन, (पीपल बाबा) 

कहां कितनी वनभूमि डायवर्जन को मिली मंजूरी?

संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक, जिन पांच राज्यों में सबसे ज्यादा वन भूमि गैर-वानिकी कामों के लिए मंजूर की गई, उनमें मध्य प्रदेश में 22,027.02 हेक्टेयर, ओडिशा में 10,098.99 हेक्टेयर, अरुणाचल प्रदेश में 7,828.31 हेक्टेयर, झारखंड में 6,199.41 हेक्टेयर और महाराष्ट्र में 5,282.18 हेक्टेयर। देश के सभी राज्यों का मिलाकर देखें तो 82,817.92 हेक्टेयर वन भूमि को गैर-वन प्रयोजनों के लिए मंजूरी दी जा चुकी है।  

 

आंकड़ों में उछाल 

मार्च 2026 तक यानी 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच 71,023.30 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट हुई थी, जिसमें खनन के लिए 16,463.28 हेक्टेयर, हाइडल-सिंचाई के लिए 14,294.41 हेक्टेयर और सड़क निर्माण के लिए 12,714.93 हेक्टेयर जमीन शामिल थी। अगस्त 2026 तक के ताजा आंकड़े में यह संख्या बढ़कर 82,817.92 हेक्टेयर पहुंच गई, यानी महज कुछ महीनों में करीब 11,800 हेक्टेयर और जंगल की जमीन को मंजूरी मिल गई।

 

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सबसे ज्यादा खनन में खप रही जंगल की जमीन

यह जमीन औद्योगिक परियोजनाओं, खनन, अवसंरचना विकास, शहरी विस्तार और अन्य गतिविधियों के लिए दी गई। सबसे ज्यादा जंगल जिन कामों की भेंट चढ़ा, उनमें खनन सबसे बड़ी वजह है। इसके बाद सड़क निर्माण, हाइडल और सिंचाई परियोजनाएं, और बिजली ट्रांसमिशन व औद्योगिक परियोजनाएं शामिल हैं।