देश में गुंडा एक्ट नाम से कोई एक केंद्रीय कानून नहीं है। अलग-अलग राज्यों में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और आदतन अपराधियों पर कार्रवाई के लिए अलग कानून हैं। उत्तर प्रदेश में 1970 और राजस्थान में 1975 से गुंडा एक्ट लागू है। अब पश्चिम बंगाल का 2026 का पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल भी इसी तरह की व्यवस्था को लेकर चर्चा में है। हालांकि, यह बिल अभी कानून नहीं बना है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे 25 सितंबर को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।
इन तीनों व्यवस्थाओं में गुंडा की परिभाषा एक जैसी नहीं है। यूपी और राजस्थान में आदतन अपराध, कुछ मामलों में बार-बार दोषसिद्धि और समुदाय के लिए खतरा माने जाने जैसी स्थितियां महत्वपूर्ण हैं, जबकि बंगाल के प्रस्तावित बिल में गैंग, सिंडिकेट, कुछ गंभीर अपराधों की चार्जशीट और अपराध को बढ़ावा देने या उसकी फंडिंग करने जैसी गतिविधियों को भी दायरे में रखा गया है।
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उत्तर प्रदेश-राजस्थान एक्ट में गुंडा की परिभाषा
उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 की धारा 2(b) के तहत ऐसे व्यक्ति को ‘गुंडा’ माना जा सकता है, जो अकेले या किसी गैंग के सदस्य या मुखिया के तौर पर बार-बार अपराध करता है, उसकी कोशिश करता है या उसमें मदद करता है। इसमें IPC की कुछ धाराओं और अध्यायों के तहत आने वाले अपराध शामिल हैं। इसके अलावा, अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून, 1956 के तहत दोषी व्यक्ति और आबकारी, जुआ या शस्त्र कानून के तहत कम से कम तीन बार दोषी ठहराए गए लोग भी इस श्रेणी में आ सकते हैं। बार-बार महिलाओं या लड़कियों से छेड़छाड़ या अश्लील टिप्पणी करने वाला और दलाल के तौर पर काम करने वाला व्यक्ति भी इसके दायरे में आता है।
राजस्थान: राजस्थान गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1975 की धारा 2(बी) के मुताबिक, बार-बार अपराध करने वाला व्यक्ति ‘गुंडा’ माना जा सकता है। इसमें अकेले या गिरोह के सदस्य या सरगना के तौर पर अपराध करने, उसकी कोशिश करने या मदद करने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा, अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून के तहत दोषी व्यक्ति और आबकारी, अफीम या जुआ कानून के तहत कम से कम दो बार दोषी ठहराया गया व्यक्ति भी इस श्रेणी में आ सकता है। महिलाओं से छेड़छाड़, लोगों को डराने-धमकाने, बार-बार झगड़ा या दंगा करने और जबरन चंदा वसूलने जैसे मामलों में शामिल व्यक्ति भी इसके दायरे में आते हैं।
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बंगाल बिल में गुंडा की परिभाषा
पश्चिम बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026 की धारा 2(d) में गुंडा उस व्यक्ति को माना जाएगा जो अकेले या किसी समूह, गिरोह या सिंडिकेट के सदस्य या नेता के तौर पर लगातार असामाजिक गतिविधियां करता है, उनकी कोशिश करता है, मदद करता है, उन्हें बढ़ावा देता है, उनके लिए पैसे देता है या उन्हें आसान बनाता है। इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 111 या 112 के तहत सजा वाले अपराध में चार्जशीट दाखिल होने वाला व्यक्ति और आर्म्स एक्ट, NDPS एक्ट, इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट या एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट के तहत अपराध करने, उसमें मदद करने या उसे बढ़ावा देने वाला व्यक्ति भी इस श्रेणी में आ सकता है। ऐसे व्यक्ति को भी गुंडा माना जा सकता है, जिसकी इलाके या समुदाय में खतरनाक और किसी भी हद तक जाने वाले व्यक्ति के तौर पर पहचान हो।
बंगाल बिल को राष्ट्रपति ने क्यों लौटाया?
25 सितंबर को PTI और कई रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस बिल को दोबारा विचार करने के लिए वापस भेज दिया है। केंद्र सरकार की आपत्ति बिल की धारा 2(d)(iii)(B) को लेकर है। इसमें NDPS Act, 1985 के तहत अपराध करने, उसकी कोशिश करने, किसी को उकसाने, प्रचार करने, पैसे देने या मदद करने वाले व्यक्ति को ‘गुंडा’ की परिभाषा में शामिल किया गया है।
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केंद्र का कहना है कि यह प्रावधान PITNDPS Act, 1988 के तहत पहले से मौजूद निवारक हिरासत की व्यवस्था से टकरा सकता है। इससे ड्रग्स से जुड़े अपराधों के लिए दो अलग-अलग हिरासत की व्यवस्थाएं बन सकती हैं। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 254 के तहत दोनों कानूनों के बीच टकराव का सवाल भी उठ सकता है। इसलिए केंद्र ने इस प्रावधान से NDPS Act का संदर्भ हटाने का सुझाव दिया है।
