भारत में शिक्षा को लेकर जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद से चर्चा शुरू हो गई है। नीट पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाली कॉकरोच जनता पार्टी ने अब स्कूल ठीक करो अभियान की शुरुआत कर दी है और कई स्कूलों से हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। स्कूल के बच्चे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे में स्कूल इन दिनों चर्चा का मुख्य केंद्र बन गए हैं। भारत में संघीय ढांचा है और केंद्र और राज्य सरकार के बीच अलग-अलग अधिकार हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर स्कूलों का नियंत्रण केंद्र सरकार के पास है या राज्यों के पास?

 

हमारे संविधान के अनुसार, एजुकेशन यानी स्कूलों का नियंत्रण केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास है। केंद्र और राज्य दोनों इस विषय पर कानून बना सकते  लेकिन जमीन पर स्कूल चलाने, शिक्षकों की नियुक्ति, स्थानीय स्तर पर प्रशासन और शिक्षा पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा राज्यों के जिम्मे है। यही वजह है कि शिक्षा व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की भूमिका बराबर नहीं है बल्कि अलग-अलग स्तरों पर बंटी हुई हैं। 

 

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शिक्षा पहले राज्यों के अधीन थी?

एजुकेशन को लेकर आज केंद्र और राज्य सरकारें दोनों नियम और कानून बना सकती हैं लेकिन पहले ऐसा नहीं था। आजादी के बाद लंबे समय तक शिक्षा संविधान की राज्य सूची में थी। इसका मतलब था कि स्कूलों और शिक्षा व्यवस्था पर राज्यों की प्रमुख भूमिका थी। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में डाल दिया गया। 

 

इसके बाद केंद्र को भी शिक्षा पर कानून बनाने और नीतियां तय करने का अधिकार मिला। इसका उद्देश्य पूरे देश में शिक्षा के लिए एक समान मानक तैयार करना और और बेहतर तालमेल  बनाना था। आज संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची में शिक्षा के साथ तकनीकी शिक्षा, मेडिकल शिक्षा, विश्वविद्यालय और व्यावसायिक प्रशिक्षण भी शामिल हैं।

कौन चलाता है स्कूल?

जब बात स्कूलों को लेकर हो रही है तो सवाल उठता है कि आखिर स्कूल चलाता कौन है? इसमें राज्यों की भूमिका सबसे बड़ी हो जाती है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, देश के अधिकांश स्कूल और उच्च शिक्षा संस्थान संबंधित राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के दायरे में आते हैं। शिक्षा पर होने वाले कुल सरकारी खर्च में भी राज्यों का हिस्सा केंद्र से काफी ज्यादा रहा है। 2020-21 के बजट अनुमान के मुताबिक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने शिक्षा के राजस्व खर्च में करीब 76 प्रतिशत, जबकि केंद्र ने करीब 24 प्रतिशत योगदान दिया था। 

 

इसका मतलब साफ है कि सरकारी स्कूलों का रोजमर्रा का काम, शिक्षकों से जुड़े कई फैसले, स्कूलों की स्थानीय जरूरतें, बुनियादी ढांचा और राज्य स्तर की योजनाओं में राज्यों की भूमिका बेहद अहम है। केंद्र सीधे तौर पर देश के हर सरकारी स्कूल का प्रशासन नहीं चलाता लेकिन बड़े स्तर पर नीतिगत फैसले केंद्र सरकार ही लेती है और राज्यों को इनका पालन करना होता है। कई बार इनको लेकर टकराव की स्थिति भी पैदा हो जाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का तीन लैंग्वेज वाला फॉर्मूला भी ऐसा ही एक विवाद है। 

केंद्र सरकार के पास क्या अधिकार हैं?

केंद्र की ताकत मुख्य रूप से राष्ट्रीय नीति, मानक, केंद्रीय योजनाओं, हायर एजुकेशन और वित्तीय सहायता के जरिए दिखाई देती है। शिक्षा मंत्रालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाता है, जबकि यूजीसी जैसे0 निकाय उच्च शिक्षा के मानकों से जुड़े काम करते हैं। केंद्र केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों की स्थापना और उन्हें सहायता देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसका बड़ा उदाहरण है। नीति केंद्र सरकार ने बनाई, लेकिन खुद सरकार मानती है कि शिक्षा समवर्ती विषय होने के कारण इसका सफल क्रियान्वयन केंद्र और राज्यों के बीच साझा प्लान, निगरानी और सहयोग पर निर्भर करता है।

 

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पैसे को लेकर सवाल

केंद्र सरकार अपनी अलग-अलग योजनाओं के तहत कई स्कूल चलाती है। यह स्कूल देश के अलग-अलग हिस्सों में यानी राज्यों में चलाए जाते हैं। इनमें राज्य सरकारों का कोई दखल नहीं होता है लेकिन इन स्कूलों की संख्या राज्य सरकारों द्वारा चलाए जाने वाले स्कूलों से काफी कम है। कुछ योजनाएं केंद्र और राज्य दोनों के योगदान से चलती हैं। समग्र शिक्षा योजना में सामान्य राज्यों के लिए केंद्र और राज्य के बीच फंडिंग का अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर और कुछ हिमालयी राज्यों के लिए यह 90:10 है। ऐसी ही कई अन्य योजनाएं भी हैं लेकिन स्कूलों को लेकर नीतिगत फैसले ज्यादातर केंद्र ही लेता है।

 

यही वजह है कि शिक्षा के मुद्दे पर कई बार केंद्र और राज्यों के बीच टकराव भी देखने को मिलता है। तमिलनाडु और केंद्र के बीच राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भाषा और फंडिंग को लेकर विवाद इसका उदाहरण है। शिक्षा समवर्ती सूची में है, इसलिए केंद्र नीतिगत दिशा तय कर सकता है, लेकिन राज्यों के पास अपनी परिस्थितियों के हिसाब से शिक्षा व्यवस्था चलाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी रहती है।