देश में एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम पर बहस छिड़ी है। इन्फ्लुएंसर, आम लोग और मिस्त्रियों का एक बड़ा वर्ग कह रहा है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से गाड़ियो का एवरेज कम हो गया है, जल्दी खराब हो रही हैं और वाहनों के रखरखाव को लेकर खर्च बढ़ गया है। मनीष कश्यप जैसे यूट्यूबरों ने दावा किया है कि उनकी गाड़ियां, एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की वजह से खराब हुईं हैं।|

केंद्रीय पेट्रोलियम और नेचुरल गैस मंत्रालय और सड़क एवं परिवहन मंत्रालय ने संसद में दावा किया है कि सोशल मीडिया और कुछ मीडिया चैनलों ने इस संबंध में गलत दावे किए हैं। सरकार का कहना है कि ऑटो कंपनियों और विशेषज्ञों के आंकड़ों के आधार पर ये दावे ज्यादातर गलत या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं। 

संसद में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सांसद थमिझाची थंगापंडियन ने सवाल किया था कि इन गाड़ियों पर E20 का असर क्या हुआ, क्या 1 लीटर एथेनॉल तैयार करने में 1 लीटर पेट्रोल से ज्यादा लगता है? केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने इन सवालों का जवाब दिया है। 

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E20 पेट्रोल क्या है?

सामान्य पेट्रोल में 20 फीसदी एथेनॉल मिलाकर E20 बनाया जाता है। एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, चीनी की मिल से निकलने वाले शीरे या अनाज से बनता है। भारत सरकार का यह तर्क है कि यह कार्यक्रम भारत को पेट्रोलियम आयात कम करने, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण को साफ रखने के लिए चलाया जा रहा है। सरकार ने सोशल मीडिया के दावों पर संसद में क्या कहा है, जिन गाड़ियों पर शोध हुआ है, उनके आंकड़े क्या हैं, जमीनी हकीकत क्या है, आइए जानते हैं-

2023 से पहले बनी गाड़ियां E20 पर नहीं चल सकतीं?

पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि यह दावा पूरी तरह गलत है। E15 ईंधन पिछले 3 साल से ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। E19-E20 भी ढाई साल से ज्यादा वक्त से बाजार में है। इस दौरान कोई बड़े पैमाने पर इंजन खराब होने या ब्रेकडाउन की पुष्टि हुई खबर नहीं आई। भारत में रोजाना करीब 8 करोड़ गाड़ियां पेट्रोल पंप पर जाती हैं, जिनमें 80 फीसदी पेट्रोल वाली हैं। अगर E20 से समस्या होती तो लाखों शिकायतें, वारंटी क्लेम और सर्विस कैंपेन चलते। ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

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सरकार ने क्या आंकड़े गिनाए हैं?

पेट्रोलियम मंत्रालय ने कहा है कि मारुति सुजुकी ने वित्त वर्ष 2025-26 में 2.84 करोड़ गाड़ियों की सर्विस की। इनमें 1.5 करोड़ से ज्यादा पुरानी गाड़ियां थीं जो मूल रूप से E20 के लिए प्रमाणित नहीं थीं, फिर भी E20 से कोई असामान्य जंग, घिसाव या पार्ट्स की उम्र घटने की समस्या नहीं आई। हीरो मोटोकॉर्प और दूसरे दोपहिया कंपनियों ने भी ऐसा ही बयान दिया। एक कंपनी ने 1.4 करोड़ E20 गाड़ियों के आंकड़े दिए, जिसमें साबित हुआ कि एथेनॉल की वजह से कहीं कोई जंग नहीं लग रही है। 

एथेनॉल नया ईंधन नहीं है

पेट्रोलियम मंत्रालय ने बताया है कि ब्राजील जैसे देश दशकों से ज्यादा एथेनॉल ब्लेंड इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में 2001 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ, 2006 में E5 आया। 2013-14 में ब्लेंडिंग सिर्फ 1.53 फीसदी थी, जो अब धीरे-धीरे बढ़कर 20 फीसदी हो गई है। यह बढ़ोतरी वैज्ञानिक परीक्षण, इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑटो कंपनियों से बातचीत के बाद की गई।

क्या 30 करोड़ गाड़ियां बेकार हो जाएंगी?

पेट्रोलियम मंत्रालय और सड़क परिवहन मंत्रालय ने अलग-अलग अपने जवाब में कहा है कि पिछले ढाई-तीन साल में 20 करोड़ से ज्यादा दोपहिया और 3 करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें इन ब्लेंड पर चल रही हैं। अगर समस्या होती तो अब तक बड़े पैमाने पर गाड़ियां खराब हो चुकी होतीं लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) और सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) जैसे संस्थानों ने गाड़ियों की मटेरियल कंपेटिबिलिटी, इंजन ड्यूरेबिलिटी, एमिशन और परफॉर्मेंस की पूरी जांच की है।

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क्या ऑटो कंपनियां E20 को पसंद नहीं करतीं?

4 जुलाई 2026 को पेट्रोलियम, हेवी इंडस्ट्रीज और सड़क परिवहन मंत्रालय की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में टोयोटा किर्लोस्कर, मारुति, हीरो, हुंडई, TVS और बजाज के टॉप अधिकारी मौजूद थे। सबने E20 पर भरोसा जताया। टोयोटा ने कहा कि पुरानी गाड़ियों पर भी रिगोरस टेस्टिंग के बाद ही E20 लाया गया। एथेनॉल साफ और हाई परफॉर्मेंस वाला ईंधन है। 

मारुति ने इसे 'कंज्यूमर को कॉन्फिडेंस स्टेटमेंट' बताया। उन्होंने साफ कहा कि माइलेज पर 3-3.5 फीसदी का असर हो सकता है, लेकिन टायर प्रेशर, ड्राइविंग स्टाइल, मेंटेनेंस और ट्रैफिक का असर इससे कहीं ज्यादा है।

माइलेज घटने का सच क्या है?

वित्त मत्रालय ने कहा है, 'E20 से कुछ पुरानी गाड़ियों में 3-5% माइलेज कम हो सकता है। इसके उलट E20 में ज्यादा ऑक्टेन रेटिंग होती है, जो इंजन को बेहतर तरीके से चलाती है, नॉकिंग कम करती है, कम्बशन बेहतर करती है और एक्सीलरेशन सुधारती है। साफ इंजन और कम प्रदूषण भी फायदे हैं।'

पुरानी गाड़ियां खतरे में हैं?

मंत्रालय ने कहा है कि 1.5 करोड़ से ज्यादा पुरानी गाड़ियों पर सर्विस डेटा में कोई असामान्य समस्या नहीं मिली। सभी कंपनियां वारंटी दे रही हैं, जो इस बात का सबूत है कि उन्हें E20 पर भरोसा है। अगर समस्या होती तो कंपनियां वारंटी क्लेम से बचने की कोशिश करतीं।

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क्या सरकार कंपनियों पर दबाव डाल रही है?

ऑटो कंपनियां लिस्टेड कंपनियां हैं। उन्हें शेयर होल्डर्स, रेगुलेटर्स और कस्टमर्स के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। बड़े स्तर पर समस्या छुपाना उनके लिए कानूनी और प्रतिष्ठा का खतरा होता। उन्होंने सार्वजनिक रूप से E20 का समर्थन किया है। UNECE जैसे अंतरराष्ट्रीय स्टैंडर्ड के तहत टेस्टिंग होती है। 

E20 का उत्पादन से देश को क्या मिल रहा है?

पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक एक लीटर एथेनॉल की औसत लागत साल 2025-26 में करीब 66-71 रुपये है। पेट्रोल की लागत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के दाम पर निर्भर करती है। लेकिन E20 का मकसद सिर्फ सस्ता ईंधन नहीं है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है। 85 फीसदी कच्चा तेल आयात होता है। वेस्ट एशिया संकट में कच्चे तेल की कीमत 135 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, लेकिन घरेलू पेट्रोल की कीमतें सिर्फ 7-8 फीसदी ही बढ़ीं। E20 की वजह से कंज्यूमर्स को बचत हुई। 

सरकार क्या फायदे गिना रही है?

सरकार का कहना है कि विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है, किसानों को गन्ना और मक्का जैसी फसलों के सही दाम मिल रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा, कम प्रदूषण और इंजन की बेहतरी के लिए एथेनॉल ठीक ईंधन है। तेल कंपनियां, एथेनॉल खरीदते समय मुनाफा नहीं, बल्कि उपलब्धता और किसान हित को ध्यान में रखती हैं।

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कैसे पता कि सही एथेनॉल मिल रहा है?

सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां, 30,000 से ज्यादा पेट्रोल पंपों पर नियमित जांच करती हैं। BIS स्टैंडर्ड के मुताबिक ईंधन सप्लाई होता है। राज्यों को एथेनॉल में घपलेबाजी पर जीरो टॉलरेंस का निर्देश दिया गया है। सरकार बार-बार जोर दे रही है कि E20 कार्यक्रम 25 साल के प्रयोग, वैज्ञानिक परीक्षण, ऑटो इंडस्ट्री की सहमति और करोड़ों गाड़ियों के अनुभवों पर आधारित है। अफवाहें सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती हैं, लेकिन आंकड़े और अनुभव कुछ और कहते हैं। सरकार, कंपनियां और ARAI जैसे संस्थान लगातार एथेनॉल की स्थिति पर नजर रखते हैं।