गले में बैंड, बदन पर गाउन और अदालतें, बैकग्राउंड में 'एरिए के टॉप वकील साहब हैं' वाले गाने। अगर आप सोशल मीडिया चलाते हैं तो ऐसे वीडियोज आप आए दिन देखते होंगे। कोई सलाह देता है कि अपराध के बाद कैसे बचें, कोई सलाह देता है कि अगर पुलिस आपको थप्पड़ मार दे तो उसे कोर्ट में कैसे घसीटें। किसी की सलाह होती है कि कोई मारपीट करे तो आप भी उसे मारो, वकील साहब आपको बचा लेंगे। किसी की सलाह होती है कि 'यार तेरा वकील है, तू बदमाशी कर, जमानत तेरा यार कराएगा।' कभी बैकग्राउंड में सुप्रीम कोर्ट होता है, कभी हाई कोर्ट, कभी जिला अदालतें।
वकालत, दुनिया के सबसे इज्जतदार पेशों में से एक रहा है। कोई पीड़ित व्यक्ति या कोई आरोपी जब वकील के पास आता है तो उसे भरोसा होता है कि उसकी बात सिर्फ वकील तक रहेगी, उसे वकील जो सलाह देंगे, किसी और को उसकी भनक तक नहीं लगेगी, उसकी गोपनीयता बनी रहेगी। ऐसा हो रहा है क्या? सोशल मीडिया पर रील बनाने वाले वकील, मुवक्किल की बातें, उसे दी गई सलाह, उसकी गोपनीयता तक सोशल मीडिया पर डाल दे रहे हैं, जिससे उन्हें राहत मिले। अदालतों की कार्यवाही तक सोशल मीडिया पर स्ट्रीम हो जा रही है, जिसे हमेशा से गोपनीय माना जाता रहा है। अब इसे कानूनी चुनौती मिलने जा रही है।
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'रीलबाजी के खिलाफ जनहित याचिका'
दिल्ली के दो वकीलों अनिल पांडे और एआर त्रिपाठी ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। यह याचिका वकीलों के अनैतिक डिजिटल प्रचार, सोशल मीडिया पर रील्स और वीडियो बनाकर क्लाइंट्स जुटाने और कोर्ट परिसर और वकीलों की वेशभूषा के दुरुपयोग के खिलाफ है। याचिकाकर्ता बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश देने की मांग कर रहे हैं कि वह वकीलों की पेशेवर आचार संहिता का सख्ती से पालन कराए।
अंजन दत्ता, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट:-
'वकालत एक संभ्रांत पेशा है, जो न्याय व्यवस्था की रीढ़ है। वकील अदालत के अधिकारी होते हैं, व्यापारी नहीं लेकिन आजकल कई वकील इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर विज्ञापन वाले रील्स, वीडियो और कंटेंट बना रहे हैं। वकील कोर्ट बैंड और गाउन पहनकर कोर्ट रूम, वेटिंग रूम और परिसर में वीडियो शूट करा रहे हैं। वीडियो में फोन नंबर होता है, खुद को एक्सपर्ट की तरह पेश किया जाता है। वकील यह भी बताते हैं कि वे कितने सफल हैं, उनकी योग्यता कितनी है, क्लाइंट की गोपनीय बातें तक शेयर कर देते हैं। यह बार काउंसिल और एडवोकेट एक्ट का सीधा उल्लंघन है। याचिका इसी बारे में है।'
याचिका में कहा गया है कि यह बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 का सीधा उल्लंघन है। नियम 36, वकीलों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विज्ञापन के जरिए काम मांगने या विज्ञापन करने से मना करता है। ये वकील, बार-बार नियम तोड़ रहे हैं, वे क्लाइंट जुटाना चाहते हैं, डिजिटल सॉलिसिटिंग कर रहे हैं, ऑनलाइन सलाह दे रहे हैं, गोपनीय बातों को साझा कर रहे हैं।
कैसे नियमों को तोड़ रहे वकील?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का अध्याय 4 वकीलों के यूनिफॉर्म के इस्तेमाल पर सख्ती से जुड़ा है। कोर्ट के अलावा सार्वजनिक जगहों पर बैंड और गाउन पहनना प्रतिबंधित है। इसका अपवाद, सिर्फ वकीलों से जुड़े आयोजन हैं। याचिका में कहा गया है कि कोर्ट परिसर सिर्फ न्याय के लिए है, सोशल मीडिया कंटेंट बनाने के लिए नहीं। फिर भी देशभर में यह प्रथा बढ़ रही है।
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कब-कब बार और अदालतों ने विरोध किया है?
3 जुलाई 2024 को मद्रास हाईकोर्ट ने एक फैसले में वकीलों की रैंकिंग, डिजिटल लीड जनरेशन और अप्रत्यक्ष सॉलिसिटेशन को गलत बताया और बार काउंसिल को कार्रवाई करने को कहा। इसके बाद बार काउंसिल ने 6 जुलाई 2024 और 8 जुलाई 2024 को प्रेस रिलीज जारी की।
9 अगस्त 2024 के PIB रिपोर्ट में भी नियम 36 के तहत विज्ञापन और काम मांगने पर रोक लगाई गई। 17 मार्च 2025 को बार काउंसिल ने एक और प्रेस रिलीज जारी कर इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटीज के जरिए प्रचार पर रोक लगाई और उल्लंघन करने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी।
1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट परिसर में वीडियोग्राफी और रील्स बनाने पर प्रतिबंध का प्रस्ताव पास किया। 22 जून 2026 को एम्स ने भी अपने परिसर में रील्स बनाने पर रोक लगाई।
याचिकाकर्ताओं की दलील क्या है?
याचिकाकर्ता अनिल पांडे और एआर त्रिपाठी ने खबरगांव से बातचीत में कहा वे खुद वकील हैं और इस याचिका में उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं है। उन्होंने 2 जुलाई 2026 को मुख्य न्यायाधीश और बार काउंसिल चेयरमैन से अपनी बात कही थी लेकिन जब कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
याचिका में कहा गया है कि लीगल अवेयरनेस, नो योर राइट्स या लीगल टिप्स जैसे नामों से प्रचारात्मक वीडियो छुपाए जा रहे हैं। असल मकसद क्लाइंट जुटाना और खुद को प्रमोट करना है। यह परंपरागत ठगी का डिजिटल रूप है। इससे न्याय व्यवस्था की गरिमा प्रभावित हो रही है और ईमानदार वकील पिछड़ रहे हैं।
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याचिकाकर्ता क्या चाहते हैं?
- याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि बार काउंसिल को नियम 36 और चैप्टर 4 का सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया जाए।
- सोशल मीडिया पर प्रचार करने वाले वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो
- कोर्ट परिसर में विज्ञापन, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और रील्स पर देशव्यापी रोक लगे
- वकीलों का बैंड, गाउन, कोट प्रचार के लिए इस्तेमाल करने पर प्रतिबंधित लगाया जाए
- बार काउंसिल को नेशनल डिजिटल एथिक्स गाइडलाइंस फॉर एडवोकेट्स बनाने का निर्देश दिया जाए
- सोशल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मॉनेटाइजेशन, इन्फ्लुएंसर कोलैबोरेशन पर रोक हो
- एक विशेषज्ञ समिति गठित की जाए जो डिजिटल आचार संहिता तैयार करे
याचिका में कई सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया गया है, जिनमें वकालत को व्यापार न मानने और प्रोफेशनल एथिक्स बनाए रखने पर जोर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने आश्वासन दिया है कि यह याचिका बिना किसी निजी मकसद के दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने तत्काल कार्रवाई करने की अपील की है।
