यूरोपीय कमीशन के हाल में आए प्रस्ताव से भारत को कई बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इस प्रस्ताव के अनुसार, मई 2027 से यूरोपीय देशों से भारत भेजे जाने वाले एल्युमीनियम और अन्य मेटल स्क्रैप के व्यापार पर प्रतिबंध लागू हो जाएगा। इस नए कानून के तहत गैर-OECD (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) देशों पर भी रोक लगाई जा रही है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि ये देश कचरे को पर्यावरण के अनुकूल निपटाने के मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं।

 

आपको बता दें कि यह कदम यूरोपीय संघ (EU) के नए 'वेस्ट शिपमेंट रेगुलेशन' का हिस्सा है। इससे पहले यूरोप ने एल्युमीनियम स्क्रैप के निर्यात पर 15% सीमा शुल्क लगाने की योजना बनाई थी। बाद में भारत जैसे प्रमुख खरीदार देशों के दबाव और अंदरूनी मतभेदों के कारण उसे वापस ले लिया गया था। अब ट्रेड टैरिफ के बजाय सीधे कचरा निर्यात नियमों के जरिए इसे कंट्रोल करने का रास्ता चुना गया है।

 

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पूरी बात समझिए

जैसा कि हम सब जानते हैं कि मेटल स्क्रैप पर्यावरण और हेल्थ के लिए अधिक संवेदनशील होते हैं। इसमें जहरीली और भारी मेटल की मौजूदगी की संभावना बनी रहती है। यही वजह है कि इन देशों से आने वाली अर्जियों की बारीकी से जांच की जा रही है। 

 

आपको बता दें कि कुल 32 गैर-OECD देशों ने कागज, प्लास्टिक, रबर और मेटल जैसे कचरे को आयात करने के लिए छूट मांगी थी। इन दी जाने वाली छूट में यह साफ कहा गया था कि जो देश यह साबित कर सकें कि वे कचरे का निपटान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना करेंगे, उन्हें ही यह छूट मिलेगी। 

भारत को क्या होगा नुकसान?

EU से मेटल स्क्रैप, विशेष रूप से एल्यूमीनियम न मिलने पर भारतीय रिसाइक्लर्स और मेटल उत्पादकों को अमेरिका या यूके जैसे देशों से स्क्रैप खरीदना होगा। जो कि इनको बहुत महंगा पड़ेगा। इसकी वजह से घरेलू बाजार में मेटल की कीमतें बढ़ सकती है। 

 

आपको बता दें कि भारत EU के एल्यूमिनियम स्क्रैप के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है। अचानक से इसके सप्लाई में रूकावट से घरेलू रीसाइक्लिंग कंपनियों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है। स्क्रैप की कमी की वजह से कंपनियों को पारंपरिक तरीकों पर निर्भर होना पड़ सकता है जो कि पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकता है।  

 

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भारत के बड़े प्लेयर जैसे ग्रेविटा इंडिया, CMR ग्रीन टेक्नोलॉजीज और पोंडी ऑक्साइड्स एंड केमिकल्स जैसी रीसाइक्लिंग कंपनियों के लिए, असली सवाल यह होगा कि वे अपनी जरूरत का कितना हिस्सा देश के भीतर से या बाजारों से हासिल कर पाते हैं। 

 

साथ ही सरकार के लिए इससे बड़ी चुनौती यह है कि भारत-EU ट्रेड डील के तहत बाजार तक कैसे पहुंच पाता हैं। साथ ही जिन चीजों पर भारतीय  मैन्युफैक्चरर्स निर्भर हैं, यह नए नियम कच्चे माल के लिए कोई नई रूकावट न बनें।

 

दूसरी ओर, यूरोपीय एल्युमीनियम इंडस्ट्री यूनियन इस फैसले से नाखुश है। उनका मानना है कि एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाना ज्यादा असरदार साबित होता। इससे कम लागत वाला कच्चा माल यूरोप में ही रुक पाता। साथ ही वहां संकट से जूझ रहे स्मेल्टिंग प्लांट्स को बड़ी राहत मिलती।