मौत की सजा तो मौत की सजा होती है लेकिन उसे दिया कैसे जाए, इसपर लंबे समय से बहस चल रही है। 18 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था को खत्म करने, बदलने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। यह याचिका 2017 से चल रही थी। कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या मौत की सजा देने के लिए सिर्फ फांसी का तरीका रखना सही है, या यह तरीका संविधान की उस शर्त के खिलाफ है जो कहती है कि सजा देने की प्रक्रिया न्यायपूर्ण, निष्पक्ष और तर्कसंगत होनी चाहिए?

 

2017 में याचिका दायर कर मांग की गई थी कि फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन (जहर का इंजेक्शन), गोली मारना, बिजली का झटका या गैस चैंबर जैसे विकल्प अपनाए जाएं, क्योंकि ये कम पीड़ादायक हैं और इससे दोषी को गरिमा के साथ मौत मिलेगी। इसके लिए आर्टिकल 21 का भी हवाला दिया गया। 

 

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फांसी से 40 मिनट, लीथल इंजेक्शन से 5 मिनट में मौत का तर्क

इस याचिका में तर्क दिया गया था कि फांसी से मौत बर्बर, अमानवीय है और इसमें लंबी पीड़ा होती है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था किसी व्यक्ति को मृत घोषित करने में 40 मिनट तक का समय लग सकता है। नस में दिया जाने वाला लीथल इंजेक्शन या गोली मारने जैसे तरीकों से पांच मिनट के भीतर मौत हो जाती है, जो आर्टिकल 21 के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को बेहतर तरीके से पूरा करता है। हालांकि, कोर्ट ने इसे किसी प्रमाणित तथ्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया।

किस प्रावधान को दी गई चुनौती

CrPC की धारा 354(5) में प्रावधान है कि मृत्युदंड पाने वाले व्यक्ति को 'गर्दन से तब तक लटकाया जाए जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए', यही प्रावधान अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 393(5) में है। इस याचिका में इस प्रावधान को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट के पुराने फैसलों का असर 

दीना बनाम भारत संघ केस में फांसी को संवैधानिक ठहराने वाला फैसला पहले ही 1983 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच दे चुकी है। उस फैसले में कहा गया था कि अगर सही तरीके से दी जाए तो फांसी एक तेज और शालीन तरीका है। यहां तक कि उसी फैसले में गोली, बिजली का झटका, गैस चैंबर और इंजेक्शन जैसे विकल्पों पर भी विचार हो चुका था लेकिन कोर्ट को फांसी से बेहतर कोई तरीका नहीं मिला था। इसके बाद, 1992 में एक और बड़ी बेंच ने इस फैसले को दोबारा सही ठहराया।

 

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पुराना फैसला बदलने की कोई ठोस वजह नहीं  

याचिकाकर्ता का दावा था कि लीथल इंजेक्शन ज्यादा वैज्ञानिक और दर्द रहित तरीका है, लेकिन कोर्ट को इसके समर्थन में कोई पक्का वैज्ञानिक सबूत नहीं मिला। इसलिए कोर्ट ने माना कि पुराना फैसला बदलने की कोई ठोस वजह नहीं बनती। हालांकि, इसके साथ कोर्ट ने एक रास्ता खुला रखा है, वह यह कि अगर केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की एक समिति बनाकर फांसी के मौजूदा तरीके की नई वैज्ञानिक समीक्षा करवा सकती है।

कब क्या हुआ? 

क्या लीथल इंजेक्शन फांसी से बेहतर है?

दुनिया के ज्यादातर देशों में आज भी मौत की सजा देने के लिए फांसी का तरीका ही अपनाया जाता है। हालांकि, मौजूदा समय में मुख्य रूप से 3 प्रमुख देशों चीन, वियतनाम और संयुक्त राज्य अमेरिका में मृत्युदंड के लिए लीथल इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा है। अमेरिका में इसे अपनाने के बाद गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

 

कंपनियों ने सप्लाई रोक दी, उनका कहना था कि कंपनी अपने उत्पाद मरीजों की जान बचाने के लिए बनाती है, फांसी देने के लिए नहीं। उन्होंने अपनी दवाओं की बिक्री पर सख्त पाबंदी लगा दी ताकि उनका इस्तेमाल मौत की सजा में न हो। फाइजर इस तरह की पाबंदी लगाने वाली आखिरी बड़ी अमेरिकी दवा कंपनी थी। 

 

अब कोई भी संघीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अमेरिकी दवा कंपनी फांसी के लिए अपनी दवा नहीं बेचती। दूसरी ओर बैक्सटर, बी. ब्राउन मेडिकल, फ्रेसेनियस काबी और जॉनसन एंड जॉनसन जैसी कंपनियों ने भी अपने मेडिकल उपकरण जैसे IV कैथेटर और सीरिंज को फांसी में इस्तेमाल होने से रोक दिया। 

 

इसके अलावा, अमेरिका में हुई सभी इंजेक्शन वाली फांसियों में से करीब 7.2% में गड़बड़ी हुई, यह किसी भी और तरीके से ज्यादा है। कोर्ट का भी यही कहना है कि इसका कोई पक्का सबूत नहीं मिला कि इंजेक्शन फांसी से बेहतर है।