नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) के आंकड़ों के मुताबिक पहाड़ी और जनजातीय समूहों से आने वाली महिलाएं, मैदानी और बड़े शहरों की तुलना में ज्यादा रोजगार में शामिल हैं और कमाई कर रही हैं। उनकी आय भले ही सीमित हो लेकिन काम करने की इच्छा, काम के अवसर और कमाई में उनकी हिस्सेदारी, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों से भी ज्यादा है। 


नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस ने इन आंकड़ों को पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के नाम से जारी किया है। जिला स्तर पर इसकी मॉनिटरिंग की गई है। सर्वे में लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR), वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR), बेरोजगारी दर (UR) और नॉट इन एजुकेशन, एंप्लॉयमेंट ऑर ट्रेनिंग ( NEET ) रेट का जिक्र किया गया है। 

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क्या जानना जरूरी है?

  • लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन (LFPR): कितने लोग काम करने के इच्छुक हैं
  • वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR): कितनों को असल में काम मिल रहा है
  • बेरोजगारी दर (UR): बेरोजगारी दर कितनी है
  • नॉट इन एजुकेशन, एंप्लॉयमेंट ऑर ट्रेनिंग (NEET): बिना नौकरी, ट्रेनिंग और पढ़ाई वाला वर्ग

आंकड़ों में क्या पता चला है?

नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस ने पहली बार जिलेवार रोजगार के आंकड़े जारी किए हैं। देश के पहाड़ी और जनजातीय बहुल इलाकों की महिलाएं शहरी और मैदानी इलाकों की महिलाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा काम कर रही हैं। हिमाचल प्रदेश, ओडिशा और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में महिला श्रम भागीदारी ज्यादा है जबकि दिल्ली, बिहार और पंजाब जैसे राज्य इस मामले में काफी पीछे रह गए हैं।

आंकड़े पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) में हर राज्य के 10 सबसे ज्यादा आबादी वाले जिलों में से महिला जनसंख्या के आधार पर सबसे ज्यादा महिला लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (LFPR) और वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (WPR) वाले जिले चुने गए हैं।

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हिमाचल का हमीरपुर टॉप पर, जनजातीय जिले भी आगे

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़ों बताते हैं कि हिमाचल प्रदेश का हमीरपुर जिला महिला श्रम भागीदारी के मामले में देश में सबसे बेहतर है। यहां महिला LFPR 80.9 फीसदी और WPR 80.0 फीसदी दर्ज किया गया है। यहां करीब हर 5 में से 4 महिलाएं या तो काम कर रही हैं या काम की तलाश कर रही हैं।

ओडिशा का आदिवासी बहुल मयूरभंज जिला दूसरे स्थान पर है। यहां महिला LFPR 71.8 फीसदी और WPR 71.2 फीसदी है। जम्मू-कश्मीर का बडगाम तीसरे स्थान पर है। यहां LFPR 71.4 फीसदी है। चौथे स्थान पर छत्तीसगढ़ का आदिवासी जिला सरगुजा है, जहां LFPR 69.0 फीसदी है। असम के तिनसुकिया जिले में LFPR 66.1 प्रतिशत है।

दिल्ली, बिहार और पंजाब सबसे पीछे क्यों हैं?

देश की राजधानी दिल्ली में महिला श्रम भागीदारी के आंकड़े सवालों के घेरे में हैं। पूर्वी दिल्ली में महिला LFPR सिर्फ 18.9 फीसदी और WPR 15.7 फीसदी दर्ज हुआ है। यह सभी राज्यों में सबसे कम है। बिहार का सिवान जिला भी बेहद पीछे है, जहां महिला LFPR 24.7 फीसदी और WPR 24.3 फीसदी है। पंजाब के पटियाला में LFPR 39.3 फीसदी है और हरियाणा के सिरसा में LFPR 42.4 प्रतिशत है। इन दोनों जिलों में महिला भागीदारी राष्ट्रीय औसत से काफी कम रही है।

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दूसरे राज्यों का हाल क्या है? 

देश के कई राज्यों में भी महिला भागीदारी की तस्वीर करीब-करीब एक जैसी दिखी। राजस्थान के दौसा में महिला LFPR 60.9 फीसदी, मध्य प्रदेश के धार में 59.6 फीसदी और आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साईं जिले में 59.1 फीसदी दर्ज हुआ। तेलंगाना के जगतियाल में यह आंकड़ा 63.2 फीसदी रहा। महाराष्ट्र के अहमदनगर में महिला LFPR 51.9 फीसदी, केरल के तिरुवनंतपुरम में 52.0 फीसदी और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में 53.4 फीसदी दर्ज किया गया। 

गुजरात के खेड़ा में यह आंकड़ा 55.6 फीसदी और उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में 56.3 फीसदी रहा। कर्नाटक के बीजापुर में महिला LFPR सिर्फ 47.0 फीसदी है। यह राष्ट्रीय स्तर पर मध्यम श्रेणी में आता है। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर में यह आंकड़ा 41.8 फीसदी रहा। यह भी राष्ट्रीय दर की तुलना में कम है। 


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क्यों दिख रहा है यह अंतर?

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के विधि विभाग में रिसर्च स्कॉलर निखिल गुप्ता ने कहा, 'पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में परंपरागत रूप से महिलाएं खेती, पशुपालन और घरेलू आर्थिक गतिविधियों में शामिल रहती हैं। वहां का सामाजिक ताना-बाना बराबरी का रहा है। रोजगार के अवसर सीमित हैं तो ज्यादातर लोग मजदूरी या गैर संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। बिना दोनों के काम किए घर चलाना मुश्किल होता है। श्रम भागीदारी में असर भी इसी वजह से नजर आता है। बड़े शहरों और कुछ मैदानी राज्यों में सामाजिक-आर्थिक वजहों से महिलाओं की औपचारिक कामकाज में भागीदारी अपेक्षाकृत कम दिखती है।'