ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) पार्टी का सांसद भले ही एक हो लेकिन पार्टी कई राज्यों में विपक्ष को करारा झटका दे रही है। पहले बिहार चुनाव में सीमांचल में कांग्रेस और विपक्ष को अपनी ताकत का अहसास दिलाया और उसके बाद अब असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने महाराष्ट्र में भी अपनी ताकत दिखाई है। AIMIM महाराष्ट्र में कई नगर निगम चुनावों में बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। कई सीटों पर तो पार्टी के उम्मीदवारों ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की है। 

 

असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी AIMIM उन सीटों पर बढ़िया प्रदर्शन कर रही है जहां मुस्लिम आबादी बहुसंख्यक है। महाराष्ट्र के नगर निकायों में कुल 114 सीटों पर AIMIM ने जीत हासिल की है। उनके लिए इतनी बड़ी जीत का अनुमान शायद ही किसी ने लगाया हो लेकिन औवैसी ने इस बार बिहार के बाद महाराष्ट्र में एक बड़ा फैक्टर साबित हुए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि औवैसी की पार्टी ने हिंदू उम्मीदवारों को भी टिकट दिया और उनमें कुछ उम्मीदवार जीते भी।

 

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महाराष्ट्र में चौंकाया

औवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र में एक नया फैक्टर बनकर उभरी है। बिखरे विपक्ष में औवैसी अपनी पार्टी का भविष्य खोज रहे हैं। बीएमसी चुनाव में ही औवैसी की पार्टी को 8 सीटें मिलीं, वहीं  संभाजी और मालेगांव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी AIMIM है। IMIM ने छत्रपति संभाजी नगर में अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन किया किया है। नगर निगम की 113 सीटों में से 33 सीटें AIMIM ने हासिल की है। 

विपक्ष की हार का बड़ा कारण

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि औवैसी विपक्ष के लिए लगातार हानिकारक साबित हो रहे हैं। औवैसी ने महाराष्ट्र में कई सीटों पर जीत दर्ज की है। महाराष्ट्र में मु्स्लिम वोटों को अपने पक्ष में करने जुटे ठाकरे ब्रदर्स को औवैसी ने कड़ा झटका दिया है। वहीं, कांग्रेस और एससीपी (शरद पवार) को भी औवैसी ने झटका दिया है।

 

जहां-जहां मुस्लिम वोटर ज्यादा है, वहां औवैसी की पार्टी लगातार अपना जनाधार बढ़ाती जा रही है। इससे पहले बिहार के सीमांचल में औवैसी की पार्टी ने 5 सीटों पर जीत दर्ज की थी। तेलंगाना से औवैसी खुद सांसद हैं और वहां उनकी पार्टी के 7 विधायक हैं। महाराष्ट्र में अब 120 से ज्यादा पार्षद हैं। अब औवैसी की नजर पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश पर है। 

उत्तर प्रदेश में खेल करेंगे औवैसी

औवैसी लगातार राजनीतिक रूप से ताकतवर हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से लेकर देश के मुद्दों पर लोग उन्हें सुनना पसंद कर रहे हैं। अल्पसंख्यक वोटर उनकी तरफ लगातार आकर्षित हो रहे हैं। बिहार और महाराष्ट्र चुनाव में मिली शानदार जीत के बाद ओवैसी और उनकी पार्टी के हौसले बुलंद हैं। अब उनकी नजर अपनी पार्टी का अन्य राज्यों में विस्तार करने की ओर है। ऐसे में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी वह खेल कर सकते हैं।  AIMIM ने अखिलेश यादव पर आरोप लगाया था कि सपा को 90 फीसदी मुस्लिम वोट देते हैं लेकिन मुस्लिमों के मुद्दे पर अखिलेश यादव की जुबान तक नहीं खुलती। AIMIM ने सूबे में मुस्लिम और दलितों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने और आगामी विधानसभा चुनाव मजबूती से लड़ने की बात कही है।

 

समाजवादी पार्टी को औवैसी महाराष्ट्र में बड़ा झटका दे चुके हैं। मुस्लिम आबादी का एक बड़ा हिस्सा महाराष्ट्र में अखिलेश यादव की पार्टी को वोट करता था लेकिन इस बार अब औवैसी ने मुस्लिम वोट को अपनी तरफ किया और उसका नतीजा सबके सामने है। कई मुस्लिम बहुल सीटों पर मुकाबला AIMIM बनाम समाजवादी पार्टी हो गया था जिसमें औवैसी की पार्टी ने बाजी मार ली है। महाराष्ट्र की हार तो शायद अखिलेश यादव को इतना परेशान ना करे लेकिन औवैसी का मकसद साफ है 2027 में यूपी में खेल करना और यह खेल अखिलेश यादव को भारी पड़ सकता है। 

 

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2022 में औवैसी पर भारी पड़े थे अखिलेश

औवेसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव में 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में औवैसी की पार्टी को बड़ा झटका लगा था और 100 में से 99 जगहों पर उनके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। औवैसी कह रहे थे 25-30 सीटें जीतेंगे और जमकर पसीना बहा रहे थे लेकिन चुनाव परिणाम ने साफ कर दिया  कि मुस्लिम तो अखिलेश यादव के साथ ही खड़े हैं।

 

औवैसी की पार्टी की 2022 में जमकर फजीहत हुई। जमकर प्रचार करने के बावजूद कई जगह पर उनकी पार्टी से ज्यादा वोट तो नोटा को मिल गए थे। 2022 में औवैसी की पार्टी को 100 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद सिर्फ 0.4 प्रतिशत वोट ही मिले। नोटा को उनकी पार्टी से ज्यादा 0.69 प्रतिशत लोगों ने चुना। औवैसी ने अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर जमकर निशाना साधा था। 

2027 में अखिलेश के लिए चुनौती

अखिलेश यादव की पार्टी औवैसी को नजरअंदाज बिल्कुल नहीं कर सकती। अखिलेश के दोस्त तेजस्वी यादव बिहार में औवैसी को नजरअंदाज करने का खामियाजा भुगत चुके हैं। औवैसी ने 24 से ज्यादा सीटों पर महागठबंधन को नुकसाना पहुंचाया। भले ही औवैसी की पार्टी 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 0.4 प्रतिशत तक ही पहुंच पाई लेकिन 2017 की तुलना में उनकी पार्टी को 20 लाख वोट ज्यादा मिले। 2017 में औवैसी की पार्टी को 2 लाख वोट मिले थे और 2022 में 22 लाख। औवैसी की पार्टी ने 2022 में कई सीटों पर अखिलेश यादव की पार्टी के वोट काटकर उनकी हार सुनिश्चित की। बाराबंकी कुर्सी विधानसभा ऐसी ही एक विधानसभा है। इस सीट पर सपा 217 वोट के अंतर से हारी और यहां औवैसी की पार्टी को 8,541 वोट मिले। यानी अगर औवैसी उम्मीदवार ना उतारते तो अल्पसंख्यक वोट एकतरफा सपा को वोट करते और उनकी जीत हो जाती। 

 

हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समाजवादी पार्टी के साथ आए तो इसका फायदा अखिलेश यादव को मिला। उनकी पार्टी 47 सीटों से बढ़कर 111 सीटों पर पहुंच गई। इसके बाद अखिलेश यादव ने पीडीए का नारा दिया और इसका फायदा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों में मिला। 2024 के लोकसभा चुनाव में औवैसी की पार्टी ने उत्तर प्रदेश में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा। इसका फायदा इंडिया गठबंधन को हुआ। नतीजा यह रहा की कांग्रेस और सपा मिलकर यूपी में 43 सीटों पर चुनाव जीत गईं। सपा ने अकेले प्रदेश की 80 में से 37 सांसद जीते। अब अखिलेश यादव को मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोड़कर रखना होगा क्योंकि अखिलेश को अगर उत्तर प्रदेश की सत्ता के शिखर पर पहुंचना है तो मुस्लिम मतदाता ही उन्हें यहां तक पहुंचा सकते हैं।

औवैसी बना रहे गठबंधन

ओवैसी ने बिहार चुनाव के बाद दिए एक इंटरव्यू में कहा था, 'इस बार हम उत्तर प्रदेश चुनावों में असर दिखाने नहीं, जीत दर्ज करने के लिए चुनावी मैदान में उतरेंगे।' उन्होंने अखिलेश यादव पर बिहार में उनके खिलाफ साजिश रचने का आरोप भी लगाया।  उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव ने बिहार में अपने प्यादे भेजकर हमको कमजोर करने की कोशिश की थी लेकिन हम भी सियासी शतरंज खेलना जानते हैं। औवैसी ने कहा कि अब वह यूपी में अखिलेश को परेशान करेंगे। 

 

 

औवैसी यूपी में एनडीए और इंडिया गठबंधन के खिलाफ लड़ने की योजना पर काम कर रहे हैं। इस बार औवैसी यूपी की जनता को एक नया विकल्प देने की कोशिश कर रहे हैं। औवैसी उत्तर प्रदेश में पल्लवी पटेल की पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। इस गठबंधन चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य भी शामिल हैं। औवैसी अब इस गठबंधन के जरिए मुस्लिम-दलित समीकरण को मजबूत कर अपने पक्ष में लाने की कोशिश में जुटे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर औवैसी यूपी में बिहार और महाराष्ट्र की तरह मजबूती से उभरते हैं तो अखिलेश यादव और कांग्रेस की परेशानी बढ़ा सकते हैं। 

 

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यूपी में अहम मुस्लिम वोट

उत्तर प्रदेश से औवैसी को इसलिए भी उम्मीद है क्योंकि कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाया की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है। मुस्लिम वोटर यूपी की 403 सीटों में से करीब 143 सीटों पर असर रखते हैं। करीब 43 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर जीत और हार तय करते हैं। अगर इन 43 सीटों पर मुस्लिम समुदाय एक होकर किसी पार्टी या उम्मीदवार को वोट कर दे तो उसका जीतना तय है। इन्हीं 43 सीटों पर ज्यादातर मुस्लिम विधायक जीतते हैं। औवैसी की पार्टी की नजर इन 43 सीटों के साथ-साथ अन्य मुस्लिम बहुल सीटों पर होगी।