इंडिया गठबंधन की 8 जून 2026 को नई दिल्ली में लगभग दो साल के बाद बैठक हुई, जिसमें 20 से ज्यादा पार्टियों ने हिस्सा लिया। यह बैठक खासतौर से पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आह्वान पर बुलाई गई थी। इस बार की बैठक ने सियासी पंडितों और सत्तारुढ़ दल का ध्यान इसलिए अपनी ओर खींचा क्योंकि यह बैठक हाल के विधानसभा चुनावों में विपक्षी दलों के कमजोर प्रदर्शन और गठबंधन के भीतर बढ़ती खींचतान के बीच बुलाई गई थी।
दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में हुई बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने की। खास बात यह भी है कि दिसंबर 2023 में इंडिया गठबंधन ने खरगे को गठबंधन का औपचारिक अध्यक्ष चुना था। इसलिए 8 जून की बैठक में उन्होंने ही चर्चा का संचालन किया और बैठक के बाद मीडिया को संबोधित भी किया। बैठक में कांग्रेस से मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी और वेसी वेणुगोपाल शामिल हुए। इसके अलावा बड़े नेताओं में ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, डी राजा, तेजस्वी यादव आदि शामिल हुए।
जिस इंडिया गठबंधन में 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस को कम बल्कि नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल सरीखे नेताओं को अधिक भाव मिलता था। इस बार इसमें बदलाव नजर आया। इस बार की बैठक में कांग्रेस आक्रामक दिखी। दरअसल, इंडिया गठबंधन अब नए सिरे से एकजुट हो रहा है। आइए समझते हैं कैसे...
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कमजोर हो रहीं क्षेत्रीय पार्टियां
दरअसल, समय के साथ में क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हो रही हैं। इसकी वजह है उनका राज्यों में लगातार चुनाव हारना और बीजेपी का जीतना। इसकी सबसे पहले शुरुआत होती है फरवरी 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से, जब आम आदमी पार्टी और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल चुनाव हार गए। इसके बाद नवंबर 2025 में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल का चुनाव हारना, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से हटाकर किनारे करना और ताजा मामले में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का बीजेपी के हाथों बुरी तरह से चुनाव हारना।
कांग्रेस की मजबूती कहां छिपी है?
इन चुनावी हार में ही कांग्रेस की मजबूती छिपी है। जिन राज्यों में क्षेत्रिय दलों की वजह से कांग्रेस को जगह नहीं मिल रही थी, अब उन्हीं राज्यों में कांग्रेस की पूछ बढ़ रही है। जो ममता बनर्जी हाल के ही विधानसभा और बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सहित किसी भी विपक्षी दल को भाव नहीं दिया, वही ममता 'इंडिया गठबंधन' के साथ के लिए लालायित दिख रही हैं। बंगाल में हारने और टीएमसी में बगावत-टूट के बाद अब में उतनी ताकत नहीं बची है कि वह अपने इशारों से कांग्रेस और गठबंधन को अपनी बात मनवा सकें।
ममता बनर्जी की मजबूरी
यहां इंडिया गठबंधन ममता बनर्जी की मजबूरी बन गया है क्योंकि जिस तरह से टीएमसी के 80 में से 60 विधायक, 29 में से 19 लोकसभा सांसद, और तीन राज्यसभा बगावत कर चुके हैं। आने वाले समय में और भी नेता टूट सकते हैं। इन सभी नेताओं के बीजेपी से संपर्क हैं। इसके अलावा हाल ही में चुनावी हार के बाद अभिषेक बनर्जी पर पश्चिम बंगाल के सोनारपुर में हमला हुआ। बड़ी मुश्किल से अभिषेक वहां से किसी तरह से बचकर निकल पाए।
केंद्र की मोदी सरकार के अंतर्गत आने वाली केंद्रीय एजेंसियां और राज्य की बीजेपी सरकार अभिषेक बनर्जी के ऊपर लगातार अपना शिकंजा कसती जा रही हैं। ऐसे में ममता बनर्जी के सामने पार्टी में टूट के साथ ही अभिषेक बनर्जी को बचाना भी है। इस समय अगर ममता कांग्रेस से भी अड़ियाल रवैया अपनाती हैं तो यह उनके और भतीजे अभिषेक बनर्जी के लिए बेहतर नहीं होगा। इसलिए इंडिया गठबंधन ममता बनर्जी के लिए जरूरत से ज्यादा मजबूरी है।
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इंडिया गठबंधन में बनते नए समीकरण
इंडिया गठबंधन से 22 लोकसभा वाली डीएमके दूरी बना चुकी है। ममता कमजोर हो चुकी हैं। गठंबनध में देखा जाए तो कांग्रेस के साथ सबसे मजबूत 37 लोकसभा सीटों के साथ में समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव हैं। वह दमदारी से अपनी बात डंके की चोट पर रख सकते हैं। इसके अलावा पैन इंडिया ऐसी कोई पार्टी नहीं है जो कांग्रेस पर दबाव डालकर अपनी बात मनवा सके। कांग्रेस तमिलनाडु में टीवीके और मुख्यमंत्री जोसेफ विजय से गठबंधन करके और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी से गठबंधन की बात करके लगातार अपना विस्तार कर रही है और सहयोगी दलों को संदेश भी दे रही है कि उसके पास और भी ऑप्शन हैं।
राष्ट्रीय राजनीति में आ रहा नया मोड़?
इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक राष्ट्रीय राजनीति को एक नया मोड़ दे रही है। हालांकि, 8 जून की बैठक में गठबंधन की एकता बनाए रखने और बीजेपी के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करने पर चर्चा हुई। कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने केंद्र सरकार की विदेश नीति और मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि आने वाले समय में करोड़ों लोग मतदान अधिकारों से वंचित हो सकते हैं। अखिलेश याद और तेजस्वी यादव समेत कई क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने कांग्रेस से सहयोगियों को अधिक महत्व देने और बेहतर समन्वय की मांग की।
वाम दलों ने केरल की राजनीति को लेकर राहुल गांधी की कुछ टिप्पणियों पर आपत्ति जताई, जिस पर राहुल गांधी ने अपना पक्ष स्पष्ट किया। बैठक में गठबंधन के कमजोर होते दायरे पर भी चिंता जताई गई, क्योंकि कुछ प्रमुख सहयोगी दल बैठक से दूर रहे।
