तृणमूल कांग्रेस में हर दिन कुछ न कुछ हो रहा है। कोलकाता से दिल्ली तक कई धड़ों में बंटी दिख रही TMC में कब्जे की जंग भी शुरू हो गई है। एक तरफ लोकसभा के 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का एलान किया है। दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में अलग हुए विधायक दल ने अब पार्टी पर दावा ठोक दिया है। इस दल ने अरूप रॉय को TMC का नया अध्यक्ष बताया है। ममता बनर्जी की अगुवाई वाले धड़े ने भी नई कार्यसमिति का एलान किया है और बताया है कि ममता बनर्जी को ही फिर से अध्यक्ष चुना गया है। अब दोनों धड़े दावा कर रहे हैं कि उन्होंने पहले कार्यसमिति बनाई गई। रोचक बात है कि TMC की ओर से जारी की गई लिस्ट पर 20 जून की तारीख लिखी है। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले गुट ने 22 जून को नई कार्यसमिति गठित करने का एलान किया।

 

इससे यह तो पता चल रहा है कि ममता बनर्जी को इसका एहसास हो गया था और उन्होंने पहले ही नई कार्यसमिति गठित कर ली थी। ममता बनर्जी की ओर से इसकी जानकारी चुनाव आयोग को भी भेज दी गई थी। हालांकि, दूसरा गुट इसे लेकर अब कानूनी लड़ाई भी लड़ सकता है। ऋतब्रत बनर्जी ने सोमवार को नई कार्यसमिति का एलान करते हुए कहा था कि ममता बनर्जी चाहें तो मुख्य सलाहकार का पद स्वीकार कर सकती हैं। बता दें कि ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई वाले धड़े को स्पीकर ने भी मान्यता दे दी है और उन्हें नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया गया है। हालांकि, यह मामला कोर्ट में है और इस पर अभी सुनवाई होना बाकी है।

ममता ने पहले ही चल दिया दांव

अब पार्टी पर कब्जे को लेकर ममता खेमे के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ‘जब बागी गुट अपनी राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन की तैयारी कर रहा था, तब तक ममता बनर्जी पार्टी अध्यक्ष के रूप में संगठनात्मक ढांचे को अंतिम रूप देकर उसकी सूची निर्वाचन आयोग को भेज चुकी थीं।’ ममता बनर्जी के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं के अनुसार, पार्टी की नेतृत्व संरचना और 24 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति को शनिवार को अंतिम रूप दिया गया था और इसकी सूची सोमवार दोपहर निर्वाचन आयोग को सौंपी गई। यह कदम विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले असंतुष्ट गुट के कोलकाता में विशेष अधिवेशन आयोजित करने से पहले उठाया गया।

 

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निर्वाचन आयोग को भेजी गई सूची में ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष, सुब्रत बक्शी को उपाध्यक्ष, अभिषेक बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव, डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को संयुक्त सचिव और शुभाशीष चक्रवर्ती को कोषाध्यक्ष बताया गया है। यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब एक दिन पहले बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने, वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुनने और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन की घोषणा की थी। इससे पार्टी के भीतर संगठनात्मक विभाजन और गहरा हो गया है। ममता खेमे के सूत्रों ने बताया कि निर्वाचन आयोग को भेजी गई नई समिति की संरचना पहले की संगठनात्मक व्यवस्था से अलग है और इसमें असंतुष्ट गुट से जुड़े कई नेताओं को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि इसी महीने गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य रहे अरूप विश्वास का नाम भी संशोधित पैनल से हटा दिया गया है।

TMC ने जारी किया नोटिस

एक अन्य कदम के तहत पार्टी की अनुशासन समिति ने फिरहाद हकीम, अरूप विश्वास, अरूप रॉय, जावेद खान, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, स्नेहाशीष चक्रवर्ती और सबीना यास्मीन सहित कई वरिष्ठ नेताओं को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया है। वरिष्ठ TMC नेता और विधायक कुणाल घोष ने कहा, ‘यह एक हास्यास्पद नाटक है। जिस व्यक्ति को तृणमूल से निकाला जा चुका है, वह विशेष अधिवेशन आयोजित कर रहा है। मामला अदालत में है और हमें न्याय मिलने का भरोसा है। हम ऐसे हास्यास्पद व्यवहार को कोई महत्व नहीं देते। टीएमसी का मतलब ममता बनर्जी है, बाकी सब तमाशा है।’

 

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अब मुख्य सवाल यह है कि पार्टी की किस संगठनात्मक संरचना को वैध माना जाएगा। कोलकाता के एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, यह विवाद निर्वाचन आयोग के समक्ष उठ सकता है और अंततः अदालत तक भी पहुंच सकता है। दोनों गुटों के परस्पर विरोधी दावों ने टीएमसी के भीतर जारी संकट को नया आयाम दे दिया है। अब दोनों पक्ष पार्टी के संगठनात्मक और विधायी ढांचे पर दावा कर रहे हैं, जिससे 1998 में ममता बनर्जी की बनाई इस पार्टी पर नियंत्रण को लेकर लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई की संभावना बन गई है।

शिवसेना और NCP जैसा होगा झगड़ा?

इससे पहले ऐसे ही दो उदाहरण सामने आ चुके हैं। इन दोनों में ही बागी गुट ने पार्टी पर भी कब्जा जमा लिया था। एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से बगावत की थी और ना सिर्फ वह पार्टी के अध्यक्ष बने बल्कि मूल पार्टी का नाम और निशाना भी उन्हीं के पास रहा। उद्धव ठाकरे को नए नाम और नए निशान से संतोष करना पड़ा था। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में भी हुआ था और अजित पवार ने उन्हीं शरद पवार से यह पार्टी छीन ली थी जिन्होंने इसकी स्थापना की थी।

 

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अब चर्चा है कि ऐसा ही कुछ टीएमसी के साथ भी करने की तैयारी है। हालांकि, इस बार ममता बनर्जी ने कुछ कदम समय रहते ही उठा लिए। उदाहरण के लिए- ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुने जाने से पहले ही उन्हें पार्टी से निकाला जा चुका था। ममता बनर्जी ने पार्टी के सभी फ्रंटल संगठनों को भंग कर दिया था और अब नई कार्यसमिति भी समय रहते बना ली है। इसके अलावा, टीएमसी में दो के बजाय तीन धड़े दिखाई दे रहे हैं और इसका फायदा भी ममता बनर्जी को मिल सकता है और वह अपनी पार्टी पर कब्जा बरकरार रखने में कामयाब हो सकती हैं।