उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद की 11 सीटों पर होने वाला चुनाव सियासी दलों के लिए बड़ा इम्तिहान बन गया है। 23 अक्टूबर को होने वाले इस चुनाव में 5 स्नातक और 6 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर मतदान होगा। चुनाव का असर सिर्फ इन 11 सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विधान परिषद में समाजवादी पार्टी के संख्याबल और नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए के सामने उच्च सदन में अपने मौजूदा दबदबे को बनाए रखने की चुनौती होगी।
विधान परिषद की जिन 11 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें स्नातक क्षेत्र की 5 और शिक्षक क्षेत्र की 6 सीटें शामिल हैं। स्नातक सीटों में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी शामिल हैं।शिक्षक क्षेत्र में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद सीटों पर चुनाव होगा। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 6 दिसंबर 2026 को खत्म हो रहा है। निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के मुताबिक 23 अक्टूबर को मतदान और 27 अक्टूबर को मतगणना होगी।
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी
100 सदस्यीय उत्तर प्रदेश विधान परिषद में समाजवादी पार्टी के फिलहाल 10 सदस्य हैं। नेता प्रतिपक्ष का पद बनाए रखने के लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम 10 प्रतिशत यानी 10 सदस्य होना जरूरी है। ऐसे में समाजवादी पार्टी के लिए इन चुनावों में अपने संख्याबल को बनाए रखना अहम है। इन 11 सीटों में से तीन पर वर्तमान में समाजवादी पार्टी से जुड़े सदस्य हैं।
इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीट से मान सिंह यादव, वाराणसी स्नातक से आशुतोष सिन्हा और वाराणसी शिक्षक सीट से लाल बिहारी यादव शामिल हैं। समाजवादी पार्टी ने इन तीनों को फिर मैदान में उतारा है।इसके अलावा पार्टी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से कमलेश यादव और लखनऊ स्नातक क्षेत्र से पूर्व एमएलसी कांति सिंह को उम्मीदवार बनाया है। यानी समाजवादी पार्टी के लिए मुकाबला केवल नई सीटें हासिल करने का नहीं, बल्कि उच्च सदन में अपने मौजूदा राजनीतिक दर्जे को बनाए रखने का भी है।
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NDA के पास 83 सदस्य, BJP अकेले 79
विधान परिषद में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए का संख्याबल काफी मजबूत है। 100 सदस्यीय सदन में एनडीए के 83 सदस्य बताए गए हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी के 79 एमएलसी हैं, जबकि अपना दल (एस), राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी के पास एक-एक सदस्य हैं।इस चुनाव में एनडीए के सामने नेता प्रतिपक्ष जैसे किसी पद को बचाने की चुनौती नहीं है, लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पकड़ का संदेश देने का मौका जरूर है।
2020 के चुनाव का गणित भी अहम
11 सीटों के पिछले चुनावी नतीजे भी इस बार के मुकाबले की तस्वीर समझने में अहम हैं। 2020 में भारतीय जनता पार्टी ने इन सीटों में से 6 पर जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी को 3 सीटें मिली थीं और 2 सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे थे।इस बार राजनीतिक दल उसी पुराने प्रदर्शन को आधार बनाकर अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के अलावा कांग्रेस की सक्रियता भी चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है।
कांग्रेस की एंट्री से विपक्षी गणित पर नजर
विधान परिषद में फिलहाल कांग्रेस का कोई सदस्य नहीं है। इसके बावजूद पार्टी ने चुनाव में उतरने के संकेत दिए हैं और 5 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए संयोजकों की नियुक्ति भी की है। इससे विपक्षी वोटों के संभावित बंटवारे और आपसी तालमेल को लेकर भी सियासी चर्चा तेज है।समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच उत्तर प्रदेश में गठबंधन के भविष्य को लेकर भी अलग-अलग राजनीतिक संकेत सामने आते रहे हैं। ऐसे में विधान परिषद चुनाव दोनों दलों के जमीनी तालमेल की परीक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है।
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2027 से पहले बड़ा सियासी टेस्ट
विधान परिषद की इन 11 सीटों का चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले 16 अक्टूबर को राज्यसभा की 10 सीटों के लिए मतदान होना है और उसके ठीक एक सप्ताह बाद 23 अक्टूबर को विधान परिषद की 11 सीटों पर वोट डाले जाएंगे।इस लिहाज से अक्टूबर के ये दोनों चुनाव उत्तर प्रदेश में दलों के संख्याबल, संगठन, गठबंधन और चुनावी रणनीति की तस्वीर सामने रखेंगे। विधान परिषद चुनाव में खास नजर इस बात पर रहेगी कि समाजवादी पार्टी अपने 10 सदस्यीय संख्याबल को बनाए रख पाती है या नहीं और एनडीए अपने मौजूदा बहुमत को किस तरह कायम रखता है।
