सनातन धर्म के कई ग्रंथों में देवी-देवताओं से जुड़ी ऐसी कथाएं बताई गई हैं, जिनसे आज की जनरेशन जेड भी बहुत कुछ सीख सकती है। इसी प्रकार गणेश पुराण में एक ऐसी कहानी का वर्णन मिलता है, जिससे हमें महत्वपूर्ण सीख मिलती है। गणेश पुराण की एक कथा के मुताबिक, माता पार्वती ने क्रोध में आकर शनिदेव को श्राप दे दिया था। जब उनका क्रोध शांत हुआ तो उन्होंने शनिदेव को एक वरदान दिया। इसी वरदान की वजह से आज ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को ग्रहों का राजा माना जाता है।
गणेश पुराण के मुताबिक, क्रोध में माता पार्वती ने शनिदेव को श्राप दिया था। जब उनका गुस्सा शांत हुआ, तब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। हालांकि, वह अपना श्राप वापस नहीं ले सकती थीं। इस वजह से माता पार्वती ने शनिदेव को ऐसा आशीर्वाद दिया, जिसे सुनकर शनिदेव भी हैरान हो गए थे। आइए जानते हैं माता पार्वती ने शनिदेव को कौन-सा श्राप और वरदान दिया था।
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माता पार्वती ने क्यों दिया श्राप?
गणेश पुराण की कथा के मुताबिक, जब भगवान गणेश का जन्म हुआ था तब देवलोक में उत्सव का माहौल था। सभी देवता भगवान गणेश के बाल रूप के दर्शन करने आए थे। वहां शनिदेव भी मौजूद थे, लेकिन उन्होंने गणेश जी के बाल रूप को नहीं देखा क्योंकि उनकी पत्नी ने उन्हें दृष्टि का श्राप दिया था।
जब माता पार्वती ने शनिदेव को देखा तो उन्होंने सिर उठाकर भगवान गणेश को देखने के लिए कहा। इसके बाद शनिदेव ने गणेश जी को देखा तो उनकी दृष्टि के प्रभाव से गणेश जी का सिर उनके शरीर से अलग हो गया। यह देखकर माता पार्वती बेहद दुखी हो गईं। उन्हें दुखी देखकर भगवान शिव ने उन्हें सांत्वना दी। इसके बाद भगवान शिव ने गज का सिर लाकर गणेश जी के धड़ पर स्थापित कर दिया। इसके बावजूद माता पार्वती का दुख और क्रोध शांत नहीं हुआ। क्रोध में आकर उन्होंने शनिदेव को अंगहीन होने का श्राप दे दिया।
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श्राप देने का हुआ पछतावा
माता पार्वती के श्राप से सूर्यदेव नाराज और क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि शनिदेव का इसमें कोई दोष नहीं था और वह इस श्राप के पात्र नहीं हैं। इसके बाद यमराज ने भी शनिदेव का पक्ष लिया। उन्होंने कहा कि शनिदेव सिर झुकाकर एक स्थान पर खड़े थे। उन्हें पहले ही दृष्टिदोष का श्राप मिला हुआ है, ऐसे में उन्हें अंगभंग होने का श्राप देना उचित नहीं है।
यह सब सुनकर ब्रह्माजी ने शनिदेव से कहा कि वह दोबारा माता पार्वती की शरण में जाएं और अपनी व्यथा उन्हें बताएं। इसके बाद शनिदेव माता पार्वती की शरण में गए।
माता पार्वती ने इस श्राप को लेकर कुछ देर विचार किया। उसके बाद उन्होंने कहा, 'मैं अपना श्राप वापस नहीं ले सकती, लेकिन शनिदेव को वरदान दे सकती हूं।' यह बात साफ करती है कि माता पार्वती को अपनी भूल का पछतावा हुआ था।
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माता पार्वती ने दिया वरदान
श्राप के प्रभाव से शनिदेव लंगड़े हो गए थे। इसके बाद माता पार्वती ने कहा कि शनिदेव का लंगड़ापन आगे भी बना रहेगा, लेकिन इसके बदले वह ग्रहों के राजा बनेंगे। योगियों में परम योगी कहलाएंगे। साथ ही उन्हें न्याय का देवता माना जाएगा। इसी आशीर्वाद के प्रभाव से ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को ग्रहों का राजा माना जाता है।
नोट- यह लेख ग्रंथों में वर्णित कथाओं और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।


