हिन्दू धर्म में लाखों लोग भक्ति की अलग-अलग परंपराएं निभाते हैं। जहां एक तरफ पश्चिम बंगाल में देवी मां के समक्ष मछली का भोग लगाया जाता है, वहीं गुजरात में शाकाहारी भोजन ही भोग के तौर पर भगवान को चढ़ाया जाता है। इसका मतलब साफ है कि एक धर्म होने के बावजूद भक्ति करने की परंपराएं अलग-अलग हैं। उत्तर भारत के धार्मिक जानकारों का मानना है कि शाकाहारी भोजन ही उत्तम है और शुभ दिनों में व्यक्ति को मांसाहारी या तामसिक भोजन के सेवन से बचना चाहिए। इसके विपरीत, पूर्वी भारत के धार्मिक जानकार इस बात से सहमत नहीं होते हैं। तामसिक और शाकाहारी भोजन को लेकर यह मतभेद धर्म ग्रंथों से आसानी से समझा जा सकता है।
हिन्दू धर्म के कई ऐसे धर्म ग्रंथ हैं, जिनमें तामसिक और शाकाहारी भोजन को लेकर अलग-अलग मान्यताएं बताई गई हैं। हिन्दू धर्म के श्रीमद्भगवद्गीता में भी भोजन को लेकर अहम बात बताई गई है, जिसे जानकर आपको भी समझ आ जाएगा कि व्यक्ति के तामसिक और शाकाहारी भोजन को लेकर हिन्दू धर्म की मान्यता क्या है। इसके साथ ही आइए समझते हैं कि अलग-अलग राज्यों में अलग प्रकार का भोग चढ़ाने के पीछे वजह क्या है।
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अलग किस्म के भोग चढ़ाने की वजह
आज के दौर में अलग-अलग संस्कृतियों में अलग किस्म के भोजन खाए जाते हैं। इसी तरह देश के अलग-अलग राज्यों में कुछ खास किस्म के भोजन खाए जाते हैं। जहां एक तरफ ओडिशा, असम और पश्चिम बंगाल में रहने वाले लोग मछली पसंद करते हैं, तो वहां के लोग देवी मां को मछली चढ़ाते हैं। इसी तरह दक्षिण भारत में नारियल, इमली और काली मिर्च से बने व्यंजन प्रसाद के तौर पर चढ़ाए जाते हैं।
इसके विपरीत, उत्तर भारत में जो लोग वैष्णव परंपरा को मानते हैं, वे लोग शाकाहारी भोजन को सबसे उत्तम मानते हैं। इसी वजह से उत्तर भारत में पर्व-त्योहार के समय तामसिक खाने से परहेज किया जाता है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रकार के व्यंजनों की परंपरा के कारण ही भगवान को अलग-अलग राज्यों में अलग प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। अब सवाल उठता है कि हिन्दू धर्म के ग्रंथों में तामसिक और शाकाहारी भोजन के बारे में क्या बताया गया है।
भगवद्गीता में क्या लिखा है?
भगवद्गीता के 17वें अध्याय में शाकाहारी और तामसिक खाने के बारे में बताया गया है। इसमें बताया गया है कि तीन प्रकार के भोजन होते हैं, जिन्हें खाकर व्यक्ति के शरीर में अलग-अलग प्रकार की ऊर्जा आती है। भगवद्गीता के अनुसार सात्त्विक, राजसिक और तामसिक भोजन होता है।
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सात्त्विक भोजन यानी फल, सब्जी, दूध और दही आदि। भगवद्गीता के अनुसार, इस प्रकार के भोजन खाने से व्यक्ति की आयु, बल, स्वास्थ्य, सुख और प्रीति बढ़ती है। इसी वजह से शाकाहारी खाने को सबसे उत्तम भोजन माना जाता है। इसके साथ ही मिर्च, तेल, मसालेदार और तला-भुना भोजन राजसिक भोजन कहा जाता है, जिसे खाने से व्यक्ति के शरीर में ऊर्जा आती है। वहीं ग्रंथों में बताया गया है कि तामसिक खाने से व्यक्ति का मन और शरीर आलसी होता है। इसी सिलसिले में गीता में एक श्लोक बताया गया है।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥
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इस श्लोक का अर्थ है कि सात्त्विक आहार व्यक्ति की आयु, बल और स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करता है। इसी वजह से सात्त्विक भोजन को उत्तम माना जाता है। हिन्दू धर्म में शाकाहारी भोजन को सबसे उत्तम माना गया है, जिसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को मांसाहारी भोजन नहीं खाना चाहिए।
