मशहूर डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की नई फिल्म 'द ओडिसी' अब रिलीज हो चुकी है। 2500 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह फिल्म लंबे समय से चर्चा में है और दुनियाभर के फैन्स इसे देखने के लिए बेताब है। शुक्रवार यानी आज रिलीज हुई फिल्म अपने ऐक्टर्स से ज्यादा डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की वजह से चर्चा में है। अलिफ लैला के इस एपिसोड में उन्हीं क्रिस्टोफर नोलन की कहानी पढ़िए जिन्हें कभी एक डिस्ट्रीब्यूटर ने लौटा दिया था।   

 

बात साल 1992 की है। ब्लूम्सबरी थिएटर की इमारत के पीछे एक तंग गली है। कूड़े के डिब्बे, प्लास्टिक के क्रेट। वहां से कुछ सीढ़ियां नीचे उतरती हैं। तहखाने तक और नीचे एक लाल दरवाज़ा है, जो हमेशा बंद रहता है। उसकी चाबी एक 22 साल के लड़के के पास है। अंदर खिड़की नहीं है। आवाज़ बाहर नहीं जाती। छत से फिल्म की लंबी काली पट्टियां लटकी हुई हैं। एक कोने में भारी, पुरानी एडिटिंग मशीन रखी है। यह लड़का यहां घंटों बैठा रहता है। रील को आगे चलाता है। फिर पीछे, फिर आगे।

 

यह लड़का आगे जाकर बड़ा डायरेक्टर बनेगा और तीस साल बाद उसकी हर कहानी इसी तहख़ाने पर लौटेगी। कभी बर्फ के नीचे। कभी सपने के नीचे, फिर उस सपने के नीचे, फिर उसके भी नीचे। बैटकेव की सुरंगों में। डूबते जहाज़ के अंदर पानी भरते केबिन में। जैसे कोई आदमी बार-बार उसी तहखाने में लौट रहा हो, जहां से उसने शुरुआत की थी।

 

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6000 डॉलर में अपनी पहली फ़िल्म बनाने वाला यह डायरेक्टर आज 2000 करोड़ की फ़िल्म बनाता है और शायद हॉलीवुड के इक्का-दुक्का डायरेक्टर्स में से एक हैं जिन्हें इतना पैसा एक फ़िल्म के लिए मिलता है लेकिन कभी इसी आदमी को हॉलीवुड के हर एक डिस्ट्रीब्यूटर ने लौटा दिया था। यह कहते हुए कि फ़िल्म तो अच्छी है लेकिन चलेगी नहीं। जो अपनी ही फिल्म के प्रीमियर पर यह जानते हुए गया था कि फिल्म पिट चुकी है और लोग उसे कचरा कहने वाले हैं। जिसकी एक फिल्म को अमेरिका के राष्ट्रपति ने आतंकी संगठन ISIS समझाने के लिए इस्तेमाल किया। जिस आदमी की फिल्म को कोई रिलीज़ करने को तैयार नहीं था, आज दुनिया का इकलौता ऐसा डायरेक्टर है जिसके नाम पर टिकटें बिकती हैं। वह भी एक साल पहले ही।  यह कहानी 21वीं सदी के सबसे बड़े डायरेक्टर्स में से एक क्रिस्टोफर नोलन की है।

उल्टी बनी फिल्म मेमेंटो ने बदली तकदीर

फरवरी 2001, लॉस एंजेलिस के रेस्तरां में एक 30 साल का अंग्रेज़ बैठा है। पत्रकार टॉम शोन उसका इंटरव्यू लेने आए हैं। बातचीत के बीच शोन एक अजीब चीज़ नोटिस करते हैं। वह आदमी मेन्यू को उल्टा पलट रहा है। पीछे से आगे की तरफ। पूछने पर जवाब मिलता है, मैं लेफ्ट-हैंडेड हूं, मैगज़ीन भी पीछे से पढ़ता हूं और संयोग देखिए, उस आदमी ने अभी-अभी एक ऐसी फिल्म बनाई है जो पूरी की पूरी उल्टी चलती है। आखिरी सीन से पहले सीन की तरफ।

 

उस दिन डेली में बैठे नोलन सुपरस्टार डायरेक्टर नहीं थे। वह एक ऐसे डायरेक्टर थे जिनकी फिल्म को हॉलीवुड के हर डिस्ट्रीब्यूटर ने ना कह दिया था। हर एक ने। सबने फिल्म देखी, सबने तारीफ की और सबने लौटा दी। एक साल तक यह फिल्म डिब्बे में बंद पड़ी रही। फ़िल्म का नाम था मेमेंटो (Memento)। इसका आयडिया एक कार ड्राइव के दौरान आया था।

 

बात 1996 की है। क्रिस्टोफर और उनके भाई जोनाथन नोलन शिकागो से लॉस एंजेलिस जा रहे हैं। रास्ते में जोनाथन साइकोलॉजी की क्लास में पढ़ी एक चीज़ का ज़िक्र करते हैं। एक बीमारी होती है, एंटीरोग्रेड एम्नीशिया। इसमें आदमी की पुरानी यादें बची रहती हैं लेकिन नई यादें बनना बंद हो जाती हैं। हर कुछ मिनट में स्लेट साफ। जोनाथन एक सवाल फेंकते हैं। अगर ऐसा आदमी अपनी बीवी के कातिल को ढूंढना चाहे, तो करेगा कैसे? क्रिस्टोफर ने कहा, इसे लिखो। जोनाथन ने कहानी लिखी, नाम रखा 'Memento Mori', लैटिन का वह जुमला जिसका मतलब है, याद रखो कि तुम्हें मरना है और क्रिस्टोफर ने उससे स्क्रिप्ट बनाई।

 

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कहानी एक ऐसे आदमी की है जिसकी याददाश्त हर 10 मिनट में मिट जाती है। वह अपनी पत्नी के कातिल को ढूंढ रहा है लेकिन कुछ याद नहीं रख सकता। इसलिए वह अपने शरीर पर टैटू गुदवाता है, पोलरॉइड तस्वीरें खींचता है, नोट्स लिखता है। नोलन ने इस भूलने की बीमारी को दर्शक तक पहुंचाने के लिए एक तरकीब निकाली। फिल्म को ही उल्टा चला दिया। हर सीन उससे पहले वाले सीन से पीछे जाता है। दर्शक को भी वही महसूस होता है जो हीरो को होता है। कुछ पता नहीं कि इससे पहले क्या हुआ था।


इंडस्ट्री में स्क्रीनिंग हुई। शोन अपनी किताब 'The Nolan Variations' में लिखते हैं कि हर डिस्ट्रीब्यूटर का जवाब लगभग एक जैसा था। फिल्म शानदार है। हमें बहुत पसंद आई लेकिन दर्शक इतनी उलझी हुई चीज़ नहीं देखेगा। पैसा डूब जाएगा।

 

आखिरकार फिल्म की अपनी प्रोडक्शन कंपनी न्यूमार्केट (Newmarket Films) ने रिस्क लिया। खुद ही डिस्ट्रीब्यूट कर दी। मार्च 2001 में फिल्म सिर्फ 11 थिएटरों में उतरी। पहले हफ्ते की कमाई, 3 लाख 52 हज़ार डॉलर। छोटा आंकड़ा लेकिन फिर कुछ होने लगा। लोग फिल्म देखकर निकलते और दूसरों को कहते, जाओ, देखो और ध्यान से देखना। तीसरे हफ्ते फिल्म 76 थिएटरों में पहुंची। फिर 531। कुल कमाई करीब 4 करोड़ डॉलर जबकि फिल्म 45 लाख डॉलर से भी कम में बनी थी। दो ऑस्कर (Oscar) नॉमिनेशन अलग से और मज़े की बात, जिस मिरामैक्स (Miramax) स्टूडियो ने फिल्म ठुकराई थी, वह अब वापस आकर इसे खरीदने की कोशिश कर रहा था। न्यूमार्केट ने ना कह दिया।

 

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सवाल यह कि नोलन के पास यह भरोसा आया कहां से कि दर्शक उल्टी चलती फिल्म को झेल जाएगा? हर डिस्ट्रीब्यूटर, यानी वे लोग जिनका पूरा करियर दर्शक को समझने में गुज़रा था, वे सब गलत कैसे साबित हुए और यह नया लड़का सही? इसका जवाब मेमेंटो से तीन साल पहले की एक रात में छिपा है।

क्रिस्टोफर नोलन को इतना भरोसा कैसे हुआ?

लंदन, 90 के दशक का बीच का दौर। नोलन और उनकी गर्लफ्रेंड एम्मा थॉमस (Emma Thomas) अपने बेसमेंट फ्लैट में लौटते हैं। सामने का दरवाज़ा टूटा पड़ा है। किसी ने लात मारकर खोला है। अंदर सामान बिखरा हुआ है। कुछ CD गायब हैं, कुछ किताबें। पुलिस आती है और एक अजीब सवाल पूछती है। आपका कोई बैग भी गया है क्या? नोलन कहते हैं, हां। पुलिसवाला बताता है, चोर आपके ही बैग में आपका सामान भरकर ले गया। शोन को दिए इंटरव्यू में नोलन बताते हैं कि उस रात उन्हें अपना टूटा दरवाज़ा देखकर एक बात समझ आई। वह दरवाज़ा प्लाईवुड का था। इतना पतला कि उसे कोई भी तोड़ सकता था। वह असल में किसी को रोक ही नहीं रहा था। वह सिर्फ एक भरोसा था। एक सिंबॉलिक लकीर, जिसे हम सब मानकर चलते हैं ताकि साथ रह सकें और नोलन के दिमाग में सवाल घूमने लगा। अगर कोई इन अनकहे नियमों को तोड़ने लगे, तो क्या होगा?

 

इसी सवाल से उनकी पहली फीचर फिल्म निकली। फॉलोइंग (Following)। कहानी एक बेरोज़गार राइटर की, जो लंदन की भीड़ में अजनबियों का पीछा करता है। एक दिन जिसका पीछा कर रहा होता है, वह पलटकर उसके सामने बैठ जाता है। वह आदमी चोर है। लेकिन अजीब किस्म का चोर। वह घरों में घुसता है चीज़ें चुराने नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी में खलल डालने।

 

फिल्म में एक डायलॉग है। "You can tell a lot about people from their stuff। You take it away, to show them what they had।" यानी तुम किसी की कोई चीज़ छीनकर ही उसे दिखा सकते हो कि उसके पास क्या था।

फिल्म का बजट। करीब 6000 डॉलर। आज के हिसाब से भी सिर्फ 5 लाख रुपए के आसपास। उस वक्त नोलन एक कंपनी में कॉर्पोरेट वीडियो शूट करने की नौकरी करते थे। उसी तनख्वाह से फिल्म बन रही थी। हफ्ते में सिर्फ 10 से 15 मिनट की फुटेज शूट करने के पैसे थे। तय हुआ, शूटिंग सिर्फ शनिवार-रविवार को होगी। हर सीन की रिहर्सल नाटक की तरह होती, ताकि एक या दो टेक में काम हो जाए। कैमरा नोलन खुद चलाते। एक्टरों को दो हिदायतें थीं। शहर छोड़कर मत जाना और बाल मत कटवाना क्योंकि शूटिंग पूरे एक साल चलनी थी और परदे पर सब कुछ लगातार दिखना था।

 

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यहीं, इसी बिना पैसे वाली फिल्म में नोलन ने वह पहला प्रयोग किया जो आगे चलकर उनकी पहचान बनने वाला था। उन्होंने कहानी को सीधा नहीं सुनाया। तीन अलग-अलग टाइमलाइन काटकर आपस में गूंथ दीं। दर्शक को खुद जोड़ना पड़ता है कि क्या पहले हुआ, क्या बाद में। लोग इसे तरकीब समझते हैं। नोलन कुछ और मानते हैं। शोन की किताब में उनकी एक बात दर्ज है। वह कहते हैं, दुनिया के किसी और माध्यम में यह ज़िद नहीं है कि जानकारी सिलसिलेवार ही दी जाए। नॉवेल में नहीं, नाटक में नहीं, ग्रीक कहानियों में नहीं, होमर (Homer) में नहीं। आप अखबार कैसे पढ़ते हैं? पहले हेडलाइन, फिर खबर। हमारी बातचीत भी कभी सीधी लाइन में नहीं चलती। इंसान का दिमाग कहानी को टुकड़ों में जोड़ता है, घड़ी के हिसाब से नहीं।

 

यानी जो चीज़ डिस्ट्रीब्यूटरों को दर्शक के लिए मुश्किल लग रही थी, नोलन की नज़र में वह दर्शक के दिमाग का कुदरती तरीका था। यही वह भरोसा था लेकिन यह भरोसा भी कहीं से आया था। उल्टा पढ़ने की आदत, टूटे दरवाज़े में फिलॉसफी देखना, समय को खिलौना समझना। यह सब एक ही बचपन से निकला है।

बचपन में ही बना दी फिल्म!

शिकागो, 1978 के आसपास। एक 8 साल का बच्चा अपने घर के बेसमेंट में बैठा है। हाथ में पिता का पुराना कैमरा। यह कैमरा छोटे कार्ट्रिज पर चलता था, एक बार में सिर्फ ढाई मिनट की फुटेज। बच्चे के पास ना एक्टर हैं ना सेट तो उसने अपने स्टार वॉर्स (Star Wars) के खिलौनों को एक्टर बना लिया। अंडों के डिब्बों और टॉयलेट पेपर रोल से स्पेसशिप के सेट बने। धमाके के लिए पिंग-पॉन्ग टेबल पर आटा उछाला गया। बर्फ के ग्रह का सीन चाहिए था तो शिकागो की सर्दी काम आ गई। फिल्म का नाम रखा गया, स्पेस वॉर्स।

 

एक दिन उसके अंकल टोनी अपोलो (Apollo) मिशन की असली फुटेज ले आए। बच्चे ने TV स्क्रीन से वह फुटेज अपने कैमरे पर शूट की और अपनी खिलौना फिल्म के बीच में चिपका दी। मकसद यह कि देखने वाले को लगे, शायद यह शॉट भी इसी ने लिया है।

 

अब 36 साल आगे चलिए। 2014, हॉलीवुड के एक स्टूडियो में इंटरस्टेलर (Interstellar) की शूटिंग चल रही है। एक्टर एक असली साइज़ के स्पेसक्राफ्ट में बंधे हैं जो हाइड्रोलिक मशीनों पर हिल रहा है और सामने 300 फुट चौड़ी स्क्रीन पर तारों की चलती हुई तस्वीरें प्रोजेक्ट हो रही हैं ताकि खिड़की से दिखने वाला स्पेस असली लगे, कंप्यूटर से बाद में चिपकाया हुआ नहीं और इंटरस्टेलर का ट्रेलर आने के बाद नोलन के पास एक फोन आता है। रोको बेलिच (Roko Belic) का, बचपन के उसी दोस्त का जो बेसमेंट की फिल्मों में साथ था। रोको ने कहा, यह तो वही शॉट हैं। वही अपोलो वाले जो बचपन में इस्तेमाल किए थे।
 
नोलन की पढ़ाई इंग्लैंड का एक बोर्डिंग स्कूल में हुई थी, जो कभी ब्रिटिश राज के अफसर तैयार करता था। फिर यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन, जहां नोलन ने पढ़ी इंग्लिश लिटरेचर, फिल्म नहीं और जहां उनकी मुलाकात एम्मा थॉमस से हुई, जो आगे चलकर उनकी पत्नी भी बनीं और हर फिल्म की प्रोड्यूसर भी। ग्रेजुएशन के बाद नोलन ने इंग्लैंड के दो फिल्म स्कूलों में अप्लाई किया। दोनों ने रिजेक्ट कर दिया। आगे चलकर फॉलोइंग बनाई और फिर आई मेमेंटो। मेमेंटो हिट हुई। इस कामयाबी ने नोलन को अगली फिल्म दिलवाई, इनसोम्निया (Insomnia), जिसमें अल पचीनो (Al Pacino) और रॉबिन विलियम्स (Robin Williams) जैसे दिग्गज थे। फिल्म चली। स्टूडियो का भरोसा बना और फिर वॉर्नर ब्रदर्स ने नोलन के सामने वह चीज़ रखी जो उस वक्त हॉलीवुड की सबसे डूबी हुई प्रॉपर्टी मानी जाती थी- बैटमैन।

बैटमैन और क्रिस्टोफर नोलन

1997 में 'बैटमैन एंड रॉबिन' नाम की फिल्म आई थी, जिसका इतना मज़ाक बना कि स्टूडियो ने ये किरदार ही ठंडे बस्ते में डाल दिया था। नोलन को कॉमिक्स की खास जानकारी नहीं थी तो उन्होंने डेविड गोयर को साथ लिया, जो कॉमिक बुक फिल्में लिख चुके थे लेकिन असली खेल यह था कि नोलन स्टूडियो के सिस्टम में घुसना ही नहीं चाहते थे। बड़ी फिल्मों का तरीका यह होता है कि सैकड़ों आर्टिस्ट हायर करो, कॉन्सेप्ट बनवाओ और स्टूडियो हर कदम पर दखल दे। नोलन ने उल्टा किया। उन्होंने अपने घर के गैराज में डेरा डाल दिया। एक तरफ गोयर स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे, दूसरी तरफ प्रोडक्शन डिज़ाइनर नेथन क्राउली नई बैटमोबील डिज़ाइन कर रहे थे। प्रोजेक्ट का कोड नेम रखा गया, द इंटिमिडेशन गेम। प्लान यह था कि स्टूडियो के पास पूरी स्क्रिप्ट और पूरे डिज़ाइन एक साथ, बना-बनाया माल लेकर जाया जाए ताकि स्टूडियो के पास हां या ना के अलावा कोई तीसरा रास्ता ही ना बचे और फिल्म के अंदर भी यही ज़िद थी। शोन की किताब में नोलन कहते हैं, हमने पूरी ताकत इस बात से इनकार करने में लगा दी कि कॉमिक बुक फिल्म नाम की कोई चीज़ होती है। उनके लिए बैटमैन एक सुपरहीरो फिल्म नहीं थी। वह जेम्स बॉन्ड के स्केल वाली, हावर्ड ह्यूज़ (Howard Hughes) जैसे अरबपति की कहानी थी। ह्यूज़ वह सनकी अमेरिकन अरबपति था जिस पर नोलन एक फिल्म लिख चुके थे जो कभी बनी नहीं। उस स्क्रिप्ट का काफी हिस्सा ब्रूस वेन (Bruce Wayne) के किरदार में घुल गया।

 

बैटमैन बिगिन्स 2005 में आई और चली। अब नोलन के पास स्टूडियो का पैसा था और अगली फिल्म उन्होंने वह चुनी जो सबसे कम कमाऊ लगती थी। दो जादूगरों की दुश्मनी की कहानी। नाम, द प्रेस्टीज। अक्टूबर 2006, रिलीज़ से कुछ दिन पहले हॉलीवुड में एक चीज़ होती है, ट्रैकिंग। यानी सर्वे करके अंदाज़ा लगाना कि दर्शक की दिलचस्पी कितनी है। प्रेस्टीज की ट्रैकिंग रसातल में थी। फिर पहले रिव्यू आए और वह भी खराब। नोलन के एजेंट का फोन आया। एजेंट ने कहा, अफसोस है, अच्छी फिल्म थी।


और उसी हालत में नोलन को अपनी फिल्म के प्रीमियर पर जाना था। शोन को वह वही रात याद करते हुए बताते हैं, हम प्रीमियर की तरफ गाड़ी चलाते हुए जा रहे थे और हमें पता था कि हम डूब रहे हैं। फिर एक अजीब चीज़ हुई। वह नोलन के करियर का सबसे अच्छा प्रीमियर निकला। वजह यह कि लोग वहां कोई उम्मीद लेकर आए ही नहीं थे। सबको बताया जा चुका था कि फिल्म कचरा है। फिल्म उस हफ्ते नंबर एक पर खुली। 4 करोड़ डॉलर में बनी, 11 करोड़ कमाए।

 

नोलन के लिए असली चीज़ पैसा नहीं था। उस रात उन्होंने जो सीखा, वह उनके पूरे करियर की बुनियाद बन गया। उनके शब्दों में, जब सब कुछ हाथ से निकल जाए और हर आदमी मुड़कर आपसे कहे कि यह कचरा है, तब आपके पास बस एक ही चीज़ बचती है। वह ये कि आप खुद जानते हों कि फिल्म अच्छी है। सीखने वाली चीज है। नोलन के आइडिया को अगर पिच की तरह देखा जाए तो लगभग हर कोई कहेगा ऐसी फ़िल्में चलना मुश्किल है। हमारे यहां यही होता है। बड़ा हीरो, एक्शन चल रहा तो एक्शन करो। हॉरर कॉमेडी चल रही तो वह करो। क्या चल रहा, सब उसी के पीछे भागते हैं लेकिन नोलन कहते हैं, यू कैन नोट नो ऑडियंस माइंड, आप दर्शन का दिमाग़ नहीं पढ़ सकते। इसलिए वह करो जो आपको कन्विंस करता है। जिस पर आपको इंटरस्ट है।  

 

प्रेस्टीज जादू की कहानी है। फ़िल्म की पहली लाइन कहती है।  हर जादू के तीन हिस्से होते हैं। पहला, द प्लेज, जिसमें जादूगर आपको कोई आम चीज़ दिखाता है। दूसरा, द टर्न, जिसमें वह चीज़ गायब कर दी जाती है और तीसरा, द प्रेस्टीज, जिसमें उसे वापस लाया जाता है क्योंकि गायब करना काफी नहीं है। ताली तभी बजती है जब चीज़ लौटती है।

 

ये जादू के तीन हिस्से नहीं हैं। ये खुद नोलन की हर फिल्म का ढांचा है। वह आपको एक जानी-पहचानी चीज़ दिखाते हैं। फिर उसे उलट-पलट कर गायब कर देते हैं और आखिर में उसे इस तरह वापस लाते हैं कि आपको लगता है, ये मेरे सामने ही था और मैं देख नहीं पाया। और फिल्म की सबसे पहली लाइन, जो पूरे परदे पर गूंजती है, वह दरअसल दर्शक से पूछा गया सवाल है। क्या आप ध्यान से देख रहे हैं? प्रेस्टीज के बाद अगली फिल्म में नोलन ने वही सवाल दुनिया से पूछा। जवाब देने वाला था एक 28 साल का ऑस्ट्रेलियन एक्टर।

क्यों खास बने क्रिस्टोफर नोलन?

हीथ लेजर को जोकर (Joker) का रोल मिला तो इंटरनेट पर लोग हंसे थे। रोमांटिक फिल्मों वाला लड़का जोकर बनेगा? लेजर ने जवाब देने का अपना तरीका चुना। वह हफ्तों के लिए एक होटल के कमरे में बंद हो गए। अकेले। वहां वह आवाज़ों पर काम करते रहे, चाल-ढाल पर, हंसी पर। एक डायरी बनाई, जिसमें स्क्रिप्ट के डायलॉग अपने हाथ से दोबारा लिखे और साथ में तस्वीरें चिपकाईं। पंक रॉक गायक जॉनी रॉटन की। 'अ क्लॉकवर्क ऑरेंज' (A Clockwork Orange) फिल्म के उस किरदार की, जो सिर्फ तोड़ने के मज़े के लिए तोड़ता है।

 

मेकअप के लिए नोलन लेजर के ट्रेलर में एक पेंटिंग की किताब लेकर पहुंचे। फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) की, वह ब्रिटिश पेंटर जिसकी तस्वीरों में चेहरे पिघलते और बिगड़ते दिखते हैं। जोकर का मेकअप वहीं से आया। घिसा हुआ, उतरता हुआ, जैसे कई दिनों से लगा हो। एक दिन लेजर ने कहा, आज मेकअप मैं खुद लगाऊंगा। नतीजा दो चीज़ें निकलीं। पहली, वह मेकअप आर्टिस्ट जितना अच्छा नहीं लगा पाए। दूसरी, उनके हाथों पर मेकअप के धब्बे रह गए और लेजर ने कहा, ये तो सही है, जोकर खुद लगाता होगा तो उसके हाथों पर भी लगा रह जाता होगा। वे धब्बे फिल्म में रहने दिए गए और जोकर की वह मशहूर आदत, बार-बार होंठ चाटना? वह कोई एक्टिंग की तरकीब नहीं थी। मुंह के अंदर तक जाने वाले निशान के प्रोस्थेटिक बोलते वक्त ढीले पड़ जाते थे और लेजर उन्हें जीभ से बिठाते रहते थे ताकि दोबारा 20 मिनट मेकअप चेयर पर ना बैठना पड़े। मजबूरी किरदार बन गई।

 

नोलन एक सीन याद करते हैं, जिसमें जोकर एक पार्टी में घुसता है। वह कहते हैं, मैंने हीथ को धक्का दिया कि तुम्हें तूफान की तरह घुसना है। एक शानदार जश्न में ख़लल डाल देना है।  शॉट खत्म हुआ तो लेजर ने कहा, थैंक्स, मुझे पुश करने के लिए। नोलन बताते हैं कि असल ज़िंदगी में लेजर बेहद नर्म आदमी थे। किसी को असहज करना उनके बस की बात नहीं थी। लेजर ने खुद नोलन से कहा था, तुमने मुझे खतरनाक होने का बहाना दे दिया।

 

द डार्क नाइट 2008 में रिलीज़ हुई और 100 करोड़ डॉलर के पार गई लेकिन लेजर ये देखने के लिए ज़िंदा नहीं थे। फिल्म की रिलीज़ से 6 महीने पहले, नींद की दवाओं के एक्सीडेंटल ओवरडोज़ से उनकी मौत हो गई। 28 साल की उम्र में। ऑस्कर उन्हें मरने के बाद मिला लेकिन द डार्क नाइट सिर्फ एक अच्छे विलन की वजह से याद नहीं की जाती। फिल्म समीक्षक डैरेन मूनी (Darren Mooney) अपनी किताब 'Christopher Nolan: A Critical Study of the Films' में कहते हैं, माना जाता है- यह फिल्म आतंकवाद पर है लेकिन असल में ये फिल्म आतंकवाद पर पश्चिम की प्रतिक्रिया पर है।

 

देखिए फिल्म में होता क्या है। जोकर को पकड़ने के लिए बैटमैन एक-एक करके हर लकीर पार करता है। वह अपराधियों की टांगें तोड़ता है। वह जोकर को हिरासत में पीटता है और आखिर में वह ऐसी मशीन बनाता है जो गॉथम शहर के हर एक नागरिक के मोबाइल फोन को जासूसी उपकरण में बदल देती है। उसका अपना साथी लूशियस फॉक्स ये देखकर कहता है कि ये गलत है।

 

2008 में यह चीज़ कल्पना लगती थी। सिर्फ पांच साल बाद एडवर्ड स्नोडेन (Edward Snowden) ने दुनिया को बताया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां आम लोगों का डेटा उठा रही हैं। फिर यह कल्पना नहीं लगी और फिल्म का सबसे एक्सट्रीम हिस्सा वह है जो लोग अक्सर नहीं पकड़ते। जोकर कहीं से पैदा नहीं हुआ। फिल्म साफ कहती है कि बैटमैन ने जो अपराध के खिलाफ जंग छेड़ी, उसी ने जोकर के लिए जगह बनाई। गॉथम में पहले गुंडे थे लेकिन एक व्यवस्था थी। बैटमैन ने वह व्यवस्था तोड़ दी और जो वैक्यूम बना, उसमे जोकर आ गया।

डार्क नाइट, बैटमैन और बराक ओबामा

यह बात इतनी सटीक थी कि 2016 में द अटलांटिक मैगज़ीन में पत्रकार जेफ्री गोल्डबर्ग का एक बड़ा लेख छपा, जिसमें बराक ओबामा (Barack Obama) की आठ साल की विदेश नीति को समझने की कोशिश की गई थी। उस लेख में ओबामा के करीबी सलाहकारों ने गोल्डबर्ग को बताया कि व्हाइट हाउस की बंद कमरे की रणनीति बैठकों में, जब बात ISIS की होती थी, राष्ट्रपति खुद बार-बार एक ही तुलना करते थे- द डार्क नाइट की।

 

2014 के आसपास ISIS ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था और तेज़ी से फैल रहा था। सवाल यह था कि जिस इलाके में पहले से ही कई हथियारबंद गुट मौजूद थे, वहां यह एक संगठन इतना खतरनाक कैसे बन गया। ओबामा के मुताबिक, फिल्म की शुरुआत में गॉथम के गैंग लीडर मिलते हैं। वे गुंडे थेलेकिन शहर बंटा हुआ था, हर किसी का अपना इलाका था। फिर जोकर आता है और पूरे शहर में आग लगा देता है। ISIS जोकर है। उसके पास पूरे इलाके को आग में झोंकने की ताकत है। इसीलिए हमें इससे लड़ना है।

 

डार्क नाइट नोलन की सबसे उम्दा फ़िल्म मानी जाती है। जिसने सुपर हीरो फ़िल्मों का ग्रामर बदल दिया। डार्क नाइट के बाद नोलन के पास वह चीज़ थी जो हॉलीवुड में सबसे दुर्लभ है। इतनी कामयाबी कि स्टूडियो आपसे सवाल पूछना बंद कर दे। इस ताकत का इस्तेमाल उन्होंने उस स्क्रिप्ट पर किया जो 10 साल से उनकी दराज़ में पड़ी थी। सपनों के अंदर सपने- इंसेप्शन।

 

इस फिल्म का एक सीन याद कीजिए। होटल का गलियारा, जिसमें ग्रैविटी खत्म हो जाती है और लोग दीवारों और छत पर लड़ते हैं। नोलन ने 100 फुट लंबा असली गलियारा बनवाया, जिसके चारों तरफ 8 बड़े छल्ले लगे थे और दो बड़ी इलेक्ट्रिक मोटरें उसे पूरा 360 डिग्री घुमाती थीं। एक्टर जोसेफ गॉर्डन-लेविट 6 हफ्ते तक उस घूमते पिंजरे में पिसते रहे।

Dunkirk की कहानी कैसे आई?

2010 में इंसेप्शन आई और 80 करोड़ डॉलर से ज़्यादा कमाए। दुनिया अब मान चुकी थी कि नोलन का नाम ही एक ब्रांड है। इन्सेप्शन के बाद इंस्टरस्टेलर आई। जो अपने आप में एक कल्ट है। यह फ़िल्म और नोलन की पर्सनल लाइफ़ का एक खास कनेक्शन है। उसपर आगे आएंगे लेकिन अभी उनकी अगली फिल्म पर चलते हैं। साल 2017 में फ़िल्म आई डंकर्क। डंकर्क से जुड़ा अपना एक अनुभव बताता हूं। कब पहली बार Dunkirk की खबर आई थी। उस समय मेरे मन में एक सवाल आया था। नोलन हिट फ़िल्ममेकर थे लेकिन उन्हें ऑस्कर नहीं मिला था। डंकर्क के बारे में जब मैंने सुना तो लगा यह फ़िल्म ऑस्कर को देखकर बनाई जा रही है क्योंकि उस समय तक नोलन कॉन्सेप्ट फ़िल्में बना रहे थे जबकि Dunkirk इतिहास से , WW2 से और युद्ध से जुड़ी फ़िल्म है। ऐसी फ़िल्में हॉलीवुड में अक्सर ऑस्कर दिल देती हैं तो तब मुझे लगा था, इस फ़िल्म में नोलन क्या ही जादू दिखा पाएंगे।
 
इस फ़िल्म के बनने के पीछे भी एक कहानी है। 90 के दशक का बीच का दौर। फॉलोइंग की शूटिंग के दिनों की बात है। नोलन, एम्मा और उनका एक दोस्त इवान एक छोटी सी सेलबोट में इंग्लिश चैनल पार करने निकले। मंज़िल थी फ्रांस का एक बंदरगाह शहर, डंकर्क (Dunkirk)। प्लान शौकिया था। साल का गलत वक्त चुन लिया। समंदर उम्मीद से कहीं ज़्यादा ठंडा और मुस्किल निकला। जो सफर कुछ घंटों का होना था, वह खिंचता चला गया। आधी रात को जब किनारा आया, तो नोलन शोन से कहते हैं, मैं वहां पहुंचकर इतना खुश था कि बता नहीं सकता और यह तब था जब ऊपर से कोई बम नहीं गिरा रहा था।

 

यह आखिरी लाइन समझने के लिए थोड़ा इतिहास चाहिए। 1940 में दूसरे विश्व युद्ध के दौरान करीब 4 लाख ब्रिटिश और फ्रेंच सैनिक इसी डंकर्क के समुद्र तट पर फंस गए थे। चारों तरफ से जर्मन फौज घेर चुकी थी। तब इंग्लैंड से सैकड़ों आम लोग अपनी छोटी-छोटी निजी नावें लेकर उसी चैनल को पार करके सैनिकों को निकालने पहुंचे। करीब 3 लाख 38 हज़ार सैनिक बचा लिए गए। नोलन ने उस रात समंदर में वह डर खुद चखा था, बिना किसी जंग के। उसी रात यह कहानी उनके अंदर बैठ गई। फिल्म बनने में 20 साल और लगे।

 

जब बनी तो नोलन ने इसमें भी वही किया जो फॉलोइंग में किया था। समय को काटकर फिर से जोड़ा। डंकर्क फिल्म तीन घड़ियों पर चलती है। ज़मीन पर फंसे सैनिक की कहानी एक हफ्ते की है। नाव लेकर आते बूढ़े आदमी की कहानी एक दिन की और लड़ाकू विमान के पायलट की कहानी सिर्फ एक घंटे की। तीनों अलग रफ्तार से चलती हैं और आखिर में एक ही पल पर आकर मिलती हैं। 2017 में फिल्म ने करीब 52 करोड़ 70 लाख डॉलर कमाए और 8 ऑस्कर नॉमिनेशन लिए।

 

अब तक आप एक पैटर्न देख चुके हैं। मेमेंटो में समय उल्टा चलता है। इंसेप्शन में हर सपने के अंदर समय की रफ्तार अलग है। इंटरस्टेलर में एक ग्रह का एक घंटा धरती के 7 साल के बराबर है और पिता जब लौटता है तो बेटी उससे बूढ़ी हो चुकी है। डनकर्क में तीन घड़ियां एक साथ टिक करती हैं और टेनेट (Tenet) में तो चीज़ें और लोग समय में उल्टे बहते हैं। फिल्म समीक्षक बरसों से कहते आए हैं कि नोलन की फिल्मों का असली विलन कोई जोकर या कोई माफिया नहीं है। वह है घड़ी और इस जुनून का एक निजी सिरा भी है। वह आदमी जो परदे पर समय से लड़ता है, असल ज़िंदगी में उसने समय खाने वाली हर मशीन को घर से बाहर कर रखा है। नोलन के पास ना मोबाइल फोन है, ना ईमेल। शोन जब उनसे किताब के लिए संपर्क करना चाहते थे तो बात असिस्टेंट के ज़रिए होती थी। स्क्रिप्ट वह हाथ से लिखते हैं और शूटिंग सेल्युलॉइड फिल्म पर करते हैं, डिजिटल पर नहीं। ध्यान बंटाने वाली हर चीज़ हटाओ और जो बचे, उसमें पूरे डूब जाओ।

क्यों होती है क्रिस्टोफर नोलन की आलोचना?

अब तक यह कहानी एक सीधी चढ़ती हुई लकीर लग रही है लेकिन नोलन पर दो गंभीर इल्ज़ाम बरसों से लगते आए हैं। पहला- उनकी फिल्में कोल्ड हैं। दिमाग से बनी हैं, दिल से नहीं। दूसरा- उनकी फिल्में कई बार समझ ही नहीं आतीं।

नोलन की फ़िल्मों में इमोशन नहीं होते, क्या कम से कम पर्दे पर उभार कर दिखाई नहीं जाते- यह बात कुछ हद तक सही है। नोलन कहानी कहने वाले डायरेक्टर हैं। परफ़ेक्शनिस्ट नहीं हैं। उनकी फ़िल्मों में आपको कई ग़लतियाँ मिल जाएँगी। मसलन डार्क नाइट राइजेज में एक सीन है, जहाँ बैटमैन गुंडे को घूंसा नहीं मारता लेकिन वह अपने आप गिर जाता है। नोलन के लिए कहानी का इमर्सिव होना ज़्यादा जरूरी है। वह कैमरे को मिनटों के लिए चेहरे पर रोककर नहीं रखते। इसलिए कई लोग उनकी फ़िल्मों के उथले और ह्यूमन इमोशन से कटे हुए होने का इल्ज़ाम लगाते हैं। हालांकि, ऐसा है नहीं।

 

इंटरस्टेलर- नोलन की इस फ़िल्म का  असली नाम इंटरस्टेलर नहीं था। शूटिंग के दौरान फिल्म का वर्किंग टाइटल था, 'Flora's Letter'। फ्लोरा की चिट्ठी। फ्लोरा नोलन की सबसे बड़ी बेटी का नाम है। फिल्म में जो छोटी बच्ची मर्फ है, जिसे उसका पिता छोड़कर अंतरिक्ष में चला जाता है, वह फ्लोरा पर बनी है। एक्ट्रेस जेसिका चैस्टेन (Jessica Chastain) ने बताया कि जब फ्लोरा सेट पर आई, तो उन्हें अचानक सब समझ आ गया। उनके शब्दों में, इंटरस्टेलर उनकी बेटी के नाम एक चिट्ठी है।


नोलन खुद चार बच्चों के पिता हैं और महीनों घर से दूर रहकर फिल्में बनाते हैं। कूपर जब मर्फ को अपनी घड़ी देकर जाता है, तो वह कोई काल्पनिक सीन नहीं है। फिल्म समीक्षक इयान नैथन (Ian Nathan) अपनी किताब में लिखते हैं कि नोलन को कोल्ड फिल्ममेकर समझना एक भूल है। घड़ी के पुर्ज़ों के नीचे जज़्बात बह रहे होते हैं। आपको उन्हें ढूंढना पड़ता है।

 

नोलन पर दूसरा दूसरा इल्ज़ाम लगता है कि उनकी फ़िल्में समझ नहीं आती। ख़ासकर टेनेट। न्यूयॉर्कर ने इसे मिशन इनडिसाइफरेबल कहा, यानी वह मिशन जिसका मतलब निकाला ही नहीं जा सकता। फ़िल्म कोविड के दौरान रिलीज़ हुई थी और ज़्यादा मुनाफ़ा भी नहीं कमाई। इसलिए इसे नोलन के करियर की एकमात्र असफलता के तौर पर देखा जा सकता है लेकिन पर्सनली ये मेरी फ़ेवरेट फ़िल्म्स में से एक है। टेनेट की असलफता के बावजूद वह फ़िल्म एक रिस्क है। इतने कोमोलिकेटेड आईडिया को फ़िल्म में उतारने की कोशिश और उसके लिए कोई शॉर्टकट नहीं, घटिया VFX नहीं। ज़्यादा से ज़्यादा रियल शॉट। यही नोलन का USP रहा है।
    
इंटरस्टेलर के लिए मकई का खेत चाहिए था तो कनाडा में 500 एकड़ ज़मीन पर सच में मकई उगाई गई।। टेनेट में एक हवाई जहाज़ को इमारत में घुसाना था तो एक असली, रिटायर हो चुके बोइंग 747 का इस्तेमाल हुआ। टेनेट के तुरंत बाद नोलन के करियर में एक बड़ा बदलाव हुआ।कोविड के समय वॉर्नर ब्रदर्स ने ऐलान किया कि 2021 की उसकी सारी फिल्में थिएटर के साथ-साथ उसी दिन उसकी स्ट्रीमिंग सर्विस HBO Max पर भी आएंगी। नोलन के लिए, जिसने पूरा करियर इस ज़िद पर खड़ा किया था कि फिल्म बड़े परदे का अनुभव है, यह पीठ में छुरा था। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर उस सर्विस को सबसे घटिया स्ट्रीमिंग सर्विस कह दिया। बैटमैन से लेकर टेनेट तक, हर फिल्म वॉर्नर के साथ बनाने वाला डायरेक्टर स्टूडियो छोड़कर चला गया।

 

अगली फिल्म यूनिवर्सल के साथ बनी और वह फिल्म ऐसी थी जिस पर कोई भी स्टूडियो सामान्य हालात में पैसा नहीं लगाता। 3 घंटे लंबी। R रेटेड। जिसका हीरो एक फिज़िसिस्ट है और जिसका सबसे बड़ा एक्शन सीन दरअसल एक सरकारी कमरे में चल रही सुनवाई है। एटम बम बनाने वाले वैज्ञानिक रॉबर्ट ओपेनहाइमर की ज़िंदगी पर बनी यह फिल्म इतिहास की सबसे ज़्यादा कमाने वाली बायोग्राफिकल फिल्म बन गई और मार्च 2024 की उस रात, 13 नॉमिनेशन में से 7 ऑस्कर। बेस्ट पिक्चर और बेस्ट डायरेक्टर, क्रिस्टोफर नोलन। करियर की शुरुआत के 26 साल बाद पहली बार।

 

स्टेज पर नोलन ने कहा, सिनेमा अभी सिर्फ 100 साल पुराना है। सोचिए, पेंटिंग या थिएटर के इतिहास में 100 साल के मुकाम पर मौजूद होना कैसा रहा होगा। हमें नहीं पता ये सफर यहां से कहां जाएगा। एक सफ़र सिर्फ़ कहानी का नहीं है, कहानी कहने के दर्शन का भी है।  प्रोफेसर रॉबी गो (Robbie Goh) अपनी किताब 'Christopher Nolan: Filmmaker and Philosopher' में लिखते हैं कि नोलन की फिल्मों में कोई किरदार फिलॉसफी नहीं बोलता। कोई ज्ञानी बुज़ुर्ग नहीं है जो बैठकर आपको ज़िंदगी का मतलब समझाए। कोई भारी-भरकम वॉयसओवर नहीं है। कोई गहरा डायलॉग नहीं है जिसे आप डायरी में लिख सकें।

फिर फिलॉसफी है कहां? गो का जवाब। वह डायलॉग में नहीं, ढांचे में है।

 

आप मेमेंटो को उल्टा देखते हैं और उल्टा देखते-देखते आप खुद वह हो जाते हैं जो हीरो है। आपको कोई यह बताता नहीं कि याददाश्त के बिना इंसान क्या रह जाता है। आपको दो घंटे उस हालत में रखा जाता है और आप खुद जान जाते हैं। इंटरस्टेलर आपको ये नहीं समझाता कि समय क्या है। वह आपको एक ऐसे कमरे में बिठा देता है जहां एक घंटा 7 साल के बराबर है और फिर बाप को अपनी बेटी की भेजी वीडियो देखते हुए दिखाता है, जिसमें बेटी उससे बूढ़ी हो चुकी है।

यानी नोलन आपको पढ़ाते नहीं। वह आपको उस जगह पर खड़ा कर देते हैं और यही वह चीज़ है जो उस तहखाने से शुरू हुई थी। एक लड़का, एक रील, और ये सवाल कि अगर कहानी को उल्टा घुमा दिया जाए, तो देखने वाले को क्या महसूस होगा।


और नोलन को ये सफर अब ले गया है 3000 साल पीछे। याद कीजिए वह बात, जो नोलन ने 2001 में मेमेंटो के वक्त कही थी कि कहानियां सीधी लाइन में सुनाने की ज़िद सिर्फ सिनेमा में है। नॉवेल में नहीं, ग्रीक कहानियों में नहीं, होमर में नहीं। होमर, यानी प्राचीन ग्रीस का वह कवि जिसकी लिखी ओडिसी (Odyssey) दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ज़्यादा सुनाई गई कहानियों में से एक है। ट्रॉय (Troy) की जंग जीतकर घर लौटते राजा ओडिसियस (Odysseus) की कहानी, जिसे लौटने में 10 साल लग गए और दिलचस्प बात यह कि होमर ने भी यह कहानी शुरू से नहीं सुनाई थी। बीच से शुरू करके, आगे-पीछे कूदते हुए सुनाई थी। यानी नॉन-लीनियर स्टोरीटेलिंग कोई नोलन की ईजाद नहीं है। वह 3000 साल पुरानी है। नोलन बस उस कर्ज़ को स्वीकार कर रहे थे।

 

अब, 25 साल बाद, वह उसी होमर की फिल्म बना रहे हैं। द ओडिसी। आज 17 जुलाई 2026 को रिलीज़ हो रही है। बजट करीब 25 करोड़ डॉलर, यानी 2000 करोड़ रुपए से ऊपर। मैट डेमन बने हैं ओडिसियस, साथ में टॉम हॉलैंड, ज़ेंडाया, ऐनी हैथवे, रॉबर्ट पैटिंसन और शार्लीज़ थेरॉन और इसमें एक तकनीकी रिकॉर्ड भी है। यह इतिहास की पहली फिल्म है जो पूरी की पूरी IMAX कैमरों पर शूट हुई है। अब तक यह मुमकिन नहीं था क्योंकि IMAX कैमरे इतने भारी और इतने शोर करने वाले होते हैं कि उन पर बातचीत के सीन शूट ही नहीं हो पाते थे। नोलन ने IMAX कंपनी से कहा कि ये दिक्कतें ठीक करो और कंपनी ने उनके लिए नए, हल्के, खामोश कैमरे बनाए।

 

फिल्म की जो झलकियां अब तक आई हैं, उनमें आपको एक जानी-पहचानी चीज़ दिखेगी। एक सीन में ओडिसियस एक टापू पर बैठा कहता है, मुझे ट्रॉय से पहले का कुछ याद नहीं। क्या मेरी कोई पत्नी थी? बच्चे थे? शायद एक बेटा? अगर था, तो अब वह कितना बड़ा हो गया होगा? एक आदमी। जिसकी याददाश्त धोखा दे रही है। जो समय में खोया हुआ है और जो बस घर लौटना चाहता है। ये मेमेंटो का लेनर्ड भी है, इंटरस्टेलर का कूपर भी, इंसेप्शन का कॉब भी। नोलन ने CinemaCon में इस फिल्म के बारे में एक ही लाइन कही थी। ये कोई कहानी नहीं है। ये 'द' कहानी है।

 

जिस लड़के ने शिकागो के बेसमेंट में अंडे के डिब्बों से अपनी पहली स्पेस फिल्म बनाई थी, वह घूम-फिरकर उस कहानी तक पहुंचा है जहां से इंसान का कहानी सुनाना शुरू हुआ था।