विदेशी जमीन पर टेस्ट जीतना आज भारतीय टीम के लिए कोई असाधारण बात नहीं लगती लेकिन 1968 में तस्वीर बिल्कुल अलग थी। टीम इंडिया के पास प्रतिभा थी, अनुभव था, स्पिन गेंदबाजों की पूरी फौज थी लेकिन घर से बाहर अभी भी पहली टेस्ट जीत दूर की कौड़ी थी। फिर आया न्यूजीलैंड का दौरा।

 

15 फरवरी, 1968 को डुनेडिन के कैरिसब्रुक मैदान पर भारत और न्यूजीलैंड के बीच पहला टेस्ट शुरू हुआ। टीम इंडिया की कमान मंसूर अली खान पटौदी के हाथों में थी। सिक्के ने उनका साथ नहीं दिया। न्यूजीलैंड ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी चुनी। उसकी शुरुआत भी धमाकेदार रही। 45 रन पर पहला विकेट गंवाने के बाद कीवी टीम 200 रन तक पहुंच गई। लग रहा था कि वह पहाड़ समान स्कोर खड़ा कर लेगी लेकिन भारत ने ऐसी वापसी की, जिसने मैच की स्क्रिप्ट तय कर दी।

 

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न्यूजीलैंड की पारी 350 पर सिमटी

भारतीय गेंदबाजों ने न्यूजीलैंड को लगातार अंतराल पर झटके देने शुरू किए और उसकी पारी 350 पर समेट दी। सैयद आबिद अली ने 4 विकेट झटके। रामाकांत देसाई और बापू नाडकर्णी ने 2-2 विकेट लिए। बिशन सिंह बेदी के खाते में 1 विकेट रहा। न्यूजीलैंड की ओर से ग्राहम डाउलिंग ने अकेले मोर्चा संभालते हुए 143 रन की शानदार पारी खेली। बेवन कॉन्गडन ने 58 और मार्क बर्गेस ने 50 रन बनाए।

 

न्यूजीलैंड की पारी बिखरी जरूर लेकिन उसने बड़ा स्कोर बना लिया था। हालांकि भारतीय टीम घबराई नहीं। फारुख इंजीनियर ने 63 रन बनाकर मजबूत शुरुआत दी। इसके बाद अजित वाडेकर ने बागडोर संभाली। उन्होंने 80 रन की धैर्यपूर्ण पारी खेली। रुसी सुर्ती (28), कप्तान पटौदी (24) और ईरापल्ली प्रसन्ना (23) ने उपयोगी योगदान दिया। असली कमाल देसाई और बेदी की आखिरी जोड़ी ने किया। दोनों ने 57 रन की साझेदारी की।

 

न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाजों ने उन्हें आउट करने के बजाय बाउंसर से हमला करने की कोशिश की। देसाई (नाबाद 32) और बेदी (22) इससे डरे नहीं और कीवी गेंदबाजों का डटकर सामना करते हुए भारत को 359 के स्कोर तक पहुंचा दिया। भारत को 9 रन की महत्वपूर्ण बढ़त मिली।

 

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बढ़त हासिल करने से बढ़ा मनोबल

न्यूजीलैंड ने जहां रक्षात्मक रवैया अपनाते हुए अपनी पहली पारी में 157.3 ओवर में 350 रन बनाए थे, वहीं भारतीय टीम ने 124 ओवर में ही उससे ज्यादा रन बना दिए। 9 रन की बढ़त बहुत बड़ी नहीं थी लेकिन टीम इंडिया का मनोबल बढ़ाने के लिए ये काफी थे। इसका असर मैदान पर भी दिखने लगा। भारतीय गेंदबाजों ने न्यूजीलैंड की दूसरी पारी में शिकंजा कसना शुरू किया और 208 पर ढेर कर दिया। 


ईरापल्ली प्रसन्ना ने 6 विकेट लेकर न्यूजीलैंड की बल्लेबाजी क्रम की कमर तोड़ दी। बेदी और नाडकर्णी ने 1-1 विकेट झटके, जबकि दो कीवी बल्लेबाज रन आउट हुए। भारत को जीत के लिए सिर्फ 200 रन का टारगेट मिला।

 

लक्ष्य छोटा था लेकिन भारत को उसकी तरफ फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना था। ऐसा इसलिए क्योंकि, कुछ ही हफ्ते पहले भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ ब्रिस्बेन टेस्ट में लक्ष्य के काफी करीब पहुंचकर भी जीत से महरूम रह गई थी। उस हार का जख्म अभी ताजा था। डुनेडिन में भारत ने दूसरी पारी शुरू की। अबिद अली (10) जल्दी रन आउट हो गए। फारुख इंजीनियर भी 29 रन बनाकर चलते बने। टीम इंडिया का स्कोर 49/2 हो गया था। यहां से अजीत वाडेकर और रुसी सुर्ती ने मोर्चा संभाला।

 

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आखिरी दिन अचानक बढ़ी भारतीय खेमें में बेचैनी

वाडेकर-सुर्ती की जोड़ी ने जिम्मेदारी भरी बल्लेबाजी करते हुए भारत को 150 के पार पहुंचाया। दोनों के बीच शतकीय साझेदारी हो चुकी थी। चौथे दिन का खेल खत्म होने में कुछ ही वक्त बचा था कि सुर्ती 44 रन बनाकर आउट हो गए। उनके जाने के बाद वाडेकर और कप्तान पटौदी ने टीम इंडिया को और कोई झटका नहीं लगने दिया। चौथे दिन स्टंप्स तक भारत का स्कोर 161/3 था। जीत साफ दिख रही थी लेकिन पांचवें दिन न्यूजीलैंड ने जैसी शुरुआत की, उसने भारतीय खेमे में बेचैनी बढ़ा दी। जैक एलाबास्टर ने 163 के स्कोर पर वाडेकर (71) का बड़ा विकेट झटक लिया। भारत के स्कोर में 6 रन ही जुड़े थे कि पटौदी भी चलते बने।

 

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इस जोड़ी ने जीत की दहलीज तक पहुंचाया

169 रन पर आधी भारतीय टीम सिमट गई। लक्ष्य अभी भी 31 रन दूर था। लग रहा था कि जीत टीम इंडिया के हाथ से फिसल जाएगी लेकिन मोटगनहल्ली जयसिम्हा और चंदू बोर्डे ने छठे विकेट के लिए अटूट साझेदारी कर भारत को लक्ष्य तक पहुंचा दिया। टीम इंडिया ने 74.4 ओवर में 5 विकेट खोकर 200 रन बना लिए और विदेशी जमीन पर अपनी पहली जीत हासिल कर ली। यह महज एक जीत नहीं थी बल्कि, यह उस भारतीय टीम के लिए एक मानसिक दरवाजा खुलने जैसा था, जो विदेशों में जीत की तलाश में थी।

 

डुनेडिन की यह जीत किसी तूफानी अंदाज में नहीं आई थी। भारत ने न्यूजीलैंड को रौंदा नहीं था। उसने धीरे-धीरे मैच को अपने पक्ष में मोड़ा। पहले 350 का जवाब दिया, फिर 9 रन की बढ़त बनाई, उसके बाद स्पिनर्स ने न्यूजीलैंड की दूसरी पारी जल्दी समेटी और अंत में बल्लेबाजों ने लक्ष्य हासिल कर लिया।

 

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भारत के लिए बेहद खास है यह जीत

भारतीय क्रिकेट के लिए यह जीत इसलिए भी खास थी, क्योंकि यह उस न्यूजीलैंड दौरे की शुरुआत थी, जिसे भारत ने अंततः 3-1 से अपने नाम किया। डुनेडिन में जीत के बाद न्यूजीलैंड ने क्राइस्टचर्च में वापस की और दूसरा टेस्ट छह विकेट से जीत लिया लेकिन भारत ने वेलिंगटन और ऑकलैंड में अगले दोनों टेस्ट जीतकर सीरीज अपने नाम कर लिया। आज जब हम भारत की विदेशी टेस्ट जीतों की बात करते हैं, तो सबसे पहले लॉर्ड्स 1971, मेलबर्न 1977, पर्थ 2008, गाबा 2021 को याद करते हैं लेकिन इन बड़ी कहानियों के पीछे डुनेडिन जैसी कुछ छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण शुरुआतें भी छिपी हैं।