करीब 19 साल तक कर्नाटक के बेंगलुरु स्थित जैन कॉलेज में पढ़ाने वाली 52 वर्षीय असिस्टेंट प्रोफेसर उषा पीएस को कॉलेज ने सिर्फ एक लाइन का टर्मिनेशन लेटर देकर नौकरी से निकाल दिया था। इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। अब इस मामले में फैसला उनके पक्ष में आया है। एजुकेशनल अपीलेट ट्रिब्यूनल ने कॉलेज की कार्रवाई को नियमों के खिलाफ माना, टर्मिनेशन का आदेश रद्द कर दिया और कॉलेज को उन्हें फिर से असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर बहाल करने का निर्देश दिया।

 

उषा पीएस ने साल 2005 में जैन ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के जेसी रोड कैंपस में लाइफ साइंस की लेक्चरर के तौर पर नौकरी शुरू की थी। इसके बाद जनवरी 2021 में उनका ट्रांसफर वासवी रोड कैंपस कर दिया गया। फिर 29 जनवरी 2024 को उन्हें सिर्फ एक लाइन का नोटिस थमा दिया गया, जिसमें लिखा था कि 28 अप्रैल 2024 से उनकी नौकरी खत्म कर दी जाएगी। हैरानी की बात यह थी कि नोटिस में यह तक नहीं बताया गया कि उन्हें नौकरी से क्यों निकाला जा रहा है।

 

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कानूनी लड़ाई लड़ने का लिया फैसला

टर्मिनेशन नोटिस मिलने के बाद उषा पीएस ने कॉलेज प्रबंधन को पत्र लिखकर इसे वापस लेने और सेवानिवृत्ति तक सेवा जारी रखने की मांग की। उन्होंने कहा कि वह स्थायी कर्मचारी हैं और कर्नाटक शिक्षा अधिनियम, 1983 की धारा 92 के तहत तय प्रक्रिया अपनाए बिना उन्हें नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। कॉलेज की ओर से कोई जवाब नहीं मिलने पर उन्होंने एजुकेशनल अपीलेट ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की।

कॉलेज के तर्क सुनवाई में नहीं टिक पाए

कॉलेज ने ट्रिब्यूनल में दलील दी कि लाइफ साइंस विषय में छात्रों की संख्या कम हो रही थी और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) लागू होने के बाद पाठ्यक्रम बदल गया, जिससे उषा के विषय से जुड़े कोर्स कम हो गए। कॉलेज ने नियुक्ति पत्र की उस शर्त का भी हवाला दिया, जिसमें तीन महीने का नोटिस देकर सेवा समाप्त करने का प्रावधान था।

 

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हालांकि, सुनवाई के दौरान कॉलेज के कई दावों पर सवाल उठे। प्रिंसिपल यह साबित नहीं कर सके कि टर्मिनेशन नोटिस जारी करने की उन्हें लिखित अनुमति किसने दी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इसी दौरान नए शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी और अन्य फैकल्टी सदस्यों का तबादला भी किया गया था।

ट्रिब्यूनल ने बहाली का दिया आदेश

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि उषा पीएस केवल लाइफ साइंस ही नहीं, बल्कि पर्यावरण विज्ञान, भारतीय संविधान जैसे कई महत्वपूर्ण विषय पढ़ा रही थीं। उन्होंने जूलॉजी के अलावा कानून की डिग्री भी हासिल कर ली थी। कॉलेज के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि उनकी साप्ताहिक कक्षाओं की संख्या पहले के मुकाबले बढ़ गई थी, जिससे यह तर्क कमजोर पड़ गया कि उनके लिए काम नहीं था।

 

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करीब दो दशक की बेदाग सेवा, किसी भी अनुशासनात्मक शिकायत का अभाव और कॉलेज के विरोधाभासी रिकॉर्ड को देखते हुए ट्रिब्यूनल ने टर्मिनेशन को अवैध माना। 29 जून को दिए गए फैसले में कॉलेज को उषा पीएस को उनके पद पर बहाल करने का निर्देश दिया गया।