हिमाचल की पहाड़ी वादियों में केरल की संस्कृति, लोकधुनों और सामाजिक बदलाव की कहानियां गूंज उठीं। कुल्लू की पारंपरिक वेशभूषा से लेकर केरल के सामाजिक प्रतिरोध की विरासत तक, लोकगीतों से लेकर पारंपरिक व्यंजनों तक, राजकीय महाविद्यालय पनारसा में आयोजित ‘संगम-2026 : केरल मीट्स हिमाचल’ ने दो राज्यों की विविध सांस्कृतिक पहचान को एक साझा मंच पर ला खड़ा किया। इस आयोजन की खासियत सिर्फ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां नहीं रहीं, बल्कि यह सवाल भी रहा कि भारत की विविधता को समझने और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में शिक्षा संस्थानों और युवाओं की क्या भूमिका हो सकती है।

 

राजकीय महाविद्यालय पनारसा और केरल के निर्मला कॉलेज, मुवत्तुपुझा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम की अवधारणा थी- ‘अलग-अलग जड़ें, साझा कहानियां, एक यात्रा।’ ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना पर आधारित इस पहल में संस्कृति को केवल नृत्य, गीत और पारंपरिक परिधानों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि साहित्य, इतिहास, सामाजिक चेतना और सामुदायिक सहभागिता को भी इसका हिस्सा बनाया गया। आयोजन की एक उल्लेखनीय विशेषता यह रही कि इसमें किसी मुख्य अतिथि को आमंत्रित नहीं किया गया। इसके बजाय विद्यार्थियों, शिक्षकों, स्थानीय महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों और आमजन की सहभागिता को केंद्र में रखा गया। इससे कार्यक्रम को औपचारिक समारोह के बजाय खुले सांस्कृतिक संवाद का स्वरूप मिला।

 

केरल की संस्कृति से लेकर साहित्य तक की झलक

निर्मला कॉलेज की ओर से लगाई गई प्रदर्शनी में केरल के प्राकृतिक दृश्यों, साहित्य, कला, संस्कृति और लोकजीवन के विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत किया गया। चित्रों और प्रदर्शित सामग्री के जरिए हिमाचल के विद्यार्थियों और आगंतुकों को दक्षिण भारत के इस राज्य की सांस्कृतिक पहचान को करीब से जानने का अवसर मिला। केरल के प्रतिभागियों ने वहां की सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित लोकगीत और पारंपरिक लोकनृत्य प्रस्तुत किए। इन प्रस्तुतियों ने दर्शकों को केरल के लोकजीवन और उसकी कलात्मक अभिव्यक्तियों से परिचित कराया।

 

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महाविद्यालय के सम्मेलन कक्ष में तीन दृश्य-श्रव्य प्रस्तुतियां भी दिखाई गईं। इनमें दो केरल राज्य की विशेषताओं और सांस्कृतिक विविधता पर केंद्रित थीं, जबकि तीसरी निर्मला कॉलेज से संबंधित थी। इस माध्यम से विद्यार्थियों को केरल के सांस्कृतिक परिवेश के साथ वहां की शैक्षणिक दुनिया को समझने का अवसर मिला।

एक मंच पर हिमाचल की पहचान और केरल का प्रतिरोध

कार्यक्रम का सबसे विचारोत्तेजक पक्ष उन प्रस्तुतियों में दिखाई दिया, जिनमें संस्कृति को सामाजिक इतिहास से जोड़ा गया। राजकीय महाविद्यालय पनारसा की ओर से आयोजित पारंपरिक वेशभूषा आधारित मॉडलिंग में कुल्लू की परिधान परंपरा को केंद्र में रखा गया। इसमें हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान, स्थानीय पहनावे की विशिष्टता और उससे जुड़ी विरासत को सामने लाया गया। यह प्रस्तुति केवल पारंपरिक कपड़ों का प्रदर्शन नहीं थी, बल्कि उस सांस्कृतिक स्मृति की अभिव्यक्ति भी थी, जिसे पीढ़ियां अपने साथ आगे बढ़ाती हैं।

 

वहीं, केरल की सामाजिक परिवर्तन और प्रतिरोध की परंपरा पर आधारित विशेष प्रस्तुति ने कार्यक्रम को एक व्यापक वैचारिक आयाम दिया। इसमें नारायण गुरु, अय्यंकाली, सहोदरन अय्यप्पन और आदिवासी प्रतिरोध के प्रतीक थलक्कल चंदू जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के योगदान को सामने रखा गया। इन व्यक्तित्वों के माध्यम से सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष की कहानियां प्रस्तुत की गईं। इसने यह संदेश दिया कि किसी समाज की विरासत केवल उसकी कलाओं, उत्सवों और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि समानता, सम्मान और न्याय के लिए किए गए संघर्ष भी उसकी पहचान का अहम हिस्सा होते हैं।

 

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युवाओं के लिए इतिहास को देखने का दूसरा नजरिया

 

केरल के सामाजिक सुधारकों और प्रतिरोध की परंपरा को हिमाचल के शैक्षणिक परिसर में प्रस्तुत करना महज सांस्कृतिक आदान-प्रदान नहीं रहा। इसने विद्यार्थियों के सामने इतिहास को समझने का एक व्यापक नजरिया भी रखा। इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और सत्ता परिवर्तन का विवरण नहीं है। इसमें उन लोगों के संघर्ष भी शामिल हैं, जिन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव और असमानता को चुनौती दी। ऐसे प्रसंग युवाओं को लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और समान अवसरों के महत्व से जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं।

 

एक ओर हिमाचल की पारंपरिक वेशभूषा के जरिए क्षेत्रीय पहचान का उत्सव मनाया गया, तो दूसरी ओर केरल की सामाजिक चेतना से जुड़े प्रसंगों ने सांस्कृतिक संवाद को मानवीय मूल्यों से जोड़ा।

 

लोकगीतों और नृत्य में दिखी दो राज्यों की विविधता

कार्यक्रम में राजकीय महाविद्यालय कुल्लू और राजकीय महाविद्यालय पनारसा के विद्यार्थियों ने भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इनमें हिमाचल प्रदेश और केरल की सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान दिया गया। इन प्रस्तुतियों ने स्थानीय और राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान के बीच संबंधों को रेखांकित किया। अलग-अलग भाषाओं, पहनावों और लोककलाओं के बावजूद प्रस्तुतियों में समुदाय, परंपरा और सामूहिक जीवन के अनेक साझा सूत्र दिखाई दिए। इस तरह मंच पर मौजूद विविधता ने विद्यार्थियों को यह समझने का अवसर दिया कि किसी दूसरे राज्य की संस्कृति को जानना अपनी संस्कृति को छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी समझ को व्यापक बनाना है।

 

‘संगम-2026’ का एक अहम पक्ष इसका सामुदायिक और स्थानीय आर्थिक जुड़ाव भी रहा। आयोजन स्थल पर आसपास के महिला मंडलों, स्वयं सहायता समूहों तथा राजकीय महाविद्यालय कुल्लू और राजकीय महाविद्यालय पनारसा की ओर से खाद्य पदार्थों और स्थानीय उत्पादों की बिक्री के लिए स्टॉल लगाए गए। इन स्टॉलों पर पारंपरिक व्यंजनों, स्थानीय खाद्य पदार्थों और क्षेत्रीय उत्पादों को प्रदर्शित किया गया। आगंतुकों ने विभिन्न व्यंजनों का स्वाद लिया और स्थानीय खान-पान की विविधता से परिचित हुए।

 

खासतौर पर ऐसे पारंपरिक व्यंजनों को सामने लाने की पहल महत्वपूर्ण रही, जो बदलती जीवनशैली के बीच धीरे-धीरे लोगों की रोजमर्रा की थाली से दूर होते जा रहे हैं। स्थानीय खान-पान अपने भीतर केवल स्वाद नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संचित अनुभव, पारिवारिक परंपराएं और क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों से विकसित ज्ञान भी समेटे रहता है। महिला मंडलों और स्वयं सहायता समूहों के लिए ऐसे मंच अपने उत्पादों और कौशल को सामने लाने का अवसर भी बन सकते हैं। हालांकि इस तरह की पहल का दीर्घकालिक आर्थिक लाभ स्थानीय बाजारों से जुड़ाव और नियमित अवसरों पर भी निर्भर करेगा।

 

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जब कॉलेज की सीमाओं से बाहर निकला सांस्कृतिक संवाद

कार्यक्रम में आमजन की सहभागिता ने इसे एक अलग पहचान दी। लोग प्रदर्शनी देखने, प्रस्तुतियों से परिचित होने, पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेने और स्थानीय उत्पादों के स्टॉलों तक पहुंचे। इसमें शिक्षा संस्थान और समाज एक-दूसरे के करीब आते दिखाई दिए। विद्यार्थी जहां अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने की प्रक्रिया से जुड़े, वहीं स्थानीय समुदाय को अपनी परंपराओं, उत्पादों और कौशल को साझा करने का अवसर मिला। राजकीय महाविद्यालय पनारसा और निर्मला कॉलेज, मुवत्तुपुझा के बीच इस पहल ने अंतरराज्यीय शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक सहयोग की संभावनाओं को भी सामने रखा।

 

कार्यक्रम में राजकीय महाविद्यालय पनारसा की ओर से डॉ. लीना, डॉ. मनीष, स्नेहा राणा, सिया, मनीषा और धमेश्री सहित प्रतिभागियों ने सहभागिता की। निर्मला कॉलेज की ओर से डॉ. जूलिया, डॉ. सुजीदा, फादर लिंस और डॉ. अंजली सहित प्रतिभागी शामिल रहे। दोनों संस्थानों के प्रतिभागियों और स्थानीय समुदाय के सदस्यों की मौजूदगी ने आयोजन को सामूहिक स्वरूप दिया।