जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी (PDP) विपक्ष में हैं। आमतौर पर तीनों किसी भी मुद्दे पर एकमत भी नहीं होते। इसके बावजूद जम्मू-कश्मीर में एक ऐसा मुद्दा सामने आया है जिसमें सभी राजनीतिक दल एक सुर में उपराज्यपाल के फैसले का विरोध कर रहे हैं। यह मामला सिर्फ धान की खेती भर का है। नेता धान के खेतों में उतर रहे हैं और सरकारी अफसर और कर्मचारी धान की पौध उखाड़कर फेंक रहे हैं। नेताओं का आरोप है कि जिस जमीन पर किसान सैकड़ों साल से खेती करते आ रहे हैं, अब उसी पर धान की रोपाई करने पर सरकारी अफसर धमकी दे रहे हैं कि उनके खिलाफ पब्लिक सेफ्टी ऐक्ट (PSA) के तहत कार्रवाई की जाएगी।

 

सोमवार को पीडीपी के विधायक वहीद उर्रहमान पारा और इल्तिजा मुफ्ती, बीजेपी के अरशद हुसैट भट और नेशनल कॉन्फ्रेंस के हसनैन मसूदी जैसे नेताओं ने इसके खिलाफ प्रदर्शन किया। इन नेताओं ने एकदम महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह की तरह खुद धान की रोपाई की और कहा कि वे किसानों के साथ खड़े हैं। विरोध कर रहे लोगों का भी मानना है कि जमीन सरकार की ही है लेकिन उनका यह भी कहना है कि हजारों परिवारों के किसान दशकों से खेती कर रहे हैं तो अब उन्हें इस तरह से हटाना ठीक नहीं है।

किसानों के साथ आए नेता

सोमवार को कई पार्टियों के नेता किसानों के साथ खेतों में धान की रोपाई करते दिखे और सरकार के फैसले के खिलाफ विरोध दर्ज कराया। ये नेता दक्षिण कश्मीर के वांदेखपोरा, पडगमपोरा, गोरीपोरा और डांगरपोरा जैसे गांवों में गए। इन्हीं गांवों के किसानों को राजस्व विभाग के अधिकारियों ने कहा था कि इस बार वे सरकारी जमीनों पर धान की रोपाई न करें। किसानों का कहना है कि कई गांवों में पुलिस टीम के साथ आए तहसीलदार या अन्य अफसरों ने ट्रैक्टर चलवाकर धान की पौध खराब करवा दी।

 

यह भी पढ़ें: पहले 'गलती', अब उसे सुधारने की कवायद, TMC संभालने में कहां चूक रहीं ममता?

 

अपने विधानसभा क्षेत्र में राजस्व विभाग की ओर से हुई इस कार्रवाई के विरोधी में पीडीपी के विधायक वहीद पारा भी पहुंचे और गांव के लोगों लोगों से मुलाकात की। पीडीपी नेता इल्तिजा मुफ्ती भी किसानों से मिलीं और उन्होंने भी इस कार्रवाई का विरोध किया। वहीद के साथ नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता हसनैन मसूदी, मुख्तार अहमद बंध, बीजेपी और बीजेपी के अरशद हुसैन भट भी पहुंचे। इन सभी नेताओं ने एक सुर में सरकारी फरमान का विरोध किया और कहा कि किसान अपनी रोपाई जारी रखें। हालांकि, सहमे किसानों ने खेतों में उतरने की हिम्मत नहीं दिखाई तो नेता खुद खेतों में उतर गए। सोशल मीडिया पर वीडियो भी आए जिनमें देखा गया कि वहीद पारा खुद ट्रैक्टर चला रहे थे।

स्थानीय किसानों का कहना है कि इन नेताओं के चले जाने के बाद शाम को फिर से अधिकारियों ने उन्हें बुलाया गया। पुलवामा के तहसीलदार शकील अहमद का कहना है कि उन्होंने सिर्फ धान की पौध लगाने से किसानों को रोका था लेकिन मुद्दे को बेवजह बड़ा बना दिया गया। उन्होंने कहा, 'मैं इस इलाके से गुजर रहा था तो देखा कि कुछ किसान धान की रोपाई कर रहे थे। यह सरकारी जमीन है और इसे लैंड बैंक में शामिल किया गया है इसलिए मैंने किसानों को कहा कि वे इस जमीन पर रोपाई ना करें।' उन्होंने यह भी बताया कि कानून-व्यवस्था ना बिगड़े इसलिए उन्होंने ही पुलिस को बुला लिया था। 

क्या है पूरा मामला?

 

लंबे समय से जम्मू-कश्मीर के किसान ऐसी जमीनों पर खेती करते आए हैं जो सरकारी है। अब अचानक सरकार ने कहा है कि किसान इन जमीनों को खाली कर दें। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि जमीन क्यों खाली करवाई जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले भी ऐसी जमीनें खाली करवाई गईं। कहीं पर सरकारी हॉस्टल बन गए, कहीं पैरा मिलिट्री के कैंप बन गए तो कहीं अन्य संस्थान खोल दिए गए।

 

यह भी पढ़ें: नकल माफिया की शिकायत की, रेप केस लगा, नौकरी गई, अब कॉकरोच बनकर मांग रहा इंसाफ

 

अब एक बार फिर से जम्मू-कश्मीर में यही अभियान शुरू हो गया है और इसका जबरदस्त विरोध हो रहा है। पिछले ही हफ्ते पुलवामा में लगभग 1500 कनाल जमीन पर किसानों को धान की खेती करने से रोक दिया गया। कई जगहों पर किसानों ने जो रोपाई करके रखी थी, उसे उखाड़ दिया गया। चावल की खेती पर आश्रित रहने वाले किसान इससे परेशान हैं। अब राजस्व विभाग जमीन चिह्नित करके उसके घेराबंदी करवा रहा है और किसानों को उससे दूर कर रहा है।