आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में आमतौर पर लोगों का खाने-पीने का समय बिगड़ा रहता है। ऑफिस से देर से लौटना, वेब सीरीज देखते हुए स्नैकिंग, या पार्टी में देर रात डिनर करना लगभग आम बात हो गई है। ऐसे में कई बार लोगों के मन में ये सवाल जरूर उठता है कि क्या खाने का समय वाकई मायने रखता है या केवल इतना ही जरूरी है कि हम क्या और कितना खा रहे हैं। एक सवाल यह भी उठता है कि क्या देर से खाने से हमारा शरीर सुस्त हो जाता है, इसका सेहत पर कितना असर असर पड़ता है? क्रोनो-न्यूट्रिशन में पिछले कई सालों से स्टडी के जरिए इन्हीं सवालों का जवाब खोजा जा रहा है।
बता दें कि क्रोनो-न्यूट्रिशन एक साइंटिफिक टर्म है जो दो शब्दों से मिलकर बना है, क्रोनो यानी समय और न्यूट्रिशन यानी पोषण। क्रोनो-न्यूट्रिशन वह विज्ञान है जो यह स्टडी करता है कि खाने का समय हमारे शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिदम पर कैसे असर डालता है।
क्रोनो-न्यूट्रिशन का मतलब है कि हम क्या, कितना और किस समय खाते हैं, इसका हमारे शरीर की अंदरूनी घड़ी पर क्या असर पड़ता है। ज्यादातर लोग शरीर की इस घड़ी को सिर्फ नींद से जोड़कर देखते हैं लेकिन इसका असर शरीर के कई कामों पर पड़ता है। यह हमारे मेटाबॉलिज्म, शरीर में ऊर्जा खर्च होने, खाना पचने, ब्लड शुगर और आंतों के काम करने के तरीके को भी प्रभावित करती है। अगर हम यह समझ लें कि हमारे शरीर को किस समय क्या चाहिए, तो खाने का समय शरीर की प्राकृतिक दिनचर्या के हिसाब से तय किया जा सकता है। इससे सेहत को बेहतर रखने में मदद मिल सकती है। न्यूट्रिशनिस्ट रियान स्टीफेंसन
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कैसे देर से खाना बिगाड़ सकता है शरीर की लय?
दरअसल, हमारे शरीर में एक 'मास्टर क्लॉक' दिमाग में होती है, और लगभग हर अंग जैसे लिवर, अग्न्याशय (पैंक्रियास), आंतें की भी अपनी 'पेरिफेरल क्लॉक' होती है। ये घड़ियां दिन और रात के हिसाब से हॉर्मोन, पाचन एंजाइम और मेटाबॉलिज्म को कंट्रोल करती हैं। स्टडी बताती है कि नाश्ता शरीर की पेरिफेरल घड़ी को आगे बढ़ा सकता है, जबकि देर रात का खाना इस घड़ी को पीछे धकेल देता है, जिससे शरीर की आंतरिक लय गड़बड़ा जाती है।
खाने का गलत समय शरीर को कर सकता है सुस्त
रिसर्च यह भी बताती है कि जब खाने का समय शरीर की इंटरनल क्लॉक से मेल नहीं खाता, तो इसका सीधा असर मेटाबॉलिज्म पर पड़ता है। एक अहम स्टडी में पाया गया कि दिन के मुकाबले रात के समय ब्लड शुगर लेवल लगभग 17% ज्यादा बढ़ जाता है, और खाने के बाद इंसुलिन का शुरुआती रिस्पॉन्स लगभग 27% कम हो जाता है। यानी सिर्फ हमारी आदतें ही नहीं, बल्कि शरीर की आंतरिक सर्कैडियन घड़ी खुद भी इस बात को तय करती है कि हम खाना कितनी अच्छी तरह पचा और प्रोसेस कर पाएंगे। ऐसे में सिर्फ ये मायने नहीं रखता कि हम क्या खाते हैं और कितना खाते हैं, यह भी जरूरी है कि कब खाते हैं।
लगातार देर से खाने या अनियमित समय पर खाने की आदत को ग्लूकोज रिदम में गड़बड़ी, बॉडी टेंपरेचर और पेरिफेरल क्लॉक जीन्स के असंतुलन से जोड़कर देखा गया है। यह सब मिलकर शरीर को थका हुआ और सुस्त महसूस करा सकते हैं, भले ही नींद पूरी क्यों न ली गई हो। इसकी वजह से कई तरह की गंभीर बिमारियों का भी जोखिम बढ़ सकता है। इस स्थिति में मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी और टाइप-2 डायबिटीज समेत अन्य कार्डियोमेटाबॉलिक बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
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सबके लिए एक जैसा नियम नहीं
स्टडी बताती है कि क्रोनो-न्यूट्रिशन की बुनियादी साइंस (खाने का समय मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है) सबके लिए सच है लेकिन सबसे बेहतर समय क्या है, यह हर व्यक्ति के हिसाब से बदल सकता है। हर इंसान की क्रोनोटाइप अलग-अलग होता है। जैसे कोई मॉर्निंग पर्सन है या फिर कोई ऐसा है, जो रात में देर तक जागता है यानी नाइट ऑवल। यह फैक्टर भी तय करते हैं कि शरीर पोषक तत्वों को कैसे प्रोसेस करता है और हॉर्मोन कैसे रिलीज होते हैं। इसीलिए अब शोधकर्ता हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग खाने का सही समय तय करने पर जोर दे रहे हैं, न कि सभी के लिए एक ही नियम बनाने पर।
इसके अलावा, उम्र के साथ असर बदलता है। बुजुर्गों पर हुए एक बड़े स्टडी में पाया गया कि उनमें डिनर का समय उतना मायने नहीं रखता जितना ब्रेकफास्ट का समय। युवाओं और बुजुर्गों के लिए सलाह अलग हो सकती है। साथ ही, इसमें जेनेटिक फर्क भी मायने रखता है, कुछ लोगों का शरीर जेनेटिक रूप से ही अलग सर्कैडियन पैटर्न लेकर चलता है। हालांकि, शिफ्ट वर्कर्स, किशोरों और बुजुर्गों के लिए टाइमिंग को दुरुस्त रखना खासतौर पर फायदेमंद हो सकता है।
क्या करें?
एक पुरानी कहावत है सुबह का नाश्ता राजा की तरह करें, दोपहर का खाना राजकुमार की तरह और रात का खाना फकीर की तरह करें। इसका सार यह है दिन की शुरुआत भरपूर और पौष्टिक नाश्ते से करें, दोपहर में बैलेंस रखें और रात में हल्की और कम मात्रा में खाना खाएं। इसके साथ ही समय का भी ध्यान रखें। खाने और सोने का समय जितना नियमित रहेगा, शरीर की घड़ियां उतनी बेहतर तरीके से सिंक रहेंगी। सोने से 2-3 घंटे पहले डिनर खत्म करें, इससे शरीर को खाना पचाने का पूरा समय मिल जाता है और नींद पर असर नहीं पड़ता। देर रात स्नैकिंग से बचें, अगर भूख लगे भी, तो हल्का और पोषक विकल्प चुनें, भारी या मीठा स्नैक न लें।
