उत्तर प्रदेश के बलिया की सात साल की रागिनी एक पैर से दिव्यांग होने के बावजूद रोज स्कूल जाने की कोशिश करती थी। एक पैर के सहारे करीब 400 मीटर का रास्ता तय कर स्कूल पहुंचने वाली बच्ची की परेशानी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद डीएम ने बच्ची को ट्राईसाइकिल, किताबें और पढ़ाई से जुड़ा सामान दिया। बच्ची के इलाज और स्कूल तक पहुंचने में आ रही दूसरी दिक्कतों को दूर करने के निर्देश भी दिए गए लेकिन यह सिर्फ एक बच्ची की समस्या का समाधान है। देश में हजारों दिव्यांग बच्चे और युवा रोज इस तरह की समस्याओं का सामना करते हैं। 

 

रागिनी की कहानी यह सवाल भी खड़ा करती है कि अगर किसी दिव्यांग बच्चे को स्कूल पहुंचने के लिए रोज इतनी परेशानी उठानी पड़ रही है, तो उनके अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए जो कानून बने थे उनका क्या हुआ। क्या सरकार और प्रशासन दिव्यांग बच्चों को इसी तरह भगवान के भरोसे छोड़ सकता है। सोशल मीडिया पर रागिनी का वीडियो वायरल होने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं। 

 

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क्या है कानून?

ऐसा नहीं है कि सरकार ने दिव्यांग बच्चों के लिए कोई कदम नहीं उठाया है। सरकार ने दिव्यांग बच्चों के लिए समय-समय पर कई योजनाएं और कई कानून बनाए हैं और जरूरत के हिसाब से उनमें परिवर्तन भी किए हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 यानी RPwD Act में दिव्यांग बच्चों के अधिकारों का जिक्र किया गया है। यह कानून 27 दिसंबर 2016 को बनाया गया और 19 अप्रैल 2017 से लागू हुआ। इसका मूल उद्देश्य दिव्यांगजनों को दूसरों के बराबर अधिकार और अवसर दिलाना है।

RPwD एक्ट आखिर है क्या?

RPwD Act यानी दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 भारत का प्रमुख कानून है, जो दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह केवल सहायता या आर्थिक लाभ देने की बात नहीं करता, बल्कि दिव्यांग व्यक्ति को समानता, सम्मान, शिक्षा, रोजगार और समाज में पूरी भागीदारी का अधिकार देता है। कानून के तहत सरकारों पर यह जिम्मेदारी डाली गई है कि दिव्यांगजन भी दूसरे लोगों की तरह अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें। यानी सरकार और प्रशासन दूसरे सामान्य लोगों की तरह जीवन जीने के लिए दिव्यांग लोगों की मदद करेगा। 

पढ़ाई के मामले में क्या अधिकार हैं?

दिव्यांग बच्चों के लिए शिक्षा RPwD Act का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार के अनुसार, 6 से 18 साल की उम्र के बेंचमार्क दिव्यांगता वाले प्रत्येक बच्चे को मुफ्त शिक्षा का अधिकार है। इसके अलावा उच्च शिक्षा में भी बेंचमार्क दिव्यांगजनों के लिए सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में 5 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान है। तमाम सरकारी कॉलेजों में दिव्यांग बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हैं।  शिक्षा व्यवस्था को जरूरत के मुताबिक सहायता और सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। 

स्कूल तक पहुंचना भी अधिकार से जुड़ा मुद्दा

रागिनी के मामले में सबसे बड़ी समस्या स्कूल तक पहुंचने की थी। यहीं सुगम्यता यानी आसान पहुंच का मुद्दा सामने आता है। RPwD Act के तहत सार्वजनिक भवनों और सेवाओं को दिव्यांगजनों के लिए आसान बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें स्कूल, अस्पताल, ऑफिस, परिवहन व्यवस्था और अन्य सार्वजनिक स्थान शामिल हैं। अब ज्यादातर संस्थानों में सुगम्यता के नाम पर रैंप बना दिए जाते हैं लेकिन इसका सिर्फ इतना अर्थ ही नहीं है। इसमें जरूरत के अनुसार रैंप, रेलिंग, लिफ्ट, शौचालय, ब्रेल संकेत (दिव्यांगों के लिए खास संकेत), टैक्टाइल फ्लोरिंग और अन्य सुविधाएं शामिल हो सकती हैं। 

 

इसके साथ ही इस कानून में रीजनेबल अकॉमोडेशन की बात भी की गई है। आसान भाषा में समझें तो अगर किसी दिव्यांग बच्चे को पढ़ाई जारी रखने के लिए कोई विशेष सुविधा या व्यवस्था चाहिए तो वह उसे दी जाएगी। उस व्यवस्था का उद्देश्य यह होना चाहिए कि उसकी दिव्यांगता उसकी शिक्षा में अनावश्यक बाधा न बने। यानी रागिनी की मदद करना प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी थी। इसके साथ ही अगर कोई दिव्यांग लिखने में अक्षम होता है तो उसके लिए पेपर के दौरान राइटर यानी स्क्राइब देना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। स्कूल और कॉलेजों में दिव्यांग छात्रों को परीक्षाओं के दौरान स्क्राइब तलाशने में मुश्किलें होती हैं। इसके अलावा परीक्षा में अतिरिक्त समय जैसी सुविधाएं भी दिव्यांग छात्रों को दी जाती हैं। 

 

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रोजगार में भी अधिकार

RPwD Act का दायरा स्कूल और कॉलेज तक सीमित नहीं है। रोजगार के क्षेत्र में भी दिव्यांगजनों के लिए अधिकार और आरक्षण का प्रावधान है। सरकार के अनुसार, बेंचमार्क दिव्यांगजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। यानी कानून का मकसद दिव्यांग व्यक्ति को केवल सहायता पाने वाला व्यक्ति बनाना नहीं है। उसे शिक्षा हासिल करने, कौशल विकसित करने, नौकरी पाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का अवसर देना भी इसका उद्देश्य है। इसके अलावा RPwD Act में सार्वजनिक सुविधाओं और सेवाओं का जिक्र किया गया है जिसमें दिव्यांग बच्चों के कई अधिकार आते हैं। 

 

कानून भले ही दिव्यांग बच्चों को कई अधिकार देता है और कागजों पर यह अच्छे भी लगते हैं लेकिन असल में रागिनी को ट्राईसाइकिल के लिए लड़ना पड़ रहा है। ऐसे ही कई दिव्यांग आज ऐसे हैं जिन्हें कानूनी अधिकार के बावजूद बुनियादी सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। दिव्यांग बच्चे को अपनी बुनियादी जरूरत के लिए बार-बार संघर्ष करते हैं।