देशभर में पानी की कमी को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है और इस विषय पर अलग-अलग स्तरों पर मंथन चल रहा है कि पानी का सिर्फ एक उपयोग ना हो बल्कि उसे एक पूरे चक्र के रूप में इस्तेमाल किया जाए। इसी विषय पर नई दिल्ली में स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित अर्बन अड्डा 2026 में चर्चा हुई। गुरूजल की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में 'जल सुरक्षा के लिए सकुर्लरिटी' विषय पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में शहरों में पानी को सिर्फ एक बार इस्तेमाल करने के बजाय एक चक्र के रूप में मैनेज करने पर चर्चा हुई, जिससे पानी का संचयन, कम खपत, पुन: उपयोग और ज्यादा रिचार्जिंग की जा सके।
कार्यक्रम में HIRMI के EIC-सह-प्रधान निदेशक डॉ. सतबीर सिंह कादियान ने कहा कि भारत को अनियंत्रित भूजल दोहन से चक्रीय जल उपयोग की ओर ले जाने के लिए दो स्तरों पर काम करना होगा। उन्होंने कहा कि नियम, मानक और पानी निकालने की सीमाओं को सख्ती से लागू करने के साथ-साथ ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिससे साफ किए गए गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल करना सस्ता और आसान हो सके। उन्होंने गुरुग्राम का उदाहरण देकर समझाया कि पूरे देश में पानी की स्थिति एक जैसी नहीं है। ऐसे में पूरे देश के लिए एक जैसा नियम लागू करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से जल प्रबंधन की व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
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ट्रीटेड पानी क्यों नहीं बन पा रहा विकल्प?
इस कार्यक्रम में डॉ. सतबीर कादियान ने बताया कि जब तक भूजल निकालना सस्ता और साफ किए गए पानी को तैयार करने व एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का खर्च ज्यादा रहेगा, तब तक लोग और संस्थान ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल करने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाएंगे। इसलिए उद्योगों और कारोबारों में पानी के इस्तेमाल पर शुल्क, भूजल निकालने पर ज्यादा टैक्स और ज्यादा पानी निकालने पर जुर्माना बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हर काम के लिए पानी को बहुत ज्यादा स्तर तक साफ करना जरूरी नहीं है। कुछ उद्योगों को ज्यादा साफ पानी की जरूरत हो सकती है, लेकिन पार्कों, गैर-खाद्य फसलों की सिंचाई, निर्माण कार्य और झीलों के सुधार जैसे कामों में जरूरत के हिसाब से ट्रीटेड पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पानी के दोबारा इस्तेमाल की लागत भी कम रखी जा सकती है।
अलग-अलग मॉडलों पर चर्चा
इस कार्यक्रम में पानी के दोबारा इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग राज्यों में इस्तेमाल किए गए मॉडल का भी उदाहरण दिया गया। नागपुर में नगर निकाय ने एक बड़ी कंपनी के साथ मिलकर काम किया, जिससे सीवेज के पानी को दोबारा इस्तेमाल कर नगर निकाय के लिए कमाई का जरिया बनाया जा सकता है और ताजे पानी की महंगी सप्लाई पर निर्भरता घटाई जा सकती है। दिल्ली और बेंगलुरु के उदाहरण से यह भी बताया गया कि अगर पानी को इस्तेमाल वाली जगह के आसपास ही साफ कर दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो पानी पहुंचाने का खर्च कम हो सकता है और भूजल रिचार्ज में भी मदद मिल सकती है।
इस कार्यक्रम में डॉ. सतबीर कादियान ने हरियाणा के प्रयासों का जिक्र करते हुए कहा कि हरियाणा में 27 STP से मिलने वाले 326 MLD ट्रीटेड पानी के दोबारा इस्तेमाल के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है। इनमें 20 STP से जुड़े प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं और 7 पर काम जारी है। इसके अलावा 'वॉटर सिक्योर हरियाणा प्रोजेक्ट' के तहत 4 STP से मिलने वाले 171 MLD ट्रीटेड पानी के इस्तेमाल के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का प्रस्ताव है।
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जल सरंक्षण के तरीके बताए
डॉ. कादियान ने कहा कि पानी की सुरक्षा का मतलब सिर्फ तालाब बनाना या बारिश का पानी जमा करने की व्यवस्था करना नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि कितना पानी निकाला जा रहा है, कितना पानी दोबारा इस्तेमाल हो रहा है, कितना भूजल जमीन के अंदर पहुंच रहा है और कितना पानी बचाया जा रहा है। इसके लिए भूजल का स्तर, पानी की गुणवत्ता और भूजल रिचार्ज की सही स्थिति की लगातार जांच होनी चाहिए।
इसके लिए पानी बचाने वाले शहरों और संस्थाओं को आर्थिक मदद देने, पानी की निगरानी के लिए स्मार्ट सेंसर और डिजिटल मीटर लगाने और पानी से जुड़े आंकड़ों को सरकारी वेबसाइट पर सार्वजनिक करने का सुझाव दिया गया। इससे यह पता चल सकेगा कि पानी का इस्तेमाल और बचत कितनी हो रही है।
उन्होंने यह भी कहा कि पानी की सुरक्षा सिर्फ नए ढांचे बनाने से नहीं होगी। पानी की खपत कम करनी होगी, ट्रीटेड पानी का ज्यादा इस्तेमाल करना होगा और भूजल रिचार्ज पर ध्यान देना होगा। साथ ही, हर शहर की जरूरत के हिसाब से पानी के इस्तेमाल और बचत की व्यवस्था तैयार करनी होगी।
