पिछले एक-डेढ़ दशक में कांग्रेस पार्टी की इस बात को लेकर खूब आलोचना हुई है कि वह फैसले लेने में देर कर देती है। पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में फंसे रहने का नुकसान भी उठाना पड़ा। अभी भी उत्तर प्रदेश के कई राज्यों में उसकी स्थिति फंसी हुई ही दिखती है लेकिन दक्षिण के राज्यों में वह इस 'पेंडिंग मोड' से बाहर आती दिख रही है। तमिनलाडु और केरल के बाद अब कर्नाटक में भी कांग्रेस ने अब संभवत: 'बड़ा फैसला' लेने का मन बना लिया है। मंगलवार को दिल्ली में हुई मीटिंग के बाद लिए गए फैसलों को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, अगर वे वैसे ही सामने आते हैं तो कांग्रेस एक झटके में बदलती दिखेगी।

 

चर्चा है कि कर्नाटक में कांग्रेस अब सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री पद से हटाने जा रही है। इस स्थिति में डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री पद और सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र को कैबिनेट मंत्री का पद दिया जा सकता है। एक और चर्चा है कि सिद्धारमैया को राज्यसभा भेजकर फिलहाल के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे को कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनाया जाए। इसके बाद केसी वेणुगोपाल को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है। अगर ये सारे कयास सही साबित होते हैं तो कर्नाटक एक झटके में बदल जाएगी। कर्नाटक में सरकार और संगठन स्तर पर तो बदलाव होगा ही, संसद के अंदर और राष्ट्रीय नेतृत्व में भी बदलाव हो जाएगा।

 

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दक्षिण में ऐक्शन मोड में कांग्रेस

कांग्रेस ने तेज फैसले लेने की शुरुआत दक्षिण के राज्यों से की है। हाल ही में हुए तमिलनाडु चुनाव में कांग्रेस अपने पुराने साथी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के साथ थी। चुनाव नतीजे आते है जैसे ही कांग्रेस ने देखा कि अब तमिलागा वेट्री कड़गम (TVK) का समय आ गया है तो उसने बिना देरी किए ना सिर्फ जोसेफ विजय को समर्थन दिया बल्कि डीएमके से गठबंधन भी तोड़ लिया। कांग्रेस ने आगे आने वाले सारे चुनाव में टीवीके के साथ ही जाने का एलान कर दिया है। इसके जरिए वह संदेश दे रही है कि अब वह नए रास्ते पर चल रही है और भविष्य के हिसाब से परिस्थितियां देकर फैसले ले रही है।

 

कमोबेश ऐसी ही स्थिति केरल में भी दिखी। केरल में केसी वेणुगोपाल कई विधायकों और कांग्रेस नेतृत्व की भी पसंद बताए जा रहे थे। हालांकि, स्थानीय स्तर पर लोकप्रियता और कई अन्य कारणों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने वी डी सतीशन को मुख्यमंत्री बनाया। इस तरह कांग्रेस ने एक बगावत को फिलहाल तो रोक लिया। दूसरी तरफ, रमेश चेन्निथला को भी गृहमंत्री बनाकर उन्हें साध लिया गया। अब बारी केसी वेणुगोपाल की है। अगर उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाता है तो उनकी सीएम न बन पाने की कसक भी दूर की जा सकती है और इस तरह कांग्रेस अपने सभी सिपाहियों को संतुष्ट करने में भी कामयाब हो जाएगी।

 

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कर्नाटक में बदलाव हो जाएगा?

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने को लेकर लंबे समय से चर्चा हो रही है। हालांकि, अब ऐसा लगता है कि तमिलनाडु और केरल के बाद कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक पर भी फैसला कर चुका है। कहा जा रहा है कि इसके लिए सिद्धारमैया को तैयार कर लिया गया है और गुरुवार को इसका औपचारिक एलान हो सकता है। अगर ऐसा होता है कि सिद्धारमैया को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात है कि सिद्धारमैया और मल्लिकार्जुन खड़गे के रोल आपस में बदल दिए जाएं। यानी मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक लौटें और सिद्धारमैया राज्यसभा जाकर खड़गे की जगह लें। 

 

अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस अपने 'OBC अजेंडा' को और मजबूती से रख सकती है। साथ ही, मल्लिकार्जुन खड़गे को मुख्यमंत्री बनाने से वह ओबीसी नेता का पद छीनने वाले हमलों से बच जाएगी। मल्लिकार्जुन झड़गे दलित समुदाय से आते हैं और उन्हें सीएम बनाकर कांग्रेस कई राज्यों में दलित कार्ड को मजबूत कर सकती है। इससे पहले वह जोसेफ विजय को समर्थन देकर खुद की दलितों का समर्थक बनाने की कोशिश भी कर चुकी है। अगर वह दलित कार्ड को और मजबूती से पेश कर पाती है तो उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब जैसे राज्यों में उसे खुद को मजबूत करने का आधार मिल सकता है।

 

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उत्तर भारत में अभी भी पेंडिंग मोड जारी

भले ही दक्षिण के राज्यों में कांग्रेस पार्टी तेजी से फैसले लेती दिख रही हो लेकिन उत्तर भारत में अभी भी उसकी रफ्तार धीमी ही नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव हैं लेकिन कांग्रेस की कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दिख रही है। ना उसका खुद का संगठन अभी सशक्त दिख रहा है और ना ही वह अपने गठबंधन सहयोगी को लेकर निश्चित दिख रही है। कभी वह समाजवादी पार्टी के साथ जाती दिखती है तो कभी बहुजन समाज पार्टी से भी नजदीकियों की खबरें आती हैं।

 

बिहार में चुनावी हार के बाद से कांग्रेस एकदम ठंडी पड़ी हुई है। पश्चिम बंगाल में अब कांग्रेस को आसानी हो सकती है लेकिन चुनावी हार की समीक्षा तक नहीं हुई है और संगठन एकदम सुस्त सा पड़ा है। इसी तरह पंजाब में भी कांग्रेस में वैसी तत्परता नहीं दिख रही है जैसी कि अन्य पार्टियां दिखा रही हैं।