उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी की हैसियत मुख्य विपक्षी पार्टी की है। राज्य में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार है। 403 विधानसभा सदस्यों वाली विधानसभा में वैसे तो भारतीय जनता पार्टी के पास 253 सांसद हैं और राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार अपने दम पर है, फिर भी बीजेपी ने निषाद पार्टी, अपना दल (एस) और सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) जैसे दलों से मजबूत गठबंधन में है।
यूपी की सियासत में दिलचस्प बात यह है कि उतनी क्रूरता से जंग, सत्तारूढ़ बीजेपी और मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी नहीं लड़ रहे हैं,जितनी सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी और समाजवादी के बीच देखने को मिल रही है। हर सुबह सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर उठते हैं, X पर खूब लंबी पोस्ट करते हैं और अखिलेश यादव पर निशाना साधते हैं। इस जंग में यूपी की सियासत का ही एक अहम राजनीतिक परिवार पिस रहा है, वह परिवार है, अंसारी परिवार।
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अब्बास अंसारी, विधायक, सुहलदेव भारती समाज पार्टी:-
अखिलेश यादव मेरे बड़े भाई, ओम प्रकाश राजभर मेरे चाचा, दोनों पर टिप्पणी नहीं करूंगा। दोनों से मेरे पारिवारिक और व्यक्तिगत बहुत अच्छे संबंध हैं। आज हो रहा है, कल एक हो जाएंगे। राजनीति में होता रहा है। दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष हैं। बड़े लोग हैं। ये लोग आपस में सुलझा लेंगे।
अंसारी परिवार के सबसे चर्चित चेहरे, मुख्तार अंसारी की मौत हो चुकी है। उनकी गिनती सूबे के सबसे कुख्यात गैंगस्टर में होती थी। अपहरण, हत्या और रंगदारी के आरोपों में गले तक डूबे मुख्तार अंसारी के जीते-जी ही उनके बेटे अब्बास अंसारी विधायक बन चुके थे। साल 2022 में उनके जीते-जी ही सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी से विधायक रह चुके हैं। 2022 से पहले बहुजन समाज पार्टी में भी रहे हैं।
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चाचा सांसद, खुद विधायक, फिर क्यों उलझे?
अब्बास अंसारी के चाचा अफजाल अंसारी समाजवादी पार्टी से सांसद है। अब्बास अंसारी सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी से विधायक हैं। दोनों दल कभी साथ मिलकर चुनाव लड़ते थे, अब एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगल रहे हैं। गाजीपुर अंसारी परिवार का गढ़ माना जाता है। अखिलेश यादव खुद कह चुके हैं कि ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के खिलाफ इतनी बयानबाजी की है कि अब वह बीजेपी पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बना नहीं पाएंगे, समाजवादी पार्टी के लिए रास्ते बंद कर रहे हैं।
तल्खियां इस हद तक हैं कि वह पीडीए को 'पीट देगा अहीर' बता देते हैं। अब अगर यही तनाव रहा और सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी में गठबंधन नहीं होता है तो चाचा-भतीजे का टकराना तय है। 2022 के चुनाव में ओम प्रकाश राजभर और अखिलेश यादव पक्के दोस्त थे, अब चुनाव से पहले नए दुश्मन हैं तो मामला फंसता नजर आ रहा है।
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अब्बास अंसारी की मजबूरी क्या है?
अब्बास अंसारी किसके साथ जाएंगे यह अभी तय नहीं हैं। अगर ओम प्रकाश राजभर ही उन्हें टिकट देते हैं तो यह भी बीजेपी के लिए नैतिक दुविधा होगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बीजेपी नेतृत्व, मुख्तार अंसारी को माफिया मानता है, उनके बेटे को टिकट जाएगा तो यह तय ही है कि बीजेपी अपना उम्मीदवार या सहयोगी दल के उम्मीदवार को टिकट देगी। अभी उन्होंने औपचारिक तौर पर समाजवादी पार्टी की सदस्यता भी नहीं ली है।
क्या ओम प्रकाश राजभर दोबारा उतारेंगे?
ओम प्रकाश राजभर और समाजवादी गठबंधन के तहत 2022 का विधानसभा चुनाव हुआ था। ओम प्रकाश राजभर से जब मुख्तार अंसारी के आपराधिक इतिहास और अब्बास अंसारी की सियासत से जुड़े सवाल किए जाते हैं तो वह इनकार कर जाते हैं। उनका कहना है कि वह तो समाजवादी पार्टी के विधायक हैं, बस सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी के टिकट पर जीत गए थे। ओम प्रकाश राजभर यह भी कह चुके हैं कि अब्बास अंसारी से पार्टी में रहने या छोड़ने से सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी को कोई नुकसान या फायदा नहीं होगा।
अब आगे क्या है राह?
अखिलेश यादव, अब्बास अंसारी को चुनावी मैदान में उतार सकते हैं। जब उत्तर प्रदेश के बांदा जेल में 28 मार्च 2024 को मुख्तार अंसारी की मौत हुई थी, तब अखिलेश यादव ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट की समिति से यह जांच करानी चाहिए कि उन्हें जहर तो नहीं दिया गया था।
अखिलेश यादव, 7 अप्रैल 2024 को गाजीपुर के मोहम्मदाबाद स्थित उनके पैतृक आवास 'फाटक' भी पहुंचे थे। अब्बास अंसारी, अखिलेश यादव को बड़ा भाई बताते हैं। उनके चाचा समाजवादी पार्टी के सांसद हैं। परिवार में कलह की स्थिति नहीं है, हर मोर्चे पर यह परिवार एक नजर आता है। ऐसा हो सकता है कि पुराने नातों का हवाला देकर समाजवादी पार्टी उन्हें मऊ से फिर चुनावी मैदान में उतार दे।
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बहन जी वाला एंगल क्या है?
मुख्तार अंसारी ने अपनी सियासी पारी की शुरुआत 1996 में मऊ सदर विधानसभा सीट से की थी। तब वह बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लड़े। 2010 में उन्हें पार्टी से निकाला गया। कौमी एकता दल का उन्होंने गठन किया, 2017 में फिर जाकर बसपा में मिल गए। उन्हें 2017 में भी जीत मिली थी। अफजाल अंसारी ने साल 2019 में बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था, 2024 में वह समाजवादी हो गए थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में मुख्तार अंसारी को मायावती ने टिकट ही नहीं दिया। उनकी जगह भीम राजभर को उतार दिया था। तब से बहुजन समाज पार्टी और अंसारी परिवार के रिश्ते ठीक नहीं है। मायवती भी बाहुबलियों को शरण देने से बच रहीं हैं।
