विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस कई स्तर पर चुनौतियों का सामना कर रही है। अपने भी बागी रुख अपना रहे हैं। तृणमूल महिला कांग्रेस अध्यक्ष के पद से काकोली घोष दस्तीकार के इस्तीफा देने के बाद राष्ट्रीय प्रवक्ता शांतनु सेन ने भी अपना पद छोड़ दिया। इस बीच पार्टी ने बड़ा कदम उठाया है। टीएमसी ने अपनी सभी समितियों को भंग कर दिया है। पार्टी ने आत्म निरीक्षण और संगठनात्मक ढांचे का मूल्यांकन व समीक्षा करने का फैसला लिया है।

 

टीएमसी ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर लिखा, 'गहन विचार-विमर्श के बाद यह फैसला लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां और सभी अनुषांगिक संगठन तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे।'

 

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आगे लिखा, 'पार्टी हर स्तर पर आत्म-निरीक्षण, कार्य-निष्पादन समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन की एक व्यापक प्रक्रिया चलाएगी। इस प्रक्रिया के निष्कर्षों के आधार पर मुख्य संगठन और सभी अनुषांगिक संगठनों की संगठनात्मक संरचना का दोबारा गठन किया जाएगा और इसकी घोषणा उचित समय पर की जाएगी। पार्टी अपने संगठन को सुदृढ़ बनाने और उसे नए उत्साह व उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रतिबद्ध है।'

 

 

 

टीएमसी पर सबसे बड़ा सियासी संकट

पश्चिम बंगाल में टीएमसी बगावत से जूझ रही है। विधायकों का एक दल विधानसभा अध्यक्ष से मिला है। उसने अपने गुट को अलग से विधायक दल के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया है। माना जा रहा है कि टीएमसी ने समितियों को भंग करके संगठन पर अपने नियंत्रण को बनाए रखने की कोशिश की है। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद टीएमसी अपने सियासी इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से जूझ रही है।

 

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रितब्रता बनर्जी को पार्टी ने निकाला

टीएमसी के 59 बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपा है। सभी ने अपने गुट को मुख्य विपक्षी दल के तौर पर मान्यता देने का दावा पेश किया है। इस गुट की अगुवाई टीएमसी विधायक रितब्रता बनर्जी कर रहे हैं। सोमवार को ही टीएमसी ने संदीपान साहा के साथ रितब्रता को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया है। हालांकि टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 59 के बागी हो जाने के बाद शिवसेना जैसी टूट के कयास लगाए जा रहे हैं।