पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीच गठबंधन की बातें तो चल रहीं हैं लेकिन ' न प्यार, न इनकार' वाली स्थिति बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बड़े नेता कह रहे हैं कि पार्टी अकेले सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, लेकिन अंदरूनी स्तर पर दोनों पार्टियों के बीच बातचीत जारी है। अकाली दल, भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन तो करना चाहता है लेकिन बात कई कमजोर कड़ियों पर अटक जा रही है।
सुखबीर बादल की पत्नी और हरसिमरत कौर बादल, उनके भाई बिक्रम सिंह मजीठिया और उनके समर्थक गठबंधन के पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या पुराना गठबंधन फिर से उतना सफल हो पाएगा, जितना 2020 से पहले था? बीजेपी का एक धड़ा है, जिसका कहना है कि पंजाब में भी भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल की तरह काम करना होगा।
यह भी पढ़ें: BJP या अकाली दल, गठंबधन से किस पार्टी को होगा ज्यादा फायदा? समझिए पूरा गणित
हिट फॉर्मूला, हाशिए पर क्यों?
अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन की बदलौत पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रही है। बीजेपी हिंदू वोटरों को जोड़ने में कामयाब रहती थी, अकाली दल सिख वोटरों को जोड़ने में कामयाब रहा था। दोनों एक-दूसरे के वोट बैंक में दखल नहीं देते थे। अब हालात बदल गए हैं। 2020 के बाद कई अकाली नेता बीजेपी में चले गए हैं। हाल ही में बाठिंडा ग्रामीण के पूर्व विधायक दर्शन सिंह कोटफट्टा समेत मझा क्षेत्र के कई नेता बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। कुछ कांग्रेस के पूर्व नेता भी बीजेपी में आ गए हैं।
राज्य में बीजेपी के अध्यक्ष केवल ढिल्लों और पूर्व केंद्रीय मत्री रवनीत सिंह बिट्टू पुराने कांग्रेसी रहे है। 1984 के दंगों के मामलों में काम करने वाले एचएस फूलका भी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं। ये लोग पहले अकाली दल की काफी आलोचना करते थे। अकाली दल अपने सिख वोट बैंक को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अमृतपाल सिंह की पार्टी भी उसी वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं। बीजेपी की स्थिति बेहतर दिख रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत दोगुना होकर 18 प्रतिशत हो गया, जबकि अकाली दल का वोट आधा होकर 13 प्रतिशत रह गया।
दोस्ती में गांठ क्यों पड़ी है?
गठबंधन में वोट ट्रांसफर भी बड़ी समस्या बन सकता है। भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल को उनके वोट बैंक के हिसाब से ही सीटे मिल सकती हैं। जहां सिख वोट हैं, वहां अकाली, जहां हिंदू ज्यादा हैं, वहां बीजेपी। बीजेपी अब सहयोगी दलों पर ज्यादा सीटों के लिए दबाव बनाती है, ऐसे में अकाली को भी यह बात खटकेगी। पंजाब में 57 फीसदी से ज्यादा आबादी सिख है।
सिख इस बात से भी नाराज हैं कि राम रहीम को बार-बार पैरोल दिया जा रहा है लेकिन सिख कैदियों की रिहा नहीं किया जा रहा है। दोनों राजनीतिक पार्टियों का रुख भी बंदी सिखों को लेकर अलग है। ये मुद्दे हमेशा से टकराव के रहे हैं।
यह भी पढ़ें: पंजाब में सरकार बनाने के लिए अकाली दल को साथ लेगी BJP? जानिए क्यों है जरूरी
मुश्किल क्यों है गठबंधन की राह?
कई अकाली नेताओं का मानना है कि अब का गठबंधन पहले से ज्यादा मुश्किलों भरा है। बीजेपी अब वैसी नहीं रही जैसी अटल बिहारी वाजपेयी या लालकृष्ण आडवाणी के समय थी। अकाली दल का सियासी रसूख भी वैसा नहीं रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अकाली दल और बीजेपी के संभावित गठबंधन में सबसे बड़ी बाधा सीटों के बंटवारे और नेतृत्व की भूमिका को लेकर है।
बीजेपी अब पुराने छोटे भाई वाले फॉर्मूले को स्वीकार करने को तैयार नहीं। 2024 के लोकसभा प्रदर्शन के आधार पर ज्यादा सीटें मांग रही है। अकाली दल पंथिक पहचान पर जोर दे रहा है, सुखबीर बादल को सीएम उम्मीदवार बनाना चाहता है। बीजेपी पंजाब में नया नेतृत्व चाहता है। साल 2020 से ही बीजेपी और अकाली के बीच अनबन हुई है, तब से लेकर अब तक, किसानों की नाराजगी और सिख वोटरों के बीच बीजेपी की छवि भी गठबंधन की राह मुश्किल कर रही है।
