नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ ने हजारों जिंदगियां तबाह कर दी हैं। इस आपदा के बाद से ग्लेशियल झीलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। एक वैज्ञानिक अध्ययन ने चेताया है कि भारत में हिमाचल में मौजूद ग्लेशियल झीलों की संख्या 34 साल में करीब छह गुना हो गई है और इनमें दर्जनों झीलें ऐसी हैं, जिनका प्राकृतिक बांध टूटा तो पानी का सैलाब तेजी से नीचे की घाटियों की ओर आ सकता है।  

 

आंकड़ों के मुताबिक, 1990 में हिमाचल में 107 ग्लेशियल झीलें थीं, जबकि 2024 तक इनकी संख्या बढ़कर 669 हो गई। यानी तीन दशक से कुछ अधिक समय में इनकी संख्या में 525 फीसदी की वृद्धि हुई। इन झीलों का कुल क्षेत्रफल भी 5.54 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया है। इन झीलों के भीतर जमा पानी आने वाले समय में पहाड़ों के लिए बड़े खतरे का कारण बन सकता है। 

 

यह भी पढ़ें: सिक्किम, केदारनाथ और अब नेपाल, क्या है GLOF जिसकी वजह से हर बार मची तबाही?

झीलों के फटने के बाद आने वाले सैलाब ने बढ़ाई चिंता

आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, सिडनी के संयुक्त अध्ययन में 0.02 वर्ग किलोमीटर या इससे बड़ी 94 ग्लेशियल झीलों का विस्तृत आकलन किया गया। इनमें 88 झीलों को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के लिहाज से संवेदनशील पाया गया है। 

 

इनमें 9 झीलें बहुत अधिक जोखिम वाली, 18 उच्च जोखिम वाली और 26 मध्यम जोखिम वाली श्रेणी में रखी गई हैं। इसके अलावा, 73 झीलों के प्राकृतिक बांध अस्थिर पाए गए हैं, जबकि 58 झीलें भूकंपीय गतिविधियों के खतरे वाले क्षेत्रों में हैं।

बारिश और झील का पानी आया तो खतरा ज्यादा

असल खतरा तब पैदा होता है जब ग्लेशियल झील के ऊपर या आसपास अत्यधिक बारिश, बादल फटना, भूस्खलन, रॉकफॉल या हिमस्खलन जैसी घटना हो। इससे झील में अचानक बड़ी मात्रा में पानी पहुंच सकता है। पहले से दबाव झेल रहा प्राकृतिक बांध कमजोर होकर टूट जाए तो कुछ ही समय में पानी का विशाल प्रवाह नीचे की ओर तबाही मचा सकता है। शोधकर्ताओं ने इसे सबसे खराब स्थिति को मॉडल में शामिल किया है, यानी ग्लेशियल झील का फटना और अत्यधिक बारिश एक साथ होना।

सैलाब की ताकत का आकलन

अध्ययन के मॉडल के मुताबिक अत्यधिक बारिश और बाढ़ की चरम स्थिति में ब्यास बेसिन में पंडोह बांध तक 17,356 घन मीटर प्रति सेकंड और सतलुज बेसिन में भाखड़ा बांध तक 24,723 घन मीटर प्रति सेकंड तक का चरम जलप्रवाह पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

 

यह सिर्फ पानी की मात्रा का आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे छिपा खतरा उन सड़कों, पुलों, बस्तियों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य ढांचों का है, जो संकरी हिमालयी घाटियों में नदियों के किनारे बसे हैं। अध्ययन में 680 से अधिक ढांचों पर संभावित असर का आकलन किया गया है।

 

यह भी पढ़ें: नेपाल में झील फटने के बाद बिहार अलर्ट, कोसी और गंडक का बढ़ रहा जलस्तर

हिमाचल की तीन घाटियां सबसे ज्यादा चिंता में

ग्लेशियल झीलों से निकलने वाला पानी सबसे पहले ऊंचे हिमालयी इलाकों से नीचे की ओर आएगा। ऐसे में कुल्लू, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे जिले खास तौर पर संवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में नदियों के संकरे कॉरिडोर के साथ बड़ी संख्या में सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं मौजूद हैं।

छोटी झीलों की बढ़ती संख्या भी बड़ा संकेत

खतरा केवल बड़ी झीलों से नहीं है। 0.01 वर्ग किलोमीटर या इससे छोटी ग्लेशियल झीलों की संख्या 1990 में सिर्फ 9 थी, जो 2024 में बढ़कर 487 हो गई। यानी पहाड़ों पर बर्फ और ग्लेशियर के पीछे पानी के छोटे-छोटे नए भंडार तेजी से बन रहे हैं। यही बदलते हिमालय का सबसे बड़ा संकेत है।

निगरानी ही सबसे बड़ा बचाव

ग्लेशियल झील को बांध की तरह नियंत्रित करना आसान नहीं है। इसलिए खतरे को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका लगातार निगरानी, जोखिम वाली झीलों की पहचान, प्राकृतिक बांधों की स्थिति पर नजर और समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित करना है।

 

दरअसल, यह कहानी सिर्फ 88 झीलों की नहीं है। यह हिमाचल के बदलते मौसम और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों की कहानी है, जहां आज पहाड़ों की ऊंचाई पर जमा पानी, कल घाटियों के लिए बाढ़ बन सकता है।|