उत्तर प्रदेश की नई मतदाता सूची के विश्लेषण ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद सामने आए आंकड़ों के आधार पर दावा किया जा रहा है कि प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी में करीब 0.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इतना ही नहीं, नए जुड़े मतदाताओं में करीब 35 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय से होने की बात भी सामने आ रही है।
इन आंकड़ों के बाद मतदाता सूची के सत्यापन और जांच की तैयारियां तेज हो गई हैं। राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक, एसआईआर से पहले प्रदेश में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 18.6 प्रतिशत आंकी जा रही थी, जो अब बढ़कर 19.5 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। हालांकि चुनाव आयोग धार्मिक आधार पर मतदाताओं का कोई आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं करता है।
नए वोटरों में बढ़ी हिस्सेदारी ने बढ़ाई दिलचस्पी
सूत्रों के अनुसार 18 से 21 वर्ष आयु वर्ग में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत तक बताई जा रही है, जबकि 18 से 40 वर्ष आयु वर्ग में यह आंकड़ा 22 प्रतिशत के आसपास होने का दावा किया जा रहा है। नए मतदाता बनाने के लिए भरे गए फॉर्म-6 के आंकड़ों में भी मुस्लिम युवाओं की भागीदारी अधिक दिखाई देने की चर्चा है।
मतदाता सूची के विश्लेषण में कुछ अन्य विसंगतियां भी सामने आने की बात कही जा रही है। सूत्रों के अनुसार ऐसे कई मामले मिले हैं, जहां एक ही व्यक्ति के नाम पर अलग-अलग वोटर आईडी नंबर दर्ज हैं। वहीं कुछ मामलों में परिवारिक रिश्तों की मैचिंग दूसरे राज्यों में रहने वाले व्यक्तियों से होने की बात भी सामने आई है। इन मामलों की अलग से पड़ताल की जा रही है।
यह भी पढ़ें: राम मंदिर की चंदा चोरी पर बवाल, AAP कार्यकर्ता मांगने लगे 'भीख', समझिए खेल
सत्यापन के बाद होगी कार्रवाई
उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि इन आंकड़ों और दावों का आधिकारिक सत्यापन कराया जाएगा। यदि जांच में किसी तरह की गड़बड़ी या फर्जीवाड़ा सामने आता है तो मतदाता सूची को दुरुस्त करने की कार्रवाई की जाएगी। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सूची में केवल पात्र मतदाताओं के नाम ही दर्ज रहें।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने स्पष्ट कहा है कि चुनाव आयोग धर्म के आधार पर मतदाताओं का कोई डेटा नहीं रखता। हालांकि उन्होंने माना कि डुप्लीकेट मतदाताओं की शिकायतें मिलने पर जांच कर नाम हटाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि रिश्तों की गलत जानकारी या विदेशी नागरिकों के नाम जुड़ने जैसी शिकायतों पर सत्यापन कराया जा सकता है।
यह भी पढ़ें: 7 महारथी, मिशन एक, क्या समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को साध पाएगी? रणनीति समझिए
राजनीतिक दलों की बढ़ी दिलचस्पी
अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद से सभी राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर आंकड़ों का विश्लेषण कर रहे हैं। माना जा रहा है कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में हुए बदलावों का असर कई सीटों के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। यही वजह है कि पक्ष और विपक्ष दोनों की नजर अब मतदाता सूची के सत्यापन और उसके अंतिम निष्कर्षों पर टिकी हुई है।


