कर्नाटक के मैसूर के अपोलो बीजीएस अस्पताल में 88 साल की उम्र में एस जानकी का निधन हो गया है। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान दिल का दौरा पड़ने से उनका देहांत हुआ। एस जानकी ने अपनी आवाज से भारतीय सिनेमा में गांव की महिलाओं के दर्द और खुशी को बहुत गहराई से महसूस कराया था। उन्होंने अपने करियर में 48,000 से ज्यादा गाने गाए हैं। उन्होंने न सिर्फ गाने गाए बल्कि उन गानों में छिपे डर, उम्मीदों और सपनों को अपनी आवाज से एक अलग पहचान दी है।

 

एस जानकी की आवाज ने फिल्मों में गांव की मिट्टी की महक को पर्दे पर साकार कर दिया था। जब निर्देशक भारथिराजा ने अपनी फिल्मों के जरिए ग्रामीण परिवेश और वहां की सादगी को दुनिया के सामने रखा तो एस जानकी की आवाज ने उन दृश्यों में जान भर दी। उनकी आवाज में एक मिठास और जमीन से जुड़ाव था। जब उनकी यह आवाज संगीतकार इलैयाराजा की धुनों के साथ मिली तो हर गाना हिट हो गए। उस दौर के सिनेमा में यह जोड़ी एक बड़ी पहचान बन गई थी।

 

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किरदारों में जान

उनके गाने हर उस महिला के दिल की बात कहते थे जो अपने सपनों को तलाश रही थी। फिल्म '16 वयथिनिले' और 'सिंदूर पूवे' में श्रीदेवी के किरदार 'मयिलु' के लिए गाए उनके गीतों में एक गजब का भरोसा और कोमलता थी। फिल्म 'अलायगल ओइवथिल्लई' का मशहूर गाना 'आयिरम थामराई मोट्टुकले' हो या 'पूनरासम्पू पूथाचू' जैसा गीत, उनके हर धुन में इतनी गहराई होती थीं कि सुनने वाला उनसे जुड़ जाता था।

संगीत का सफर

एस जानकी का जन्म 23 अप्रैल 1938 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में हुआ था। उनके पिता एक आयुर्वेदिक डॉक्टर और शिक्षक थे। बहुत छोटी उम्र में ही उन्होंने नदस्वरम कलाकार पैदस्वामी से संगीत की समझ हासिल कर ली थी जबकि उन्होंने कोई बड़ी शास्त्रीय ट्रेनिंग नहीं ली थी। 1957 में तमिल फिल्म 'विधीइन विलयाट्टू' से उन्होंने अपने सफर की शुरुआत की। पहले ही साल में उन्होंने छह अलग-अलग भाषाओं में गाने गाकर अपनी जगह बना ली थी। उन्होंने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी जैसी कई भाषाओं में 48,000 से ज्यादा गाने गाए। वह आवाज बदलने की कला में माहिर थीं, एक ही गाने में वह कभी नन्हीं बच्ची तो कभी एक परिपक्व महिला के भाव ले आती थीं।

 

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उनके अपने उसूल

एस जानकी की मेहनत को पूरी दुनिया ने सराहा है। उन्हें चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और 33 से ज्यादा राज्य स्तरीय पुरस्कार मिले हैं। वे बहुत ही स्पष्ट और मजबूत इरादों वाली महिला रही हैं। साल 2013 में जब उन्हें पद्म भूषण देने की बात हुई तो उन्होंने सम्मानपूर्वक इसे लेने से मना कर दिया था। उनका मानना था कि उनके इतने लंबे और विशाल करियर के सामने यह सम्मान बहुत छोटा है और वह भारत रत्न की असली हकदार थीं। आज भी उनके गाने लोगों को सुकून देते हैं। उन्होंने फिल्मी नायिकाओं को एक ऐसी आवाज दी जिसमें डर के साथ-साथ सपनों को पूरा करने की हिम्मत भी थी। उनका संगीत हमेशा लोगों के दिलों में जीवित रहेगा।