पंजाब की राजनीति को समझना है तो जाट सिख समुदाय को समझना जरूरी है। राज्य की आबादी में जाट सिखों की हिस्सेदारी भले ही लगभग 20-25 प्रतिशत के आसपास मानी जाती हो, लेकिन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रभाव के मामले में उनका दबदबा कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि पंजाब की लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी में जाट सिख नेताओं का दबदबा दिखता है। कांग्रेस हो, आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) समेत तमाम दल जाट सिख नेताओं पर भरोसा दिखाती हैं। 

 

जाट सिख मूल रूप से पंजाब का कृषि प्रधान और जमीन से जुड़ा समुदाय है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में बड़ी मात्रा में कृषि भूमि जाट सिख परिवारों के पास है। पंजाब की हरित क्रांति में भी इस समुदाय की बड़ी भूमिका रही है, जिसने उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत बनाया। आज भी पंजाब में इस समाज के लोग बड़े स्तर पर खेती करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, गांवों में मजबूत पकड़ और कृषि अर्थव्यवस्था पर प्रभाव के कारण जाट सिख समुदाय लंबे समय से पंजाब की सत्ता की धुरी बना हुआ है।

 

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ज्यादातर सीएम जाट सिख

पंजाब के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो अधिकांश मुख्यमंत्री जाट सिख समुदाय से रहे हैं। इसमें प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह और वर्तमान मुख्यमंत्री भगवंत मान जैसे कई दिग्गज नाम शामिल हैं। चरनजीत सिंह चन्नी, ज्ञानी जैल सिंह गैर जाट सिख नेता भी सीएम रहे लेकिन उनका कार्यकाल बहुत छोटा रहा है। अकाली दल की राजनीति तो दशकों तक जाट सिख नेतृत्व के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। वहीं कांग्रेस और AAP ने भी राज्य में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए जाट सिख नेतृत्व को प्राथमिकता दी।

किसान आंदोलन के बाद मजबूत

2020-21 के किसान आंदोलन ने जाट सिख समुदाय के राजनीतिक प्रभाव को राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत किया। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ लंबा आंदोलन चलाया, जिसमें पंजाब के जाट सिख किसानों की भूमिका सबसे प्रमुख रही। इस आंदोलन के बाद राजनीतिक दलों ने महसूस किया कि पंजाब में जाट सिख समुदाय आज भी काफी ज्यादा ताकतवर है।  किसी भी चुनावी रणनीति की सफलता काफी हद तक इस समुदाय के समर्थन पर निर्भर करती है।

दलितों की आबादी ज्यादा

अगर जाति के हिसाब से देखा जाए तो पंजाब की कुल आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा दलित समुदाय का है। पूरे देश के किसी भी राज्य की जनसंख्या में दलितों की संख्या सबसे ज्यादा पंजाब में ही है, लेकिन पंजाब में दलित कभी राजनीतिक शक्ति के रूप में नहीं उभर पाए हैं। अब तक चरनजीत सिंह चन्नी को छोड़कर इस समुदाय से कोई भी सीएम नहीं बन पाया है। इसके पीछे मुख्य वजह दलित समुदाय में बिखराव है। पंजाब के दलित समुदाय में काफी ज्यादा बिखराव है और अलग-अलग गुट बने हुए हैं। ऐसे में सभी दलित कभी भी राजनीतिक रूप से संगठित नहीं हो पाए हैं। इसके विपरीत जाट सिख समुदाय के लोग संगठित हैं। दूसरा बड़ा कारण यह है कि दलित समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर है, जबकि जाट सिख समुदाय आर्थिक रूर से मजबूत है।  

BJP भी बदल रही है रणनीति

लंबे समय तक पंजाब में शहरी हिंदू वोट बैंक पर निर्भर रहने वाली BJP अब जाट सिख समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। हाल ही में पार्टी ने केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी  का अध्यक्ष बनाकर स्पष्ट संकेत दिया कि वह जाट सिख समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है। पार्टी इस फैसले से एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश कर रही है। केवल सिंह ढिल्लों को कमान देकर पार्टी सिख समुदाय को साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही पार्टी किसानों के बीच पैठ बढ़ाने की कोशिश भी कर रही है। 

 

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सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं जाट सिख

जाट सिखों का प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है। पंजाब की सहकारी समितियों, किसान संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और सामाजिक संगठनों में भी उनकी मजबूत मौजूदगी है। यही कारण है कि राज्य के बड़े फैसलों और राजनीतिक विमर्श में उनकी भूमिका अहम बनी रहती है। यही वजह है कि चाहे कांग्रेस हो, अकाली दल, AAP या BJP पार्टी जाट सिख नेताओं को आगे कर रही है।