सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक एक बार फिर से सड़कों पर उतरने की तैयारी में हैं। उनकी मांग है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर इस बात की जानकारी दी है कि इसको लेकर 23 सितंबर को लेह में 20 किलोमीटर की सांकेतिक पदयात्रा की जाएगी। हालांकि, इससे पहले यह पदयात्रा 19 से 23 सितंबर को होनी थी लेकिन इसे टाल दिया गया।
दोस्तों, एक जरूरी सूचना है। जिस पदयात्रा मार्च के बारे में मैंने आप लोगों को बताया था, वह लद्दाख की संस्कृति, पर्यावरण और लोकतंत्र के संरक्षण के समर्थन में 19 सितंबर से 23 सितंबर तक होने वाली थी। मौसम खराब होने, ठंड बढ़ने और राजनीतिक माहौल गरम होने के कारण इस पदयात्रा को स्थगित कर दिया गया है। इसकी जगह 23 सितंबर को लेह की ओर 1 दिन की सांकेतिक पदयात्रा की जाएगी। सोनम वांगचुक, सोशल एक्टिविस्ट
सोनम वांगचुक ने बताया कि बाद में यानी 24 सितंबर को शहीद दिवस के कार्यक्रम में भी लोग भाग ले सकते हैं। यह दिन उन लोगों की याद में मनाया जाएगा, जिन्होंने लद्दाख की संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण के लिए अपनी जान गंवाई।
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क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, 31 अक्टूबर 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019] के तहत लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को आधिकारिक रूप से अलग करके दो नए केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) बनाया गया था। लद्दाख में लेह और कारगिल दो जिले हैं और यहां कोई विधानसभा नहीं है। यहां का प्रशासन राष्ट्रपति के जरिए नियुक्त उपराज्यपाल चलाते हैं, जबकि केंद्र में इससे जुड़े मामलों की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय की है।
इसी को लेकर यह पूरा विवाद है, वहां के लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल अपने इलाके के फैसलों में उनकी भागीदारी का है। लद्दाख में अपनी विधानसभा नहीं है। स्थानीय संगठन चाहते हैं कि जमीन, रोजगार, संस्कृति और दूसरे स्थानीय मामलों में लोगों की भूमिका बढ़े। सोनम वांगचुक के नेतृत्व में समय-समय पर इसके लिए विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल भी किया गया।
इसी मांग को लेकर लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) लंबे समय से केंद्र सरकार से बातचीत कर रहे हैं। इन संगठनों की मुख्य मांगों में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देना और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना शामिल है। संविधान की छठी अनुसूची आदिवासी इलाकों को अपनी जमीन, संस्कृति और परंपराओं को खुद बचाने की आजादी देता है।
इसके तहत आदिवासी इलाकों में स्वायत्त जिला परिषद (ADC) बनाई जाती है, जहां आदिवासियों को खुद के नियम बनाने का कुछ हक मिलता है। यह परिषद अपनी जमीन, जंगल, खेती, शादी और रीति-रिवाजों से जुड़े कानून खुद बना सकती है, इसमें बाहर के लोगों का दखल नहीं होता है।
क्यों उठा यह विवाद?
लद्दाख में यहां विधानसभा नहीं है। स्थानीय संगठन चाहते हैं कि जमीन, रोजगार, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भूमिका बढ़े। इसके अलावा, लद्दाख की करीब 97% आबादी अनुसूचित जनजाति (ST) थी। इसी वजह से लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग उठी, ताकि स्थानीय लोगों को जमीन, संस्कृति और प्रशासन से जुड़े मामलों में विशेष अधिकार मिल सकें। लोगों को डर है कि बाहरी लोगों के आने से जमीन, रोजगार और स्थानीय संस्कृति पर दबाव बढ़ सकता है।
कब-कब क्या हुआ?
- 31 अक्टूबर 2019 को लद्दाख अलग से एक केंद्र शासित प्रदेश बना लेकिन विधानसभा नहीं मिली।
- 3 जनवरी 2023 को लद्दाख की मांगों पर बातचीत के लिए केंद्र ने हाई-पावर्ड कमेटी बनाई।
- मार्च 2024 को सोनम वांगचुक ने 21 दिन का अनशन किया और राज्य का दर्जा व छठी अनुसूची की मांग उठाई।
- 30 सितंबर 2024 को वांगचुक और समर्थकों को लद्दाख से दिल्ली आते समय सिंघु बॉर्डर पर हिरासत में लिया गया।
- 3 जून 2025 को केंद्र ने लद्दाख में नौकरी आरक्षण, डोमिसाइल, भाषा और हिल काउंसिल से जुड़े नए नियमों को मंजूरी दी, लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग जारी रही।
- 10 सितंबर 2025 को वांगचुक ने फिर भूख हड़ताल शुरू की।
- 24 सितंबर 2025 को लेह में प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई और इस हिंसा में 4 लोगों की मौत हुई।
- मार्च 2026 में LAB और KDA ने मांगों को लेकर फिर बड़े प्रदर्शनों का ऐलान किया।
- 9 सितंबर 2026 को केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच गवर्नेंस मॉडल को लेकर बातचीत हुई।
- 17 सितंबर 2026 को वांगचुक ने 23 सितंबर को 20 किमी की सांकेतिक पदयात्रा का ऐलान किया।
- 23 सितंबर 2026 को लेह में 20 किमी की पदयात्रा होनी है।
- 24 सितंबर 2026 को 24 सितंबर को 2025 की हिंसा में मारे गए लोगों की याद में शहीद दिवस मनाया जाएगा।
कौन-कौन हैं इस आंदोलन में शामिल?
इस आंदोलन में सोनम वांगचुक के साथ लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) शामिल हैं। LAB लेह के सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों का साझा मंच है, जबकि KDA कारगिल के संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है। लेह और कारगिल के स्थानीय लोग और कई सामाजिक-धार्मिक संगठन भी राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची और जमीन, रोजगार, संस्कृति व पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर इन मांगों का समर्थन कर रहे हैं।
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कहां पहुंचा यह विवाद?
बता दें कि यह विवाद लद्दाख के लेह और कारगिल से शुरू होकर दिल्ली तक पहुंचा। इतना ही नहीं, इन मांगों को लेकर दिल्ली में भी प्रदर्शन हुए। इसके अलावा, 24 सितंबर 2025 को लेह में प्रदर्शन के दौरान हिंसा में 4 लोगों की मौत हुई। 23 सितंबर 2026 को लेह में 20 किमी की सांकेतिक पदयात्रा प्रस्तावित है।
अब आगे क्या?
बता दें कि अब 23 सितंबर 2026 को लेह में 20 किलोमीटर की सांकेतिक पदयात्रा की जाएगी। इसके बाद 24 सितंबर को 2025 की हिंसा में मारे गए लोगों की याद में शहीद दिवस आयोजन होगा। LAB और KDA आगे भी केंद्र सरकार के साथ बातचीत जारी है। लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग मुख्य है।
हालांकि, केंद्र की ओर से लद्दाख के लिए जमीन, रोजगार, भाषा, डोमिसाइल और स्थानीय निकायों से जुड़े नियमों पर पहले ही कुछ फैसले किए जा चुके हैं। अब आगे की बातचीत में यह तय होना है कि राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग पर क्या रास्ता निकलता है।
