राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने डॉक्टरों, डॉक्टर और अस्पतालों के विज्ञापन और सोशल मीडिया प्रचार को लेकर नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसका मकसद मरीजों को झूठे, भ्रामक और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए मेडिकल दावों से बचाना है। नियम के तहत कोई डॉक्टर या अस्पताल खुद को नंबर 1 नहीं बता सकता है, 100 फीसदी इलाज की गारंटी नहीं दे सकता, बिफोर-आफ्टर फोटो या मरीजों के रिव्यू नहीं दिखा सकता, और ऑफर-डिस्काउंट देकर मरीज नहीं बुला सकता। नए नियम सोशल मीडिया, वेबसाइट, टीवी, अखबार, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, इन्फ्लुएंसर, स्पॉन्सर्ड पोस्ट और AI से बनाए गए ऐड पर भी लागू होंगे।
दूसरी ओर एक अलग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह गलत दवा मार्केटिंग को रोकने के लिए एक कानूनी सिस्टम पर विचार करें, इसके लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाए और ठोस सुझाव दें। यह मामला उन कंपनियों से जुड़ा है, जो डॉक्टरों को महंगे तोहफे और विदेश यात्राएं देकर अपनी दवा लिखवाती हैं। डॉक्टरों-अस्पतालों के विज्ञापन और दवा कंपनियों की मार्केटिंग, दोनों पर एक ही हफ्ते में सख्ती हुई है। दोनों मामले अलग हैं लेकिन दोनों में मरीजों को भ्रामक प्रचार, गलत दावों और दवाओं से बचाना है।
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क्या है नया नियम, सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) ने 6 अक्टूबर 2026 को नए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो तुरंत लागू हैं। इनका मकसद डॉक्टरों और अस्पतालों के भ्रामक विज्ञापनों और सोशल मीडिया पर झूठे प्रचार पर रोक लगाना है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट में दवा कंपनियों की गलत मार्केटिंग को लेकर याचिका दायर है। इसमें आरोप है कि कंपनियां डॉक्टरों को महंगे तोहफे और विदेश यात्राएं देकर अपनी दवाएं लिखवाती हैं।
कब, क्या हुआ?
- 6 अक्टूबर 2026: NMC ने डॉक्टरों-अस्पतालों के विज्ञापन पर नए दिशा-निर्देश जारी किए, जो तुरंत लागू हो गए।
- 8 अक्टूबर को एक याचिका की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक समिति बनाने का निर्देश दिया है।
- यह समिति फार्मास्युटिकल (दवा) कंपनियों के अनैतिक मार्केटिंग और प्रचार तरीकों पर रोक लगाने के उपायों पर विचार करेगी।
NMC ने विज्ञापन पर नियम क्यों बनाए?
झूठे और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे मरीजों को गुमराह कर सकते हैं।
बिफोर-आफ्टर फोटो, रिव्यू और इन्फ्लुएंसर प्रचार देखकर मरीज डॉक्टर चुन लेते हैं।
ऑफर और डिस्काउंट से मरीज ऐसे कंसल्टेशन या जांच के लिए आ सकते हैं, जिनकी जरूरत ही नहीं है।
सोशल मीडिया और AI से नकली रिव्यू और प्रमोशनल कंटेंट बनाना आसान हो गया है।
NMC का मकसद है कि मरीज को डॉक्टर के बारे में सही जानकारी मिले।
सुप्रीम कोर्ट में दवा कंपनियों का मामला क्यों उठा?
आरोप यह है कि कंपनियां अपनी दवा लिखवाने के लिए डॉक्टरों को महंगे तोहफे और विदेश यात्राएं देती हैं। ऐसे में मरीजों को वही दवा लेने पड़ती हैं, जो डॉक्टर लिखते हैं। इससे मरीज को महंगी या गैर-जरूरी दवा मिल सकती है।
इसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मौजूदा नियम कमजोर दवा कंपनियों के लिए मार्केटिंग कोड (UCPMP 2024) है, पर कोर्ट ने इसे लगभग स्वैच्छिक बताया है। यानी इसे मानना जरूरी नहीं और तोड़ने पर कार्रवाई का मजबूत तरीका नहीं है। कोर्ट ने कहा था कि स्वैच्छिक व्यवस्था में उपभोक्ता नुकसान में रहते हैं। इसलिए अब कमेटी से सुझाव देने को कहा है।
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NMC के नियम कहां हुए लागू?
NMC के नए नियम पूरे देश में लागू हो गए हैं, नियम सभी पंजीकृत डॉक्टरों, अस्पतालों और मेडिकल संस्थानों पर लागू हैं। इसके अलावा, हर माध्यम जैसे सोशल मीडिया, वेबसाइट, टीवी, अखबार, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, इन्फ्लुएंसर प्रचार, स्पॉन्सर्ड पोस्ट और AI से बने विज्ञापन सब पर लागू होते हैं।
दवा कंपनियों के लिए नियम अभी बने नहीं हैं, सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली में 8 अक्टूबर को केंद्र को कमेटी बनाने का निर्देश दिया। जनवरी 2027 में अगली सुनवाई होनी है। अगर कमेटी की सिफारिश पर कानून बना, तो वह देशभर की दवा कंपनियों और डॉक्टरों पर लागू हो सकता है।
नए नियम से कैसे बदलेगी तस्वीर?
NMC के नए नियम के तहत अब गारंटीड इलाज, बेस्ट डॉक्टर, नंबर-1 स्पेशलिस्ट, 100% सफलता, बिना दर्द इलाज, चमत्कारी इलाज जैसे दावे नहीं कर सकेंगे। इलाज की सफलता दर या कितने मरीज ठीक किए, यह बताकर प्रचार भी नहीं कर सकेंगे। इसके साथ ही अब लीडिंग, टॉप, सबसे भरोसेमंद जैसी तुलना तभी चलेगी, जब उसे साफ तरीके से जांचा जा सके और जानकारी दी जाए।
फोटो, रिव्यू और मरीजों की स्टोरी
इसके साथ ही बिफोर-आफ्टर फोटो, सर्जरी के नतीजे, सेलिब्रिटी मरीजों और सफलता की कहानियां प्रचार में नहीं दिखा सकेंगे। वैज्ञानिक या शैक्षणिक मकसद से, मरीज की पहचान छिपाकर और सहमति से ही छप सकता है। मरीजों के रिव्यू, रेटिंग और टेस्टिमोनियल न खरीद सकेंगे, न मांग सकेंगे। मरीज की सहमति होने पर भी ऐसा प्रचार जायज नहीं माना जाएगा। मरीज का नाम, चेहरा या पहचान वाली जानकारी साझा नहीं कर सकेंगे।
ऑफर और मरीज बुलाना
इसके अलावा, डिस्काउंट, कूपन, गिफ्ट, कैशबैक, फ्री प्रोसीजर जैसे ऑफर तब मना हैं, जब इनसे गैर-जरूरी जांच या इलाज बढ़ने का खतरा हो। मरीज को सीधे या किसी और के जरिए बुलाने की कोशिश नहीं कर सकेंगे। मरीज भेजने के बदले कमीशन, रेफरल फीस या गिफ्ट नहीं ले-दे सकेंगे। मार्केटिंग एजेंसी या इन्फ्लुएंसर को मरीजों की संख्या के हिसाब से पैसा नहीं
दे सकेंगे। डर दिखाकर प्रचार करना भी मना है।
सोशल मीडिया और AI
AI से बना प्रचार वाला कंटेंट मना होगा, नियमों के अंदर आने वाले AI कंटेंट पर AI से बना लिखना जरूरी है। AI से मरीज की फोटो, आवाज, रिव्यू या इलाज का नतीजा बनाना या बदलना मना है। नकली फॉलोअर्स, लाइक्स, कमेंट या रिव्यू नहीं खरीद सकेंगे। सर्च रैंकिंग को बदलकर गलत छवि नहीं बना सकेंगे। डॉक्टर को पोस्ट में अपना नाम, योग्यता और रजिस्ट्रेशन नंबर बताना होगा। अस्पताल को पोस्ट में डॉक्टरों के ये ब्योरे देने होंगे। हेल्थकेयर प्लेटफॉर्म पर पैसे देकर डॉक्टर की रैंकिंग ऊपर नहीं करा सकते हैं। डॉक्टर अपने नाम, फोटो या आवाज के साथ किसी दवा, मेडिकल डिवाइस या प्रोडक्ट का समर्थन नहीं कर सकेंगे, पैसा मिले या न मिले।
कहां मिली है छूट?
प्रैक्टिस शुरू करने, पता बदलने, कुछ समय की छुट्टी और फीस की घोषणा करने की छूट है। नामी मेडिकल जर्नल में छपी रिसर्च या केस स्टडी, सेहत की जानकारी देने वाले भाषण, पर्चे और जागरूकता कार्यक्रम, बशर्ते उनमें अपना प्रचार या इलाज की गारंटी न हो। अस्पताल अपना नाम, पता, विभाग, सुविधाएं, इमरजेंसी सेवा, मान्यता और फीस जैसी तथ्य वाली जानकारी दे सकते हैं। इसके अलावा, सरकारी योजनाओं और जनहित के अभियानों पर नियम लागू नहीं हैं।
अब आगे क्या?
डॉक्टर और अस्पताल अब NMC के नए नियम के हिसाब से विज्ञापन कर सकेंगे। गलती मिलने पर राज्य मेडिकल काउंसिल नोटिस देगी और फिर सजा तय करेगी। हालांकि, डॉक्टर 60 दिन के अंदर NMC के एथिक्स बोर्ड में अपील कर सकेंगे। NMC को जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त निर्देश, सलाह या प्रक्रिया जारी करने का अधिकार है।
वहीं दूसरे मामले में यह कमेटी देखेगी कि दवा कंपनियों की मार्केटिंग रोकने के लिए कानून चाहिए या नहीं। हालांकि, केंद्र को कोर्ट में बताना होगा कि उसने क्या कार्रवाई की। इस मामले पर 29 जनवरी को अगली सुनवाई होगी। तब तक दवा कंपनियों पर अभी वही मार्केटिंग कोड (UCPMP 2024) लागू रहेगा, जिसे मानना लगभग स्वैच्छिक है।
