देश की राजधानी दिल्ली में 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' के समर्थकों ने जंतर मंतर का घेराव किया है। उनका दावा है कि सरकार आरक्षण हटाने पर चर्चा के लिए तैयार हो गई है। महज 2 दिनों के आंदोलन ने सरकार को मजबूर किया है। उनका कहना है कि सरकार, आरक्षण में सुधार संबंधी मांगों पर चर्चा करने के लिए सहमति जताई है। सत्तारूढ़ दल के केंद्रीय मंत्री, प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए आएंगे।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आंदोलन अभी खत्म नहीं हुआ है। यह आंदोलन इंस्टाग्राम 'रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन' पर चलने वाले एक पेज के जरिए चलाया जा रहा है, जिसके करीब 56 लाख फॉलोअर्स हैं। शुक्रवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर सैकड़ों की संख्या में लोग जुटे और आरक्षण हटाने की मांग की।
पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार अब मांगों पर बात करने को राजी हो गई है। वे चाहते हैं कि इस चर्चा में यूट्यूबर अजीत भारती, आनंद रंगनाथन जैसे लोग भी शामिल हों, जिससे एक मुद्दे पर लोग सहमत हो सकें।
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प्रदर्शनकारी क्या चाहते हैं?
- आरक्षण देते समय आर्थिक स्थिति को ज्यादा महत्व दिया जाए
- गरीब व्यक्ति को जाति चाहे जो भी आरक्षण का लाभ मिले
- आरक्षित वर्गों के अंदर भी कोटा-इन-कोटा व्यवस्था हो
- सबसे कमजोर लोगों तक फायदा पहुंचाने की कोशिश हो
- सरकार से पिछले कई दशकों के आरक्षण के असर पर श्वेत पत्र जारी करे
- उच्च शिक्षा में दाखिले के लिए न्यूनतम अंकों का स्तर बनाए रखा जाए
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और ज्यादा सुविधाएं मिले
क्यों ऐसा चाहते हैं प्रदर्शनकारी?
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि हालात बदल गए हैं, इसलिए पुरानी व्यवस्था पर फिर से विचार होना चाहिए। देश में संविधान आने के बाद समाज समता मूलक हुआ है, इसलिए आरक्षण की पुरानी व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और नए सिरे से नए वर्ग को जोड़ने पर जोर दिया जाना चाहिए।
अजित भारती, आरक्षण हटाओ आंदोलनकारी :-
'आरक्षण एक सामाजिक समस्या का राजनीतिक समाधान है। यह व्यवस्था अब पढ़ाई और सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर प्रमोशन तक पहुंच चुकी है, जिससे योग्यता और कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है। बार-बार आरक्षण का दायरा बढ़ाने के बजाय समाज को वास्तविक सुधारों और समान अवसर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। सवाल यह है कि यह अंतहीन आरक्षण कब तक जारी रहेगा?'
देश में जाति आधारित आरक्षण हटाना मुश्किल क्यों है?
दीवान लॉ कॉलेज के विधि विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'भारत में दलित, वंचित और शोषित तबके को समानता के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण के प्रावधान बनाए गए। सदियों के शोषण, सामाजिक उपेक्षा और अधिकारहीनता ने इसे प्रासंगिक बनाए रखा। समाज के कई तबके में भी आज भी जातिगत भेदभाव देखने को मिलते हैं। यह असमानता जब तक रहेगी, उत्पीड़न जब तक रहेगा, आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी।'
असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'भारतीय संविधान जाति आधारित आरक्षण अनुच्छेद 15(4), 15(5) और 16(4) के तहत राज्य को सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है। यह समानता के मूल अधिकार का एक वैध अपवाद है। अगर इसे हटाया जाता है तो इसके लिए अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद के दोनों सदनों में बहुमत चाहिए। आरक्षण पर नेताओं की ही राय इतनी बंटी है कि एक ही दल के नेताओं की राय अलग-अलग हो सकती है। कोई इससे सहमत हो सकता है, कोई असहमत। संसद से लेकर सड़क तक, आरक्षण हटाने पर अराजकता की स्थिति पैदा हो सकती है।'
निखिल गुप्ता ने कहा, 'सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रा साहनी सहित कई निर्णयों में आरक्षण की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि 50 प्रतिशत की सीमा और क्रीमी लेयर जैसे शर्तों का पालन हो। समानता को मूल संरचना का हिस्सा मानते हुए भी सामाजिक न्याय के लक्ष्य को संतुलित अदालतें भी करती हैं। आरक्षण नीति दशकों से लागू है और इसके लाभार्थियों के प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के अधूरे लक्ष्यों की वजह से आरक्षण खत्म करने पर एकमत राय का होना कठिन है। कोई भी संशोधन कानूनी चुनौतियों और न्यायिक समीक्षा का सामना कर सकता है।'
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आरक्षण के पक्ष में तर्क क्या हैं?
राजकुमार भाटी, प्रवक्ता,समाजवादी पार्टी:-
मंडल आयोग की सिफारिशें केवल धार्मिक ग्रंथों पर आधारित नहीं थीं, बल्कि देशभर में गहन सामाजिक-आर्थिक सर्वे के आधार पर तैयार की गई थीं। घरों की स्थिति, शिक्षा का स्तर और आय जैसे ठोस मापदंडों का आकलन शामिल था। आज भी देश में दलितों और पिछड़े वर्गों के प्रति भेदभाव तथा छुआछूत की घटनाएं एक कड़वी हकीकत हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में समाज के वंचित वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण एक आवश्यक और अनिवार्य कदम है।
कितनी पुरानी है आरक्षण पर बहस?
बेनेट यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर और JNU के पूर्व शोधार्थी छात्र डॉ. दीपक कुमार ने कहा, 'जाति आधारित आरक्षण को खत्म करने की बहस लगभग उतनी ही पुरानी है, जितनी खुद आरक्षण व्यवस्था। 1882 में ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आनुपातिक हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व की मांग हंटर आयोग के सामने उठाई थी। लेकिन यह आरक्षण की वैचारिक नींव थी, औपचारिक नीति नहीं। आजादी से पहले कुछ रियासतों में इसे लागू भी किया गया, लेकिन जैसे-जैसे आरक्षण संस्थागत रूप लेता गया इसके विरोध में आवाजें भी साथ-साथ उठती रहीं।'
असिस्टेंट प्रोफेसर दीपक कुमार ने कहा, 'संविधान सभा में 1946-49 के दौरान इस पर गहन बहस हुई। 1980 में मंडल आयोग की सिफारिशों और 1990 में उनके लागू होने के बाद देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन हुए। 1992 के इंद्रा साहनी फैसले ने 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय की। यह बहस थमी नहीं है। दिल्ली में हो रहा आरक्षण हटाओ आंदोलन नया नहीं है। राजनीतिक दल इस पर बयानबाजी कितना भी करें, कितने भी प्रदर्शन हों लेकिन यह सच है कि आरक्षण अब हटाना टेढ़ी खीर है। इसमें हल्का सा बदलाव, बड़े हंगामे को दावत दे सकता है।'
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आरक्षण किन्हें और क्यों?
बीआर आंबेडकर की एक किताब है 'Who were The Shudras'। इस किताब में बताया गया है कि शूद्र चातुर्वर्ण्य व्यवस्था का चौथा वर्ण है, जिसे सेवक वर्ग कहा गया है। यह ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (सैनिक) और वैश्य (व्यापारी) के नीचे आता है। आंबेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि शूद्रों को शिक्षा, धन और शस्त्र रखने से वंचित रखा गया ताकि वे ऊपरी तीन वर्णों पर निर्भर बने रहें। ऐसे में इन वर्गों को समता के स्तर पर लाने के लिए आरक्षण देना जरूरी था।
आंबेडकर, आरक्षण पर क्या सोचते थे?
असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, 'डॉ. बीआर आंबेडकर का मानना था कि आरक्षण मात्र गरीबी उन्मूलन या आर्थिक सहायता का साधन नहीं, बल्कि सदियों से सत्ता और प्रशासन से वंचित वर्गों को शासन-प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने का संवैधानिक अधिकार था। संविधान सभा में अनुच्छेद 16(4) पर चर्चा करते हुए उन्होंने समान अवसर के सिद्धांत और पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति के बीच संतुलन पर जोर दिया।'
क्या आंबेडकर चाहते थे 10 साल में खत्म हो जाए आरक्षण?
इसे लेकर सबसे ज्यादा भ्रम की स्थिति है। आंबेडकर ने कभी नहीं कहा था कि आरक्षण सिर्फ 10 साल के लिए होना चाहिए। उनके बयानों को लेकर भ्रामक दावे किए जाते हैं।
भीम राव आंबेडकर, 25 अगस्त 1949 को संविधान सभा में:-
मैं व्यक्तिगत रूप से एक लंबी अवधि के लिए दबाव डालने को तैयार था, क्योंकि मुझे लगता है कि जहां तक अनुसूचित जातियों का सवाल है, उनके साथ अन्य अल्पसंख्यकों के समान व्यवहार नहीं किया जाता। मेरा मानना है कि इस सदन की ओर से अनुसूचित जातियों को इन आरक्षणों के संबंध में लंबी अवधि देना काफी उचित और उदार होता। अनुसूचित जनजातियों के लिए मैं और भी लंबी अवधि देने को तैयार हूं। जिन्होंने अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण के बारे में बात की है, वे इतने सतर्क रहे हैं कि यह चीज 10 साल में समाप्त हो जानी चाहिए। मैं उन्हें एडमंड बर्क के शब्दों में यही कहना चाहता हूं कि बड़े साम्राज्य और छोटे दिमाग एक साथ नहीं चलते।
यह आरक्षण व्यवस्था किसकी देन है?
असिस्टेंट प्रोफेसर निखिल गुप्ता ने कहा, '1932 के पूना पैक्ट ने वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की नींव रखी। कम्युनल अवॉर्ड के तहत दलितों को अलग निर्वाचन मंडल मिलने के विरोध में महात्मा गांधी के अनशन के बाद आंबेडकर ने संयुक्त निर्वाचन मंडल के साथ आरक्षित सीटों पर सहमति दी। प्रांतीय परिषदों में दलित सीटें 71 से बढ़कर 147 हो गईं। इस समझौते ने स्वतंत्र भारत में संयुक्त निर्वाचन और आरक्षित उम्मीदवारी का मॉडल स्थापित किया। बाद में आंबेडकर ने इस प्रणाली पर असंतोष व्यक्त किया कि इसमें दलित नेतृत्व बहुसंख्यक मतदाताओं और बड़ी पार्टियों पर निर्भर हो जाता है।'
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देश में दलितों की स्थिति क्या है?
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 'क्राइम इन इंडिया 2023' रिपोर्ट के मुताबिक अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ अपराधों के 57,789 मामले दर्ज हुए, जो 2022 के 57,582 मामलों से 0.4 प्रतिशत अधिक हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 15,130 मामले दर्ज हुए, इसके बाद राजस्थान में 8,449, मध्य प्रदेश में 8,232 और बिहार में 7,064 केस दर्ज हुए। दलितों के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध साधारण चोट के थे। कुल 18,437 केस सामने आए। इसके बाद आपराधिक धमकी और SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के मामले आए। अनुसूचित जाति की महिलाओं के बलात्कार के 2,835 केस और बच्चों के बलात्कार के 1,379 मामले दाखिल हुए। आरोप पत्र दाखिल करने की दर 81.2 प्रतिशत रही।
