कभी उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद की राजनीति में खुर्शीद परिवार का नाम कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था। पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की विरासत और पूर्व केंद्रीय मंत्री खुर्शीद आलम खां की राजनीतिक पहचान ने इस परिवार को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों और लगातार चुनावी हारों ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी लुईस खुर्शीद के सामने अपनी राजनीतिक विरासत बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
सलमान खुर्शीद ने 1991 में फर्रुखाबाद से लोकसभा चुनाव जीतकर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत पहचान बनाई। इसके बाद उन्हें कई बार हार का सामना करना पड़ा। 1996 और 1998 के लोकसभा चुनाव में वे जीत दर्ज नहीं कर सके। 2009 में उन्होंने शानदार वापसी करते हुए फर्रुखाबाद सीट जीती और केंद्र सरकार में मंत्री बने लेकिन इसके बाद उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार नीचे गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उम्मीदवार के हाथों हार का सामना करना पड़ा। 2019 में भी वह चुनाव हार गए और कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फर्रुखाबाद में कभी निर्णायक माने जाने वाले सलमान खुर्शीद का जनाधार पहले की तुलना में काफी कमजोर हुआ है।
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लुईस खुर्शीद का भी नहीं चला राजनीतिक जादू
लुईस खुर्शीद का राजनीतिक सफर भी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने 2002 में कायमगंज विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधायक बनने का गौरव हासिल किया था लेकिन इसके बाद जीत उनसे दूर होती चली गई।
लुईस खुर्शीद की चुनावी स्थिति
2002 – कायमगंज विधानसभा सीट से जीत।
2007 – कायमगंज विधानसभा सीट से बसपा उम्मीदवार कुलदीप सिंह गंगवार से हार।
2012 – फर्रुखाबाद सदर विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, पांचवें स्थान पर रहीं और लगभग 22,900 वोट मिले।
2017 – विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा।
2022 – फर्रुखाबाद सदर सीट से चुनाव लड़ा लेकिन बेहद खराब प्रदर्शन करते हुए लगभग 2 हजार वोटों तक सिमट गईं यानी विधायक बनने के बाद लुईस खुर्शीद लगातार तीन विधानसभा चुनाव हार चुकी हैं, जबकि एक चुनाव में उन्होंने हिस्सा ही नहीं लिया।
परिवार की विरासत पर बड़ा सवाल
खुर्शीद परिवार की पहचान केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं रही है। यह परिवार कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति का भी अहम चेहरा रहा है लेकिन पिछले डेढ़ दशक में चुनावी नतीजों ने संकेत दिया है कि परिवार की राजनीतिक पकड़ लगातार कमजोर हुई है। एक तरफ सलमान खुर्शीद लोकसभा चुनावों में लगातार सफलता हासिल नहीं कर पा रहे हैं, दूसरी तरफ लुईस खुर्शीद भी विधानसभा स्तर पर अपना जनाधार मजबूत करने में नाकाम रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या केवल पारिवारिक विरासत और राष्ट्रीय पहचान के सहारे राजनीति को आगे बढ़ाया जा सकता है?
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन लंबे समय से कमजोर स्थिति में है। जिला और बूथ स्तर पर पार्टी की सक्रियता पहले जैसी नहीं रही। इसका असर उन नेताओं पर भी पड़ा है जो कभी पार्टी के बड़े चेहरे माने जाते थे। फर्रुखाबाद में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के मजबूत होते आधार के बीच कांग्रेस लगातार हाशिए पर जाती दिखी है।
2027 और 2029 होंगे निर्णायक
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव खुर्शीद परिवार के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं। अगर कांग्रेस अपना जनाधार नहीं बढ़ा पाती और परिवार चुनावी सफलता हासिल नहीं कर पाता, तो कभी फर्रुखाबाद की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखने वाले इस परिवार की विरासत को सबसे बड़ा झटका लग सकता है।
फिलहाल, सलमान और लुईस खुर्शीद के सामने चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरासत को बचाने की भी है जिसने दशकों तक फर्रुखाबाद और कांग्रेस की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
