संजय सिंह,पटना। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उम्मीदवार बदलकर सबको चौंका दिया है। पार्टी के घोषित प्रत्याशी अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ 'अभिषेक बंटी' ने नामांकन के अगले ही दिन अपना नाम वापस ले लिया।
गुरुवार को सीएम सम्राट चौधरी और जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की मौजूदगी में उन्होंने शक्ति प्रदर्शन के साथ पर्चा भरा था। शुक्रवार को पारिवारिक कारण बताकर मैदान छोड़ दिया। इसके तुरंत बाद बीजेपी ने नीरज कुमार सिन्हा को नया उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस अचानक बदलाव से बिहार की सियासत गरमा गई है।
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पारिवारिक कारण या कोई और वजह?
बीजेपी की ओर से नाम वापसी की आधिकारिक वजह पारिवारिक कारण बताई गई है। अभिषेक बंटी ने भी कहा कि परिवार को समय देना जरूरी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा कुछ और है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी को डर था कि चुनाव में अभिषेक बंटी के परिवार से जुड़े पुराने मामलों को मुद्दा बनाया जा सकता है।
चर्चा है कि उनके माता-पिता का नाम चारा घोटाला मामले से जोड़ा जा सकता था। हालांकि इस बात की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न बीजेपी और न किसी एजेंसी ने इसे वजह बताया है। माना जा रहा है कि पार्टी किसी विवाद को चुनाव से पहले ही खत्म करना चाहती थी।
प्रशांत किशोर की एंट्री ने बढ़ाई टेंशन?
इस बार बांकीपुर का चुनाव सामान्य नहीं है। जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद इस सीट से मैदान में हैं। वह पिछले एक महीने से लगातार क्षेत्र में घूम रहे हैं। घर-घर जाकर सरकार के कामकाज पर सवाल पूछ रहे हैं।राजनीतिक जानकारों का कहना है कि पीके की सक्रियता से बीजेपी के लिए मुकाबला मुश्किल हो गया है। ऐसे में पार्टी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसी वजह से फौरन उम्मीदवार बदला गया।
अब यहां त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना है । बीजेपी के नीरज सिन्हा, राष्ट्रीय जनदा दल से रेखा गुप्ता और जन सुराज से प्रशांत किशोर के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना है । बंटी के चुनाव मैदान से हटाने का मुद्दा प्रशांत किशोर जोर शोर से उठा रहे हैं ।
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स्थानीय संगठन भी नाराज था
सूत्रों की मानें तो टिकट बदलने के पीछे स्थानीय नेताओं की नाराजगी भी वजह है। अभिषेक बंटी को पूर्व विधायक नितिन नवीन का करीबी माना जाता है। टिकट मिलने के बाद पार्टी के कई पुराने और संभावित दावेदार नाराज हो गए थे।
बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि चुनाव में संगठन एकजुट होकर लड़े। इसी को देखते हुए दिल्ली से नए नाम पर मुहर लगी। बांकीपुर सीट कायस्थ बहुल मानी जाती है। बीजेपी ने उम्मीदवार बदला लेकिन सामाजिक समीकरण नहीं बदला। नए उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा भी कायस्थ समाज से आते हैं। नीरज सिन्हा 2006 से बीजेपी के सदस्य हैं। संगठन में उनकी अच्छी पकड़ है। पार्टी को उम्मीद है कि वे परंपरागत वोट बैंक को साध लेंगे ।
दिल्ली की रणनीति, आखिरी दांव?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उम्मीदवार बदलने का फैसला सिर्फ पटना का नहीं, दिल्ली की रणनीति का हिस्सा है। बांकीपुर बीजेपी की प्रतिष्ठा की सीट है। यहां से पार्टी 2005 से लगातार जीत रही है। नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद यह सीट खाली हुई थी। पार्टी नहीं चाहती थी कि कोई भी विवाद इस जीत में बाधा बने। इसलिए आखिरी समय में सुरक्षित और साफ-सुथरी छवि वाला चेहरा उतारा गया।
बांकीपुर में 30 जुलाई को वोटिंग होगी। नतीजे तय करेंगे कि बीजेपी का आखिरी समय में लिया गया फैसला सही था या नहीं। फिलहाल बांकीपुर की गली-गली में एक ही चर्चा है, बंटी क्यों हटे और क्या नीरज सिन्हा बीजेपी का किला बचा पाएंगे?
