हिन्दू धर्म के मुताबिक, स्वर्गलोक का सिंहासन इंद्रदेव को मिला था। इसी पद की वजह से उन्हें अहंकार हो गया था। इस अहंकार के कारण उन्हें अपना सिंहासन छोड़ना पड़ा। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, इंद्रदेव को कई साल तक अपनी शक्तियों, वैभव और प्रतिष्ठा के बिना रहना पड़ा। उनकी गैरमौजूदगी में असुरों ने स्वर्गलोक में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया था। जिसके बाद स्वर्गलोक को बचाने के लिए देवताओं ने धरती के राजा नहुष को स्वर्गलोक का सिंहासन दे दिया। स्वर्गलोक का सिंहासन मिलने के बाद राजा नहुष को भी अहंकार हो गया, जिससे वह भी पाप करने लगे। तब बृहस्पति देव ने उन्हें सबक सिखाया।

 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इंद्रदेव ने अपने अहंकार की वजह से दुर्वासा ऋषि का अपमान किया था। जिस वजह से दुर्वासा ऋषि ने क्रोधित होकर इंद्रदेव को श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से इंद्रदेव शक्तिहीन हो गए और उन्हें अपना सिंहासन छोड़ना पड़ा। इसके बाद स्वर्गलोक में असुरों और राक्षसों का प्रकोप बढ़ने लगा। अब सवाल उठता है कि इंद्रदेव ने ऐसा क्या किया था कि उन्हें श्राप मिला? साथ ही, राजा नहुष की ऐसी कौन-सी गलती थी जिसकी वजह से उन्हें स्वर्गलोक के सिंहासन से हटना पड़ा?

 

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दुर्वासा ने इंद्रदेव को क्यों दिया श्राप

 

पौराणिक कथा के मुताबिक, दुर्वासा ऋषि अपने क्रोध के लिए जाने जाते थे। एक दिन इंद्रदेव और दुर्वासा ऋषि की मुलाकात हुई। उस दौरान इंद्रदेव अपने हाथी ऐरावत पर सवार थे। मिलने की खुशी में दुर्वासा ऋषि ने इंद्रदेव को एक दिव्य माला उपहार के तौर पर दी। इंद्रदेव ने वह उपहार स्वीकार तो कर लिया, लेकिन माला स्वयं धारण करने के बजाय हाथी को पहना दी। हाथी ने अपनी सूंड से माला जमीन पर फेंक दी और उसे पैरों से कुचल दिया। यह देखकर दुर्वासा ऋषि क्रोधित हो गए। क्रोध में उन्होंने इंद्रदेव को धन और वैभव से वंचित होने का श्राप दे दिया। जिसके परिणामस्वरूप इंद्रदेव को अपना राजपाट छोड़ना पड़ा।

 

इंद्रदेव के अचानक सिंहासन छोड़ने की वजह से स्वर्गलोक में हाहाकार मच गया। असुरों ने अपनी शक्तियों के बल पर लोगों के हवन और यज्ञ करवाना बंद करा दिया। इससे परेशान होकर सभी देवता विचार करने लगे कि इस समस्या से कैसे निजात पाई जाए।

 

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नहुष को मिला स्वर्गलोक का सिंहासन

 

सभी देवताओं के मन में एक ही नाम आया कि धरती लोक के शक्तिशाली राजा नहुष को स्वर्गलोक का सिंहासन सौंपा जाए, ताकि स्वर्गलोक में असुरों का खात्मा किया जा सके। फैसले के मुताबिक, नहुष को स्वर्गलोक का राजपाट दिया गया। नहुष ने जल्द ही अपनी शक्ति के बल पर स्वर्गलोक से असुरों को खदेड़ दिया और स्वर्गलोक को पहले जैसा सुंदर और शांतिमय बना दिया।

 

हालांकि, कुछ समय बाद नहुष भी धन और शक्ति के मोह में अहंकारी और पापी हो गए। उनके पापों की वजह से उन्हें अजगर बनने का श्राप मिल गया। वहीं, इंद्रदेव ने अपने पापों का पश्चाताप किया, जिसके बाद वह दोबारा स्वर्गलोक के सिंहासन पर वापस आ गए।

 

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नहुष को मिला श्राप

 

शक्ति के अहंकार में एक बार नहुष ने इंद्रदेव की पत्नी शची के प्रति बुरे विचार रखे। उन्होंने अपनी इच्छा शची देवी के सामने भी प्रकट की और उनसे विवाह करने की बात कही। हालांकि, शची देवी ने इससे इनकार कर दिया।

 

नहुष से परेशान होकर शची देवी ने बृहस्पति देव से मदद मांगी। तब बृहस्पति देव ने उन्हें सलाह दी कि वह नहुष के विवाह प्रस्ताव के लिए सहमति जता दें, लेकिन एक शर्त रख दें कि विवाह के लिए जब वह आएं तो उनकी पालकी सप्तर्षि उठाकर लाएं।

 

नहुष ने यह शर्त मान ली। सप्तर्षि वृद्ध हो चुके थे, इसलिए वे पालकी को धीरे-धीरे लेकर चल रहे थे। यह देखकर नहुष क्रोधित हो गए और उन्होंने सप्तर्षियों में से एक ऋषि को पैर मार दिया। इससे क्रोधित होकर सप्तर्षियों ने नहुष को अजगर बनने का श्राप दे दिया। इसके हजारों साल बाद पांडवों ने नहुष को इस श्राप से मुक्त कराया।